सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७८ सात्वतसंहिता वर्णानामाश्रमाणां च परिरक्षक एव हि । मानसैकार्णवान्तस्थे निष्कम्पे बुद्धिपादपे ॥ ११४ ॥ अभिमानलताढ्ये चाप्युपरिस्थमनुस्मरेत् । प्रावृङ्गिरिरिव श्यामं तेजसा ज्वलनोपमम् ॥ ११५ ॥ ध्वंसकृद् विघ्नजालस्य निन्द्रालस्यचयस्य यः । उत्कृष्टद्विजरूपेण विकसत्यङ्गरूपिणा ॥ ११६ ॥ स एव द्विभुजो ध्येयो दण्डदर्भक्षसूत्रधृक् । अथ दत्तात्रेयध्यानमाह—संस्मरेदथ दत्ताख्यमित्यादिभिः । संस्मरेदित्यस्य पूर्वे- णैवान्वयः ॥ १११ - ११७ ॥ अब दत्तात्रेय का ध्यान कहते हैं—ज्ञान मूर्ति, संसार से सर्वथा अलिप्त, देवता के मार्ग समाधि में निरन्तर मनुष्य, मुनि मार्ग तथा ब्रह्म मार्ग का अनुसरण करने वाले, ब्रह्म रस को किञ्चिन्मात्रा में प्राप्त करने वाले, मार्ग को अपने प्रभा किरणों से भासित करने वाले, मन के साथ वायु की भी आकृति को रोक देने वाले, श्रुतियों के मानसिक आचारों के वर्णाश्रम धर्मों के एक मात्र परिरक्षक, अभिमान लता से परिपूर्ण, मानस समुद्र के अन्त में स्थित, बुद्धि पादप से परे और उससे भी ऊपर के स्थान में निवास करने वाले भगवान् दत्तात्रेय का स्मरण करना चाहिये । वर्षाकालीन मेघ की तरह श्याम वर्ण वाले, तेज से अग्नि के समान दहकते हुए, विघ्न समूह का विनाश करने वाले, निद्रा एवं आलस्य समूहों के विनाश कर्त्ता, विकसित कमल के समान प्रकाशित रूप से उत्कृष्ट, द्विज रूप से विराजमान उन द्विभुज दत्तात्रेय का ध्यान करना चाहिये जो दण्ड, कुशा और अक्षसूत्र धारण किये हुए हैं ॥ १११-११७ ॥ २३. न्यग्रोधशायीध्यानकथनम् दन्तज्योत्स्नाजिताज्ञानं न्यग्रोधशयनं विभुम् ॥ ११७ ॥ निषण्णमीषदुत्तानं द्विभुजं शिशुरूपिणम् । एवमेव निरस्तास्त्रं शान्तनिद्रारसं स्थितम् ॥ ११८ ॥ अनुज्झितस्वभावं च योगमायाबलेन च । त्यजन्तमाहरन्तं च श्वासोच्छ्वासद्वयेन तु ॥ ११९ ॥ आब्रह्मभुवनं सर्वं कर्म प्राधानिकं हि यत् । न्यग्रोधशयनध्यानमाह—दन्तज्योत्स्नेति त्रिभिः । प्राधानिकं प्राकृतमित्यर्थः । पूर्वोक्त एकार्णवशायी नैमित्तिकप्रलयकर्ता, अयं तु प्राकृतिकप्रलयकर्तेति बोध्यम् । नैमित्तिकप्राकृतिकयोर्लक्षणं तु श्रीविष्णुपुराणे— ब्राह्मो नैमित्तिकस्तत्र यच्छेते जगतः पतिः ।