सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५४ सात्वतसंहिता शङ्खकोणचतुष्के तु शेषं पूर्ववदाचरेत् ॥ ७७ ॥ पद्मकुण्डलक्षणमाह— अथ पद्माकृतिं शृण्वित्यारभ्य शेषं पूर्ववदाचरेदित्यन्तम् ॥ ७२-७७ ॥ अथ पद्मकुण्डलक्षणमुच्यते—अत्रापि चक्रकुण्डवत् प्रथमं मण्डलं खातार्थं कृत्वा द्वितीये नाभिमण्डले भागार्धं कर्णिकासिद्ध्यै अपरार्धं केशरसिद्ध्यै द्वेधा मण्डलीकृत्याऽरक्षेत्रस्य बहिरेवमेव नेमिमण्डलं द्वेधा कृत्वा प्रथमभागमरक्षेत्रेण सहैकीकुर्यात् । उत्तरभागं पत्राग्रसिद्ध्यै स्थापयेत् । अरक्षेत्रेऽष्टदलसिद्ध्यर्थं प्रागाद्यष्टदिक्ष्वपि केसरमण्डलरुद्धेन सूत्रेणाऽर्धचन्द्राकारं लाञ्छनद्वयं (द्वयं?) परस्पराभिमुखं कृत्वा तच्छृङ्गाग्रसंस्थितेन दलमण्डलबाह्यगेन सूत्रद्वयेन पत्राग्रं कुर्यात् । आमूलान्तरितन्तराणां कर्णिकोच्छ्रायतुल्यानां केसराणां व्यक्तं यथा तथा विभागं जनयेत् । पत्राग्रमण्डलाद् बहिश्चतुष्कोणेषु शङ्खचतुष्टयं कुर्यात् । शेषं पूर्ववत् ॥ इति पद्मकुण्डलक्षणम् ॥ ७३-७७ ॥ पद्मकुण्ड अब पद्म कुण्ड का लक्षण कहते हैं—यहाँ भी चक्रकुण्ड के समान प्रथम मण्डल खात के लिये बनावे । द्वितीय नाभिमण्डल में आधा भाग कर्णिका बनाने के लिये, शेष आधे भाग में केशर निर्माण के लिये दो मण्डल बनावे । फिर अर क्षेत्र के बाहर भी इसी प्रकार नेमि मण्डल कर, दो भाग कर, प्रथम भाग को अरा क्षेत्र के साथ मिला देवे । उत्तर भाग पत्राग्र बनाने के लिये स्थापित करे । अरा क्षेत्र में अष्टदल निर्माण के लिये पूर्वादि आगे दिशाओं में केशर मण्डल से अवरुद्ध सूत्र से अर्ध चन्द्राकार दो लाञ्छन परस्पराभिमुख बना कर, उस शृङ्गाग्र स्थित दल मण्डल से बाहर रहने वाले दो सूत्रों से पद्माग्र निर्माण करे । मूल से प्रारम्भ करके अन्तर रहित कर्णिका के ऊँचाई के तुल्य जिस प्रकार केशर स्पष्ट दिखाई पड़े, ऐसा उनका विभाग करे और पद्माग्र मण्डल के बाहर चारों कोणों पर चार शङ्ख बनावे । शेष पूर्ववत् बनावे ॥ ७३-७७ ॥ योनिमेकेन भागेन चतुर्भिर्मेखलागणम् । खातं पूर्वसमं किन्तु वृत्ते वृत्तास्तु मेखलाः । चतुरश्रे तदाकारा इत्युक्तं कुण्डपञ्चकम् ॥ ७८ ॥ वृत्तचतुरश्रकुण्डयोर्लक्षणमाह—योनिरिति सार्धेन ॥ ७८ ॥ अब वृत्त तथा चौकोर कुण्ड का लक्षण कहते हैं—पूर्वोक्त रीति से अट्ठारह भाग में प्रविभक्त क्षेत्र में मध्य में पूर्ववत् ६४ कोष्ठ खात के लिये छोड़कर, उसके बाहर एक पङ्क्ति में योनि बनावे । फिर चार पङ्क्ति में चार मेखला