सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
२७८ सात्वतसंहिता वर्णानामाश्रमाणां च परिरक्षक एव हि । मानसैकार्णवान्तस्थे निष्कम्पे बुद्धिपादपे ॥ ११४ ॥ अभिमानलताढ्ये चाप्युपरिस्थमनुस्मरेत् । प्रावृङ्गिरिरिव श्यामं तेजसा ज्वलनोपमम् ॥ ११५ ॥ ध्वंसकृद् विघ्नजालस्य निन्द्रालस्यचयस्य यः । उत्कृष्टद्विजरूपेण विकसत्यङ्गरूपिणा ॥ ११६ ॥ स एव द्विभुजो ध्येयो दण्डदर्भक्षसूत्रधृक् । अथ दत्तात्रेयध्यानमाह—संस्मरेदथ दत्ताख्यमित्यादिभिः । संस्मरेदित्यस्य पूर्वे- णैवान्वयः ॥ १११ - ११७ ॥ अब दत्तात्रेय का ध्यान कहते हैं—ज्ञान मूर्ति, संसार से सर्वथा अलिप्त, देवता के मार्ग समाधि में निरन्तर मनुष्य, मुनि मार्ग तथा ब्रह्म मार्ग का अनुसरण करने वाले, ब्रह्म रस को किञ्चिन्मात्रा में प्राप्त करने वाले, मार्ग को अपने प्रभा किरणों से भासित करने वाले, मन के साथ वायु की भी आकृति को रोक देने वाले, श्रुतियों के मानसिक आचारों के वर्णाश्रम धर्मों के एक मात्र परिरक्षक, अभिमान लता से परिपूर्ण, मानस समुद्र के अन्त में स्थित, बुद्धि पादप से परे और उससे भी ऊपर के स्थान में निवास करने वाले भगवान् दत्तात्रेय का स्मरण करना चाहिये । वर्षाकालीन मेघ की तरह श्याम वर्ण वाले, तेज से अग्नि के समान दहकते हुए, विघ्न समूह का विनाश करने वाले, निद्रा एवं आलस्य समूहों के विनाश कर्त्ता, विकसित कमल के समान प्रकाशित रूप से उत्कृष्ट, द्विज रूप से विराजमान उन द्विभुज दत्तात्रेय का ध्यान करना चाहिये जो दण्ड, कुशा और अक्षसूत्र धारण किये हुए हैं ॥ १११-११७ ॥ २३. न्यग्रोधशायीध्यानकथनम् दन्तज्योत्स्नाजिताज्ञानं न्यग्रोधशयनं विभुम् ॥ ११७ ॥ निषण्णमीषदुत्तानं द्विभुजं शिशुरूपिणम् । एवमेव निरस्तास्त्रं शान्तनिद्रारसं स्थितम् ॥ ११८ ॥ अनुज्झितस्वभावं च योगमायाबलेन च । त्यजन्तमाहरन्तं च श्वासोच्छ्वासद्वयेन तु ॥ ११९ ॥ आब्रह्मभुवनं सर्वं कर्म प्राधानिकं हि यत् । न्यग्रोधशयनध्यानमाह—दन्तज्योत्स्नेति त्रिभिः । प्राधानिकं प्राकृतमित्यर्थः । पूर्वोक्त एकार्णवशायी नैमित्तिकप्रलयकर्ता, अयं तु प्राकृतिकप्रलयकर्तेति बोध्यम् । नैमित्तिकप्राकृतिकयोर्लक्षणं तु श्रीविष्णुपुराणे— ब्राह्मो नैमित्तिकस्तत्र यच्छेते जगतः पतिः ।
द्वादशः परिच्छेदः २७९ प्रयाति प्रकृतिं चैव ब्रह्माण्डं प्रकृतो लयः ॥ (१।७।४२) इति ॥ ११७-१२०॥ अब न्यग्रोधशायी का ध्यान कहते हैं—जो अपनी दाँतों की प्रभा से समस्त अज्ञान को दूर करने वाले हैं उन न्यग्रोध के नीचे सोने वाले न्यग्रोधशायी विभु का ध्यान करना चाहिये । कुछ उतान हो कर बैठे हुए हैं, दो भुजा धारण किये हुए, शिशु स्वरूप हैं, अस्त्र रहित हैं, शान्त निद्रा रस का स्वाद ले रहे हैं, योगमाया के बल से अपने स्वभाव का परित्याग नहीं कर पा रहे हैं, जो अपनी श्वास-उच्छ्वास के त्याग एवं ग्रहण के द्वारा ब्रह्म से लेकर भुवन पर्यन्त समस्त प्राधानिक कर्म (प्राकृतिक प्रलय) करते रहते हैं ऐसे न्यग्रोधशायी विष्णु का ध्यान करना चाहिए ॥ ११७-१२० ॥ २४. मत्स्यावतारध्यानकथनम् अपौरुषेण रूपेण संवृतावयवात्मना ॥ १२० ॥ स्वमायाजलमध्यस्थम् अध्यक्षमथ संस्मरेत् । ज्ञानादिगुणवृन्देन पक्षभूतेन भूषितम् ॥ १२१ ॥ स्वोत्थं सन्निःसृतं ब्रह्म एकशृङ्गविराजितम् । कल्पावसानसमये वहन्तं चैव चिन्तयेत् ॥ १२२ ॥ नौरूपां विततां क्षोणीं प्रजापतिगणान्विताम् । मुक्ताफलगणेनैव वपुषा निर्मलेन च ॥ १२३ ॥ अनिमीलितनेत्रः स मीनात्मा भगवानथ । अथ मत्स्यावतारध्यानमाह—अपौरुषेणेति चतुर्भिः । नौरूपां = तरणिरूपा- मित्यर्थः । “स्त्रियां नौस्तरणिस्तरिः” (१।१०।१०) इत्यमरः । तदानीं महालक्ष्मी- रेवैवं नौरूपं बिभर्तीति ज्ञेयम् । तथा च लक्ष्मीतन्त्रे— अवतारो हि यो विष्णोर्नाम्ना मीनधरः शुभः । अनुग्रहक्रमात् तत्र साऽहं नौरूपधारिणी ॥—(८।३३-३४) इति। अस्य स्थानं तु पौष्करे—“मत्स्यात्मा भगवानप्सु” (३६।३१८) इति । मीन- वक्त्रस्थानमप्युक्तं तत्रैव—“नौबन्धनगिरावेव मीनवक्त्रः स्थितः प्रभुः” (३६।३२१) इति ॥ १२०-१२४ ॥ अब मत्स्यावतार का ध्यान कहते हैं—जो अपने अपौरुषेय रूप से अपने रूपावयव को समेट लेते हैं और अपने माया रूप से जल के मध्य में रहने वाले जगत् के अध्यक्ष हैं, उनका स्मरण करे । जो ज्ञानादि गुण समूह रूप अपने पक्ष से विभूषित हैं, जो अपने में उत्पन्न और अपने से ही निकले हुए ब्रह्म रूप एक शृङ्ग से विराज रहे हैं । जो कल्पान्त काल में इस समस्त जगत् को उस शृङ्ग में
२८० सात्वतसंहिता बाँधकर वहन कर रहे हैं। ऐसे मत्स्य भगवान् का चिन्तन करे। प्रजापति गणों से समन्वित इस विस्तृत पृथ्वी को जिन्होंने नाव बना कर मोती के समान अपने निर्मल शरीर से वहन किया है, उन मीनावतार का ध्यान करे ॥ १२०-१२४ ॥ २५. वामनध्यानकथनम् यो नित्यं भवभीतानां बुधानां कृपया स्वयम् ॥ १२४ ॥ हृत्स्थो नियतिदण्डेन मार्ताण्डायुतसन्निभः । जित्वाऽज्ञानबलं भीममिन्द्रियारिगणान्वितम् ॥ १२५ ॥ संयच्छत्यचिराद् ब्रह्मनन्दनं सत्सुखाय च । ध्यायेत् तमेव ह्रस्वाङ्गं श्यामं पद्मदलेक्षणम् ॥ १२६ ॥ अन्तर्निविष्टभुवनं जटावल्कलभूषितम् । छत्रं तद्धामहस्तेऽस्य दण्डमन्यत्र वैष्णवम् ॥ १२७ ॥ वामनध्यानमाह—यो नित्यमित्यादिभिः । अज्ञानं जित्वा अविद्यामपोह्येत्यर्थः । ब्रह्म नन्दयतीति ब्रह्मनन्दनं ज्ञानमित्यर्थः । अस्य स्थानं तु श्रीपौष्करे— कन्दमाले विवैलस्ते कुलकुक्षौ हिमाचले ॥ वामनं खर्वमूर्तिं च वैश्वरूप्येण संस्थितम्। —(३६।३२४-३२५) इति ॥ १२४-१२७ ॥ अब वामन का ध्यान कहते हैं—जो नित्य ही संसार सागर से डरने वाले बुद्धिमानों के हृदय में अपनी कृपा से निवास करते हैं। जो नियति (= भाग्य) रूपी दण्ड से दश हजार सूर्य के समान तेजस्वी हैं, जो भयङ्कर इन्द्रियारि गणान्वित हैं तथा अज्ञान रूप बल को जीतकर स्वल्प काल ही में सज्जनों के सुख के लिये उन्हें ज्ञान प्रदान करते हैं। उन ह्रस्वाङ्ग, वामन स्वरूप, श्याम वर्ण, कमल के समान नेत्र वाले अपने भीतर समस्त प्रश्नों को धारण करने वाले, जटावल्कल से विभूषित, बायें हाथ में छत्र और अन्य हाथ में वैष्णव दण्ड धारण किये हुए हैं, ऐसे भगवान् वामन का ध्यान करना चाहिये ॥ १२४-१२७ ॥ २६. त्रिविक्रमध्यानकथनम् आक्रम्य जाग्रदादित्यः सूर्येन्दुहुतभुकप्रभाम् । तिष्ठत्यनन्तो भगवांस्तुर्याख्याञ्चिद्विभूतिधृक् ॥ १२८ ॥ सम्प्रेरयन्ननिच्छातः स्वपदादमृतप्रभाम् । आह्लादजननीं शक्तिं कर्मिणां भावितात्मनाम् ॥ १२९ ॥ त्रैलोक्यपूरकं ध्यायेत् तमेव हरितद्युतिम् । नानामुद्रास्त्रयुक्तेन भुजवृन्देन भूषितम् ॥ १३० ॥
