सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८० सात्वतसंहिता बाँधकर वहन कर रहे हैं। ऐसे मत्स्य भगवान् का चिन्तन करे। प्रजापति गणों से समन्वित इस विस्तृत पृथ्वी को जिन्होंने नाव बना कर मोती के समान अपने निर्मल शरीर से वहन किया है, उन मीनावतार का ध्यान करे ॥ १२०-१२४ ॥ २५. वामनध्यानकथनम् यो नित्यं भवभीतानां बुधानां कृपया स्वयम् ॥ १२४ ॥ हृत्स्थो नियतिदण्डेन मार्ताण्डायुतसन्निभः । जित्वाऽज्ञानबलं भीममिन्द्रियारिगणान्वितम् ॥ १२५ ॥ संयच्छत्यचिराद् ब्रह्मनन्दनं सत्सुखाय च । ध्यायेत् तमेव ह्रस्वाङ्गं श्यामं पद्मदलेक्षणम् ॥ १२६ ॥ अन्तर्निविष्टभुवनं जटावल्कलभूषितम् । छत्रं तद्धामहस्तेऽस्य दण्डमन्यत्र वैष्णवम् ॥ १२७ ॥ वामनध्यानमाह—यो नित्यमित्यादिभिः । अज्ञानं जित्वा अविद्यामपोह्येत्यर्थः । ब्रह्म नन्दयतीति ब्रह्मनन्दनं ज्ञानमित्यर्थः । अस्य स्थानं तु श्रीपौष्करे— कन्दमाले विवैलस्ते कुलकुक्षौ हिमाचले ॥ वामनं खर्वमूर्तिं च वैश्वरूप्येण संस्थितम्। —(३६।३२४-३२५) इति ॥ १२४-१२७ ॥ अब वामन का ध्यान कहते हैं—जो नित्य ही संसार सागर से डरने वाले बुद्धिमानों के हृदय में अपनी कृपा से निवास करते हैं। जो नियति (= भाग्य) रूपी दण्ड से दश हजार सूर्य के समान तेजस्वी हैं, जो भयङ्कर इन्द्रियारि गणान्वित हैं तथा अज्ञान रूप बल को जीतकर स्वल्प काल ही में सज्जनों के सुख के लिये उन्हें ज्ञान प्रदान करते हैं। उन ह्रस्वाङ्ग, वामन स्वरूप, श्याम वर्ण, कमल के समान नेत्र वाले अपने भीतर समस्त प्रश्नों को धारण करने वाले, जटावल्कल से विभूषित, बायें हाथ में छत्र और अन्य हाथ में वैष्णव दण्ड धारण किये हुए हैं, ऐसे भगवान् वामन का ध्यान करना चाहिये ॥ १२४-१२७ ॥ २६. त्रिविक्रमध्यानकथनम् आक्रम्य जाग्रदादित्यः सूर्येन्दुहुतभुकप्रभाम् । तिष्ठत्यनन्तो भगवांस्तुर्याख्याञ्चिद्विभूतिधृक् ॥ १२८ ॥ सम्प्रेरयन्ननिच्छातः स्वपदादमृतप्रभाम् । आह्लादजननीं शक्तिं कर्मिणां भावितात्मनाम् ॥ १२९ ॥ त्रैलोक्यपूरकं ध्यायेत् तमेव हरितद्युतिम् । नानामुद्रास्त्रयुक्तेन भुजवृन्देन भूषितम् ॥ १३० ॥