भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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एकादशः परिच्छेदः २५३ वृत्तपर्यन्तं च मत्स्यवल्लाञ्छनं कृत्वा नेमिवृत्तस्यान्तरे द्वयोर्द्वयोररयोर्मध्ये एकैकं प्रधिं कुर्यात् । अत्र नाभिः कुण्डविस्तारसदृशोच्छाया कूर्मपृष्ठसदृशी कार्या । नेमि- र्दर्पणसदृशयग्रे ईशन्निम्ना च कर्तव्या । अन्यत् सर्वं पूर्ववत् कुर्यात् ॥ इति चक्र- कुण्डलक्षणम् ॥ ६४-७२ ॥ अब चक्र कुण्ड का लक्षण कहते हैं— पूर्वोक्त प्रकार से अट्ठारह भागों में प्रविभक्त चक्रकुण्ड चौकोर क्षेत्र में मध्य के मर्मस्थान में सूत्र संस्थापित करे । मध्यम से पञ्च रेखा का स्पर्श करने वाले सूत्र से एक मण्डल निर्माण कर षष्ठ रेखा का स्पर्श करने वाले सूत्र से एक वृत्त बना कर, फिर नवम रेखा का स्पर्श करने वाले सूत्र से एक वृत्त का निर्माण करे । उसमें प्रथम मण्डल खात के लिये, द्वितीय नाभि स्थान के लिये, तृतीय अरा के लिये और चतुर्थ मण्डल नाभि के लिये समझना चाहिये । उसके बाहर की पङ्क्ति में चौकोर एक ही मेखला बनानी चाहिये । पूर्वोक्त अर स्थान मध्य से पुनः एक वृत्त से घुमा कर, पूर्वादि दिशाओं में तथा आग्नेयादि कोणों में, आठ सूत्र लगा कर, उनके अरत्व की सिद्धि के लिये, अन्तर्वृत्त निरुद्ध सूत्र से, प्रत्येक सूत्र के दोनों पक्षों के नाभिवृत्त पर्यन्त और नेमिवृत्त पर्यन्त, मछली के समान रेखा खींच कर, नेमिवृत्त के भीतर रहने से दो-दो अरों के बीच में एक-एक प्रधि निर्माण करे । यहाँ नाभि कुण्ड के विस्तार के सदृश ऊँची कूर्मपृष्ठ के सदृश बनावे । नेमि दर्पण के समान आगे थोडी नीची बनावे । अन्य सब निर्माण पूर्ववत् करे ॥ ६४-७२ ॥ पद्मकुण्डलक्षणकथनम् शिष्टं पुरोदितं सर्वम् अथ पद्माकृतिं शृणु ॥ ७२ ॥ भागार्धं भ्रामयेन्नाभेर्बहिः केसरसिद्धये । भ्रामयेदपरं चार्धमरक्षेत्रस्य बाह्यगम् ॥ ७३ ॥ नीत्वा लोपमनेनैव विधिना नेमिमण्डलम् । अरसूत्राश्रितं कुर्यात् ततः पद्मदलाष्टकम् ॥ ७४ ॥ केसरभ्रमरुद्धेन सूत्रेणार्धेन्दुलक्षणम् । तच्छृङ्गकोटिसंस्थेन परिधेर्बाह्यकेन तु ॥ ७५ ॥ सूत्रद्वयेन पत्राग्रं कुर्याद् ब्रह्मभ्रमावनेः । निरन्तराणामा मूलात् केसराणां महामते ॥ ७६ ॥ कर्णिकोच्छ्रायतुल्यानां विभागं जनयेत् स्फुटम् ।