द्वादशः परिच्छेदः २८१ खेटकेनाङ्घ्रिदण्डेन वहन्तमरिसूदनम् । वहन्तं सद्धैजयन्तीं देवानां च जयार्थिनाम् ॥ १३१ ॥ खड्गचक्रगदादण्डबाणाङ्कुशसमुद्गराः । शक्तिः परशुशैलेन्द्रौ दश दक्षभुजेष्वमी ॥ १३२ ॥ शङ्खतोमरशार्ङ्गं च पाशशूलमहीरुहाः । कुलिशं क्षुरिका चैव लाङ्गलं मुसलं महत् ॥ १३३ ॥ वामहस्तेष्वमी ध्येया अन्ये मुद्रान्विता दश । भयविस्मयहृद् वेणीकण्ठग्रहणलक्षणाः ॥ १३४ ॥ ध्येया मुद्रा विभोः पञ्च सव्ये तु करपञ्चके । वराख्यां भूतिसंज्ञां च युक्ताख्यां साभयां तु वै ॥ १३५ ॥ गोपनीं दक्षहस्तेषु तत्संख्येषु च संस्मरेत् । त्रिविक्रमध्यानमाह—आक्रम्येत्यादिभिः । आह्लादजननीं शक्तिं गङ्गामित्यर्थः । तथा च लक्ष्मीतन्त्रे— त्रैविक्रमाह्वयो विष्णोरवतारः परः स्मृतः ॥ आह्लादजननी गङ्गा तत्पादात् प्रभवम्यहम् ।—(८।३४-३५) इति । अस्य स्थानं तु श्रीपौष्करे— मध्यदेशे तु गङ्गायाः कुरुक्षेत्रे तु पौष्कर ॥ यामुनं कूलमासाद्य प्रादुर्भावान्तरं महत् । स्थितं त्रिविक्रमाख्यं यस्त्रैलोक्याक्रान्तविग्रहः ॥—(३६।३२५-३२६) इति ॥ १२८-१३६ ॥ अब त्रिविक्रम का ध्यान कहते हैं—सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि के तेज का आक्रमण कर जो स्वयं जाग्रत् आदित्य हैं जिन अनन्त भगवान् को तूर्य नाम से कहा जाता है । जो चिद्विभूति को धारण किये हुए हैं, जो अपनी अनिच्छा से पुण्यात्मा, संसारी मनुष्यों के कल्याण के लिये शक्ति स्वरूपा आह्लाद की जननी श्री गङ्गा जी को अपने पैर से प्रेरित कर रहे हैं । अपने पैसे समस्त त्रिलोकी को पूर्ण करने वाले कृष्ण वर्ण वाले त्रिविक्रम का ध्यान करना चाहिये जो अनेक प्रकार के मुद्रास्य युक्त भुजाओं से विभूषित है । जिन अरिसूदन को अङ्घ्रिदण्ड रूप खेटक से वहन किया जा रहा है । जो विजय की इच्छा करने वाले देवताओं की वैजयन्ती को वहन कर रहे हैं । जो अपनी बलशाली भुजाओं में खेट, चक्र, गदा, दण्ड, बाण, अङ्कुश, मुद्गर, शक्ति, परशु और शैलेन्द्र (वज्र) इन दश आयुधों को धारण किये हुए हैं । शङ्ख, तोमर, शार्ङ्ग, धनुष, पाश, शूल, महीरुह, कुलिश, क्षुरिका, लाङ्गल और महान मुशल इन दश को अन्य बायें हाथ में धारण किये हुए हैं । सा० सं० - २२
२८२ सात्वतसंहिता इसके अतिरिक्त दश मुद्रायें भी उन्हीं हाथों में रहती हैं, उनका भी ध्यान करना चाहिये। भयङ्कर, विस्मय, हृदययुक्त, वेणी, कण्ठ और ग्रहण लक्षण वाली इन पाँच मुद्राओं का भी ध्यान करे, जो बायें पाँचों हाथों में रहती हैं। वरा नाम वाली, भूति नाम वाली, युक्ता नाम वाली, समया और गोपनी नामक मुद्राएँ उनके दाहिने पाँचों हाथों में रहती हैं। इनका भी ध्यान करे॥ १२८-१३६॥ २७-३०. नर-नारायण-हरि-कृष्णानां ध्यान कथनम् जगत्सूत्रं सहाक्षैस्तु येनोक्तममितात्मनाम्॥ १३६॥ गुणषट्कस्वरूपेण पूर्वोक्ताकृतिभिर्विना। स्मर्त्तव्यः स चतुर्धा वै लाञ्छनास्त्रविवर्जितः॥ १३७॥ सर्वदा परिरक्षन्तु जपपूर्वं चतुष्टयम्। योगक्रियातपोऽन्तं च सद्दिभूत्यपवर्गदम्॥ १३८॥ नराद्यः कृष्णनिष्ठश्च पृथगेकत्र चेच्छया। नरं तत्र प्रवालाभमर्धोन्मीलितलोचनम्॥ १३९॥ अन्तर्निविष्टभावं च शब्दब्रह्मैकमानसम्। पदोपलक्षणं मन्त्रं लपमानमलक्षितम्॥ १४०॥ स्फाटिकेनाक्षसूत्रेण करस्थेन च शोभितम्। गणयन्नक्षसूत्रीयानावर्तान् वामपाणिना॥ १४१॥ अथ नारायणं देवं ध्यायेत् कुमुदपाण्डरम्। बद्धब्रह्माञ्जलिं शान्तं हृत्पद्मार्पितमानसम्॥ १४२॥ युञ्जानं च स्वमात्मानं परस्मिन्नव्यये पदे। कमण्डलुधरं ध्यायेत् काञ्चनाभमतो हरिम्॥ १४३॥ विष्टराविष्टपाणिं च क्रियाकाण्डप्रदर्शकम्। पठन्तमनिशं शास्त्रं पञ्चरात्रपुरस्सरम्॥ १४४॥ कृष्णमिन्दीवरश्याममूर्ध्वबाहुं जटाधरम्। पादेनैकेन तिष्ठन्तमाहरन्तं च मारुतम्॥ १४५॥ एकत्रिषड्द्विषड्रत्राद्यतिकृच्छ्रपरायणम्। पक्षमासोपवासांश्च दिशन्तमनुचिन्तयेत्॥ १४६॥ कृष्णाजिनोत्तरीयाश्च सर्वे काषायधारिणः। ब्रह्मलिङ्गधराः सर्वे सर्वे ब्रह्मपरायणाः॥ १४७॥ मुख्यकर्मपरिक्रान्ताः साधूनां प्रेरणाय च। कालानुकालमाश्रित्य सर्वे सर्वपरायणाः॥ १४८॥
द्वादशः परिच्छेदः २८३ अथ नरादीनां चतुर्णां ध्यानमाह—जगत्सूत्रमित्यादिभिः । जप-योग-क्रिया- तपः-परिरक्षकत्वं नर-नारायण-हरि-कृष्णानां क्रमेण बोध्यम् । एषां स्थानानि तु— नरसंज्ञो जगन्नाथः सिद्धैः सम्पूजितेषु च । भूभागेषु च रम्येषु नित्यं सन्निहितः स्थितः ॥ गिरौ गोवर्धनाख्ये तु देवः सर्वेश्वरो हरिः । संस्थितः पूजिते स्थाने गवां निष्क्रमणेेषु च ॥ सालिग्रामे च भगवान् राजेन्द्राख्ये वने द्विज । तथैव वसुधांशेन स्थितो देवव्रताभिधे ॥ कृष्णोऽपरश्चतुर्मूर्तिरवत्तीर्य धरातले । स्थितः पिण्डारके विप्र मोचयन् दुष्कृताज्जनान् ॥ —(पौ० सं० ३६।३३३-३३६) इति ॥ १३६-१४८ ॥ अब नर, नारायण, हरि और कृष्ण का ध्यान कहते हैं—जिन्होंने पूर्वोक्त आकृति के बिना केवल षाड्गुण्य स्वरूप से ज्ञानियों के लिये अक्षसूत्र के साथ जगत्सूत्र का उपदेश किया । लाञ्छनास्त्र से विवर्जित उन्हें चार प्रकार से ध्यान करना चाहिये । वे अपने चारों रूपों से सद्विभूति और अपवर्ग देने वाले जप, योग, क्रिया और तप की सर्वदा रक्षा करें । नर, नारायण, हरि और कृष्ण चाहे पृथक् हों अथवा एकत्र हों, उनमें इनकी इच्छा ही प्रधान है, उनमें भगवान् नर प्रवाल की आत्मा वाले हैं, उनके नेत्र आधे खुले हैं, समस्त भाव उनके अन्तःकरण में सन्निविष्ट हैं, मानस शब्दब्रह्मैकनिष्ठ है, वे अलक्षित होकर पदोपलक्षण मन्त्र का जप करते रहते हैं और बायें हाथ में स्थित स्फटिक की माला से आवृत्त माला की संख्या की गणना करते रहते हैं । अब कुमुद के समान स्वच्छ वर्ण वाले नारायण का ध्यान कहते हैं जो ब्रह्माञ्जलि बाँधे हुए हैं, शान्त हैं, अपना मन हृदयपद्म में अर्पित किये हुए हैं, अपनी आत्मा को पर अव्यय पद में संयुक्त किये हुए हैं । अब हरि का ध्यान कहते हैं जो कमण्डल धारण किये हुए हैं । जिनके शरीर की आभा काञ्चन के समान है, विष्टर पर हाथ रखे हुए हैं, जो क्रियाकाण्ड के प्रदर्शक हैं और जो पञ्चरात्रपुरःसर सर्वदा शास्त्रों का पाठ करते रहते हैं । अब कृष्ण का ध्यान कहते हैं—नीलकमल के समान श्याम वर्ण वाले, ऊपर की ओर भुजा उठाये, जटा धारण किये हुए, एक पैर से खड़े होकर वायु पान करते हुए, भगवान् कृष्ण का ध्यान करना चाहिए । एक, तीन, छह या बारह रात्रि पर्यन्त अतिकृच्छ्र व्रत करने वाले एक पक्ष एवं मास पर्यन्त उपवास का उपदेश करने वाले ऐसे कृष्ण का ध्यान करना चाहिये । नर, नारायण हरि और
