सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वादशः परिच्छेदः २७९ प्रयाति प्रकृतिं चैव ब्रह्माण्डं प्रकृतो लयः ॥ (१।७।४२) इति ॥ ११७-१२०॥ अब न्यग्रोधशायी का ध्यान कहते हैं—जो अपनी दाँतों की प्रभा से समस्त अज्ञान को दूर करने वाले हैं उन न्यग्रोध के नीचे सोने वाले न्यग्रोधशायी विभु का ध्यान करना चाहिये । कुछ उतान हो कर बैठे हुए हैं, दो भुजा धारण किये हुए, शिशु स्वरूप हैं, अस्त्र रहित हैं, शान्त निद्रा रस का स्वाद ले रहे हैं, योगमाया के बल से अपने स्वभाव का परित्याग नहीं कर पा रहे हैं, जो अपनी श्वास-उच्छ्वास के त्याग एवं ग्रहण के द्वारा ब्रह्म से लेकर भुवन पर्यन्त समस्त प्राधानिक कर्म (प्राकृतिक प्रलय) करते रहते हैं ऐसे न्यग्रोधशायी विष्णु का ध्यान करना चाहिए ॥ ११७-१२० ॥ २४. मत्स्यावतारध्यानकथनम् अपौरुषेण रूपेण संवृतावयवात्मना ॥ १२० ॥ स्वमायाजलमध्यस्थम् अध्यक्षमथ संस्मरेत् । ज्ञानादिगुणवृन्देन पक्षभूतेन भूषितम् ॥ १२१ ॥ स्वोत्थं सन्निःसृतं ब्रह्म एकशृङ्गविराजितम् । कल्पावसानसमये वहन्तं चैव चिन्तयेत् ॥ १२२ ॥ नौरूपां विततां क्षोणीं प्रजापतिगणान्विताम् । मुक्ताफलगणेनैव वपुषा निर्मलेन च ॥ १२३ ॥ अनिमीलितनेत्रः स मीनात्मा भगवानथ । अथ मत्स्यावतारध्यानमाह—अपौरुषेणेति चतुर्भिः । नौरूपां = तरणिरूपा- मित्यर्थः । “स्त्रियां नौस्तरणिस्तरिः” (१।१०।१०) इत्यमरः । तदानीं महालक्ष्मी- रेवैवं नौरूपं बिभर्तीति ज्ञेयम् । तथा च लक्ष्मीतन्त्रे— अवतारो हि यो विष्णोर्नाम्ना मीनधरः शुभः । अनुग्रहक्रमात् तत्र साऽहं नौरूपधारिणी ॥—(८।३३-३४) इति। अस्य स्थानं तु पौष्करे—“मत्स्यात्मा भगवानप्सु” (३६।३१८) इति । मीन- वक्त्रस्थानमप्युक्तं तत्रैव—“नौबन्धनगिरावेव मीनवक्त्रः स्थितः प्रभुः” (३६।३२१) इति ॥ १२०-१२४ ॥ अब मत्स्यावतार का ध्यान कहते हैं—जो अपने अपौरुषेय रूप से अपने रूपावयव को समेट लेते हैं और अपने माया रूप से जल के मध्य में रहने वाले जगत् के अध्यक्ष हैं, उनका स्मरण करे । जो ज्ञानादि गुण समूह रूप अपने पक्ष से विभूषित हैं, जो अपने में उत्पन्न और अपने से ही निकले हुए ब्रह्म रूप एक शृङ्ग से विराज रहे हैं । जो कल्पान्त काल में इस समस्त जगत् को उस शृङ्ग में