२८४ सात्वतसंहिता कृष्ण ये सभी कृष्णमृग का उत्तरीय तथा काषाय (गेरुआ) वस्त्र धारण किये हुए हैं। सभी ब्राह्मण चिह्नधारी हैं और वेद पाठ में लगे रहने वाले हैं। साधुओं को प्रेरणा देने के लिये अपने मुख्य कर्म में लगे रहते हैं, काल-अनुकाल का आश्रय लेकर सभी सबका हित करते हैं ऐसे चारों विष्णु के अवतारों का ध्यान करना चाहिए ॥ १३६-१४८ ॥ ३१. परशुरामध्यानकथनम् असङ्गशक्त्या भगवान् सत्कुठाराभिधानया । छिनत्ति बद्धमूलान् यः कर्मवृक्षांस्तु कर्मिणाम् ॥ १४९ ॥ तमेव द्विभुजं ध्यायेदुदयादित्यवर्चसम् । कृष्णैणचर्मवसनं सत्कुठारकराङ्कितम् ॥ १५० ॥ परशुरामध्यानमाह—असङ्गशक्त्येति द्वाभ्याम्। अस्य स्थानं तु— नगोत्तमे महेन्द्राख्ये परश्वधकरो द्विजः । रामसंज्ञश्च भगवान् संस्थितः क्षत्रियान्तकः ॥ —(पौ०सं० ३६।३२७) इति ॥ १४९-१५० ॥ अब परशुराम का ध्यान कहते हैं—जो भगवान् बिना किसी की सहायता से अपनी कुल्हाड़ी मात्र से संसारी जीवों के बद्धमूल कर्मवृक्ष का उच्छेदन करते हैं, उदीयमान सूर्य के समान तेजस्वी दो भुजा वाले उन भगवान् परशुराम का ध्यान करना चाहिये। काले मृग के चर्म का वस्त्र तथा हाथ में कुठार धारण किये हुए उन परशुराम का ध्यान करना चाहिये ॥ १४९-१५० ॥ ३२. श्रीरामध्यानकथनम् दशेन्द्रियाननं घोरं यो मनोरजनीचरम् । विवेकशरजालेन शमं नयति योगिनाम् ॥ १५१ ॥ ध्येयः स एव विश्वात्मा सतोयजलदप्रभः । रक्तराजीवनयनो धनुःशरकराङ्कितः ॥ १५२ ॥ श्रीरामध्यानमाह—दशेन्द्रियाननमिति द्वाभ्याम्। अस्य स्थानं तु— धराधरे चित्रकूटके रक्षःक्षयकरो महान् । संस्थितश्चापरो रामः पद्मपत्रायतेक्षणः ॥—(पौ० सं० ३६।३२८) इति ॥ १५१-१५२ ॥ अब राम का ध्यान कहते हैं—जो योगियों के मन रूपी महाघोर रावण राक्षस को अपने विवेक रूप शर जाल से शान्त कर देते हैं। सज्ज्ल बादल के
द्वादशः परिच्छेदः २८५ समान कान्ति वाले, कमल नेत्र, हाथ में धनुष एवं बाण धारण किये हुए उन विश्वात्मा भगवान् राम का ध्यान करना चाहिये ॥ १५१-१५२ ॥ ३३. वेदव्यासध्यानकथनम् वाग्वेदमण्डलं यो वै स्वरूपद्युतिलक्षणम् । स्वयं स्वोत्थं विभजति त्रिधा पश्यन्तिपूर्वकम्॥ १५३ ॥ बोधमारुतहृत्पूर्वस्थानेष्वभ्युदितं क्रमात् । स्मर्तव्यः सोऽपि भगवानतसीकुसुमद्युतिः ॥ १५४ ॥ वहन् वै वामहस्तेन सर्वशास्त्रार्थपुस्तकम् । दक्षिणेन तु शास्त्रार्थमादिशंश्च यथास्थितम् ॥ १५५ ॥ युगानुसारिबोधानामक़्खेदजननाय च । विभजंस्तु चतुर्धा वै वेदमेकं त्रिकालवित् ॥ १५६ ॥ अथ वेदव्यासध्यानमाह—वाग्वेदमण्डलमियादिभिः । स्वरूपद्युतिलक्षणम्, अन्तःस्थितज्योतिःस्वरूपमित्यर्थः, ‘‘स्वरूपज्योतिरवान्तर्भावयन् संस्थितं हृदि’’ (३४।६३) इति पौष्करोक्तेः । केवलशान्तस्वरूपमिति यावत् । वाग्वेदमण्डलं शब्दब्रह्मोत्यर्थः । पश्यन्तीपूर्वकं त्रिधा विभजति पश्यन्ती-मध्यमा-वैखरीभेदैस्त्रेधा विभक्तं करोतीत्यर्थः । एताः शब्दब्रह्मणोऽवस्थाः सुव्यक्तमुक्ता लक्ष्मीतन्त्रे— बोधोन्मेषः स्मृतः शब्दः शब्दोन्मेषोऽर्थ उच्यते । उद्यच्छब्दोदयः शक्तेः प्रथमः शान्ततात्मनः ॥ स नाद इति विख्यातो वाच्यतामसृणस्तदा । नादेन सह शक्तिः सा सूक्ष्मेति परिगीयते ॥ नादात् परो य उन्मेषो द्वितीयः शक्तिसंभवः । (बिन्दुरित्युच्यते सोऽत्र वाच्योऽपि मसृणः स्थितः ॥) पश्यन्ती नाम साऽवस्था मम दिव्या महोदया । ततः परो य उन्मेषस्तृतीयः शक्तिसंभवः ॥ मध्यमा सा दशा तत्र संस्कारयति सङ्गतिम् । वाच्यवाचकभेदस्तु तदा संस्कारतामयः ॥ चतुर्थस्तु य उन्मेषः शक्तेर्माध्यमिकात् परः । वैखरी नाम साऽवस्था वर्णवाक्यस्फुटोदया ॥ अस्ति शक्तिः क्रियात्मा मे बोधरूपाऽनुसारिणी । सा प्राणयति नादादिं शक्त्युन्मेषपरम्पराम् ॥ शान्तरूपाऽथ पश्यन्ती मध्यमा वैखरी तथा । —(१८।२२-२९) इति । बोधमारुतहृत्पूर्वस्थानेष्वभ्युदितं क्रमादिति पश्यन्त्याद्यवस्थात्रयस्य विशेषणं बोध्यम्,
२८६ सात्वतसंहिता वैखरी शब्दनिष्पत्तिर्मध्यमा बुद्धिसंयुता । द्योतितार्था च पश्यन्ती सूक्ष्मा वागनपायिनी ॥ इत्युक्तैः ॥ १५३-१५६ ॥ अब वेदव्यास का ध्यान कहते हैं—जो आत्मस्वरूप को प्रकाशित करने वाले, वेदमण्डल को स्वयं अपने ज्ञान से पश्यन्ती, मध्यमा एवं वैखरी पूर्वक तीन भागों में प्रविभक्त करते हैं, जो ज्ञानरूपी वायु से आहरण किये जाने के स्थान में उत्पन्न होते हैं । ऐसे अलसी पुष्प के समान प्रभा वाले भगवान् वेदव्यास का स्मरण करना चाहिये । जो अपने बायें हाथ से सभी शास्त्रों की पुस्तक तथा दाहिने हाथ से सभी शास्त्रों का उपदेश यथास्थित रूप से करते हैं और जो त्रिकालवेत्ता हैं, जो युगानुसारी बोध को बिना परिश्रम ज्ञान के लिये एक ही वेद को चार भागों में विभक्त कर देते हैं, उन वेदव्यास का ध्यान करना चाहिये ॥ १५३-१५६ ॥ ३४. कल्किध्यानकथनम् दानधर्मरतानां च यागयज्ञानुयाजिनाम् । तपःस्वाध्यायसक्तानां मुक्तानां वै पुनर्भावात् ॥ १५७ ॥ संरक्षणाय योग्यत्वविज्ञानव्यक्तयेऽपि च। समुदेति जगन्नाथस्तेषां हृत्कमलावने ॥ १५८ ॥ मनोवाजिनमाक्रम्य त्वादद्यात्मगुणायुधान् । नूनमुत्पाटयत्याशु जन्मान्तरशतोत्थितम् ॥ १५९ ॥ वैषयं वासनाजालं शुद्धविज्ञानसिद्धये । ध्यायेद् वराश्वगं तं वै तनुत्रावृतविग्रहम् ॥ १६० ॥ सितोष्णीषललाटं च नातिदीर्घजटाधरम् । द्रवत्कनकवर्णाभम् इषुधिद्वयमध्यगम् ॥ १६१ ॥ शरचापकरव्यग्रं खड्गकुन्तकुठारिणम् । यज्ञाध्ययनदानानि परिरक्षन्तमेव हि ॥ १६२ ॥ शातयन्तमवर्णांश्चाप्यधर्मनिरतात्मनः । अथ कल्किध्यानमाह—दानधर्मरतानां चेत्यादिभिः । अस्य स्थानं तु श्री- पौष्करे— कल्की विष्णुश्च भगवान् स्तूयमानो द्विजैः स्थितः । समासाद्य विपाशां च नदीं नियतमानसः ॥ (३६।३३१) इति ॥ १५७-१६३ ॥ अब कल्कि का ध्यान कहते हैं—दान, धर्म में निरत, योग-यज्ञ करने वाले तपःस्वाध्याय में लगे हुए, मुक्त जनों को संसार से संरक्षण के लिये,
द्वादशः परिच्छेदः २८७ सर्वोत्तम विज्ञान प्रगट करने के लिये, जो जगन्नाथ हृदयरूपी कमलावन में उत्पन्न होते हैं, जो मन रूपी घोड़े पर चढ़कर, अपने गुणरूपी आयुध को लेकर, सैकड़ों जन्म से उत्पन्न वैषयिक वासना जाल को शुद्ध विज्ञान वृद्धि के लिये शीघ्र उखाड़ कर फेंकते हैं, ऐसे शीघ्रगामी घोड़े पर सवार होकर शरीर में कवच धारण किये हुए, सिर पर स्वच्छ उष्णीष (साफा) बाँधे हुए, सामान्य जटा धारण किये हुए, तप्त काञ्चन के समान उद्दीप्त, दो तरकसों में बाण तथा हाथ में धनुष धारण किये हुए, तलवार, भाला और कुठार धारण कर संसारी लोगों के यज्ञ, अध्ययन एवं दान की रक्षा करते हुए, अधर्म निरत पापियों को विनष्ट करने वाले भगवान् कल्कि का ध्यान करना चाहिये ॥ १५७-१६३ ॥ ३५. पातालशयनध्यानकथनम् सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् । आधारं भुवनानां च ध्यातव्यस्तदधः स्थितः ॥ १६४ ॥ अनन्तशयनारूढः कल्पान्तहुतभुक्प्रभः । ज्वलज्ज्वालावलीयुक्तो ज्वलनांशुकवेष्टितः ॥ १६५ ॥ चक्राद्यायुधवृन्देन मूर्तेन परिवारितः । स्थिताङ्घ्रिदेशतो लक्ष्मीश्चिन्ता दक्षिणतो विभोः ॥ १६६ ॥ मूर्धदेशगता निद्रा पुष्टिस्तद्वामतः स्थिता । पातालशयनध्यानमाह—सर्वतत्त्वाश्रयमित्यादिभिः । पद्मनाभपातालशय्येकार्ण- वशायिन्यग्रोधशायिनां स्थानानि श्रीपौष्करे प्रतिपादितानि— क्षीरोदधौ पद्मनाभः शेषाहिशयनो हरिः । स्थितो नाभ्यब्जसंभूतो यस्माच्चैव पितामहः ॥ चतुर्धा रूपमाश्रित्य विश्वेऽस्मिन् सैव वर्तते । हिताय सर्वलोकानां यथा तदवधारय ॥ आसाद्य शयनं ब्रह्मन् पातालतलसंस्थितः । वटमादाय चाग्नेयं योऽन्ते संहरते जगत् ॥ वटमूलं समाश्रित्य प्रयागे सुरपूजिते । जगदेकार्णवं कृत्वा दिव्यमासाद्य पादपम् ॥ संतिष्ठते स भगवान् तस्मिंस्तीरे क्षितौ द्विज । न्यग्रोधशयनं चैव ध्यायेद् दिव्यगतिप्रदम् । (३६।३३८-३४२) अस्यैवं शक्तिचतुष्टयान्वितत्वं लक्ष्मीतन्त्रेऽप्युक्तम्— अनन्तशयनो नाम योऽवतारो हरेरहम् ॥ स्थिता चतुर्दिशं तस्य चातुरात्म्यमुपेयुषी । लक्ष्मीश्चिन्ता तथा निद्रा पुष्टिश्चेताख्यया युता ॥ (८।३५-३६) इति ॥ १६३-१६७ ॥
अब पातालशयन का ध्यान कहते हैं—सभी तत्त्वों के आश्रय तत्त्व, सर्व- शक्तिमय, विभु (= व्याप्त), सभी इन्द्रियों को भासित करने वाले, किन्तु स्वयं सर्वान्द्रिय विवर्जित, सभी भुवनों के आधार, पाताल में स्थित, अनन्तशायी और कल्पान्त अग्नि स्वरूप पातालशायी भगवान् का ध्यान करना चाहिये । जो जाज्वल्यमान ज्वाला से युक्त ज्वलन का वस्त्र धारण किये हुए हैं । जो मूर्त्तिमान् चक्रादि आयुध समूह रूप परिवारों से घिरे हुए हैं । जिनके पाद-प्रदेश में लक्ष्मी तथा जिन प्रभु के दाहिने चिन्ता स्थित हैं, शिर के पास निद्रा एवं बायीं ओर पुष्टि स्थित हैं इस प्रकार के पातालशायी प्रभु का ध्यान करना चाहिए ॥ १६३-१६७॥
प्रधानदेवताध्यानमिदमुक्तं समासतः ॥ १६७ ॥ यज्ज्ञात्वा विनिवर्त्तन्ते जन्ममृत्युजरारुजः । नास्त्रैर्वस्त्रैर्ध्वजैर्येषां व्यक्तिर्व्यक्ता जगत्त्रये ॥ १६८ ॥ तेऽपि लाञ्छनवृन्दं तु धारयन्त्यङ्घ्रिगोचरे । ललाटे चांसपट्टे तु पृष्ठे पाणितलद्वये ॥ १६९ ॥ तनूरुहचये मूर्ध्नि कर्मिणां प्रतिपत्तये ।
फलकथनेन सहोक्तमर्थं निगमयति—प्रधानेति । एषां विभवदेवानामुक्तक्रमेण हस्तादिषु तत्तन्मूर्त्तिज्ञापकायुधादिलाञ्छनराहित्ये- ऽपि तेषामङ्घ्रिललाटादिषु लाञ्छनमस्ति, तत्सावधानं परीक्षित्वव्यमित्याह—नास्त्रैरिति द्वाभ्याम् । इदं श्लोकद्वयमीश्वर (३।१८४-१८३) पारमेश्वर(१०।९३-९५)योरपि विमानार्चनप्रकरणे प्रतिपादितम् । किन्तु तयोः केषुचित् कोशेषु—''अस्त्रैर्वस्त्रै- र्ध्वजैर्येषाम्'' इति नकारो न दृश्यते । तल्लेखकप्रमादकृतम्, मूलविरुद्धत्वात् । यद्वा ईश्वरव्याख्याने तत्पाठस्यापि गतिर्दर्शिताैव । पारमेश्वरव्याख्याने—''अङ्घ्रिगोचरे स्थित्यासनादिना, ललाटे नेत्रत्रयादिना, अंसपट्टे भुजभेदेन, पृष्ठे शरचक्रादिना'' इत्यादिक्रमेण व्याख्यातम् । तदसंगतम्, लाञ्छनशब्दस्य चक्रादिपरत्वेनैव सार्वत्रिक- प्रसिद्धेः । उत्तरश्लोक एव ''न जहात्यच्युतं लिङ्गम्'' (१२।१७१) इति कण्ठरवेणात्र वक्ष्यमाणत्वाच्च ॥ १६७-१७०॥
यहाँ तक हमने संक्षेप में प्रधान देवता का ध्यान कहा । (अध्याय नव में पाताल शयन प्रभु ही तक मुख्य अवतार कहा गया है जैसा कि वेदवित् भगवान् कल्की पाताल शयनः प्रभुः १९.९३) कहा । अब विभव देवताओं का वर्णन करते हैं—जिनके ज्ञान से जन्म, मृत्यु, जरा और रोग निवृत्त हो जाते हैं, जिनकी अभिव्यक्ति (प्राकट्य) अस्त्र, वस्त्र और ध्वज से तीनों लोक में नहीं जानी जाती किन्तु वे भी अपने पैरों में, ललाट में, अंसपट्ट में, पृष्ठ में, दोनों हाथों में, बालों में एवं शिर में कर्म करने वाले जीवों के ज्ञान के लिये तथा संसारी मनुष्यों के लिये अथवा वैष्णव स्वभाव से लाञ्छन वृन्द धारण करते हैं ॥ १६७-१७० ॥
द्वादशः परिच्छेदः २८९ अपि संसारिणो जन्तोः स्वभावाद् वैष्णवस्य च ॥ १७० ॥ न जहात्यच्युतं लिङ्गं किं पुनर्विभवाकृतेः । सर्वेषां कामचारित्वं यदुक्तं वै मया पुरा ॥ १७१ ॥ तदङ्घ्रिभुजवर्णास्यबृहन्मध्याणुलक्षणम् । एकाद्यनेकसंख्यं च दृश्यं सर्वत्र सर्वदा ॥ १७२ ॥ उक्तमर्थं किंपुनर्न्यायेन द्रढयति—अपीति । जन्तोरिति, विभवाकृतेरिति च कर्मणि षष्ठी । केवलवैष्णवजनस्यैव सामुद्रिकलक्षणपरीक्षणकाले हस्ताद्यवयवेषु चक्रादिलाञ्छनं दृश्यते । साक्षाद्विष्णोर्विभवावतारस्य तथा लाञ्छ(नस्त्वेकः?ने कुतः) संदेह इति भावः । उक्तानां विभवदेवानां सर्वेषामपि "कृष्णरूपाण्यसंख्यानि" इतिवद् भुजवर्णाद्युधादिभिरसंख्यातकामरूपधरत्वमाह—सर्वेषामिति सार्धेन ॥ १७०-१७२॥ जब वे अपना अच्युत लिङ्ग (= चिह्न) भी नहीं त्यागते हैं, फिर विभवा- कृति चिह्न के विषय में क्या कहा जाय? ऊपर कहे गये सभी विभव देवों के जब असंख्य कृष्ण रूप हैं तब उनकी भुजायें, वर्ण और आयुध भी असंख्य हो सकते हैं ॥ १७०-१७२ ॥ न त्वन्यरूपता कार्या करणं कामरूपता । यस्मादस्ति पृथग्भूतो व्यापारो विश्वमन्दिरे ॥ १७३ ॥ देवानां स्थितिसंहारसृष्टिकाले स्वकः स्वकः । सत्येवं नियमे सिद्धे तथापि भगवद्वशात् ॥ १७४ ॥ चातुरात्म्यसमूहात् तु यत्पद्मदलभूस्थितम् । तथा विभवदेवानां मध्यात् पद्मदलेक्षण ॥ १७५ ॥ एकस्त्वनुग्रहार्थं तु शक्त्यात्मा भावितात्मनाम् । बिभर्ति बहुभेदोत्थं रूपं सद्वाहनस्थितम् ॥ १७६ ॥ एवं सर्वेषां कामरूपवत्तापि नहि मूर्त्तिविपरीतज्ञानजननी, तत्तन्मूर्त्तिनिर्णायक- विजातीयस्वस्वव्यापारसत्त्वादित्याह—न त्विति सार्धेन । यद्यप्येवं सर्वेषां कामरूप- धरत्वनियमः सिद्धः, तथापि सर्वे देवा युगपत् कामरूपधरा न भवन्ति, जाग्रद्व्यूह- वासुदेवादीनां मध्ये पद्मनाभादिविभवदेवानां मध्ये वा एको जगद्रक्षणार्थं वक्त्रभुजास्त्र- शक्तिवाहनभेदैर्बहुधा रूपं बिभ्रन् शक्त्यात्मसंज्ञां भजतीत्याह—सत्येवमिति सार्ध- द्वाभ्याम् । यत्पद्मदलभूस्थितं जाग्रद्व्यूहसं(ज्ञां?ज्ञं) चातुरात्म्यमित्यर्थः, तत्पत्रमध्ये भगवान् जाग्रत्संज्ञे पदे त्वथ । यष्टव्यो भावनीयश्च यथा तदधुनोच्यते ॥ (५।४) इति जाग्रद्व्यूहस्य हि पद्मदलभूस्थितत्वमुक्तम् ॥ १७३-१७६ ॥ इस प्रकार सबकी कामरूपता भी मूर्त्तिविपरीत ज्ञान की जननी नहीं हैं
२९० सातवतसंहिता क्योंकि उसमें तत्तन्मूर्त्ति निर्णायक द्विजातीय एवं स्व-स्व व्यापार स्थित हैं, क्योंकि इस विश्वमन्दिर में उन देवताओं के सृष्टि, स्थिति एवं संहार काल में अपने-अपने कामरूप परतत्त्व के नियम हैं तथापि भगवद्वश से एवं चातुरात्म्य समूह से जो पद्मदल की भूमि में स्थित हैं वे जाग्रद् व्यूह वासुदेव के मध्य में, अथवा पद्मनाभादि विभव देवों के मध्य में कोई एक भी इस जगत् की रक्षा के लिये वक्त्र, भुजा, अस्त्र, शक्ति एवं वाहन भेदों से अनेक रूप धारण करते हुए शक्ति संज्ञा प्राप्त कर लेते हैं ॥ १७०-१७६ ॥ वाहनस्य भेदान्, तल्लक्षणकथनम् यदनुस्मरणाद् ध्यानादर्चनादचिरात् पुमान् । प्राप्नोति मनसोऽभीष्टं तन्मे निगदतः शृणु ॥ १७७ ॥ सत्यः सुपर्णो गरुडस्तार्थ्यश्च विहगेश्वरः । पञ्चात्मकस्य प्राणस्य विकारस्त्वेष पञ्चधा ॥ १७८ ॥ आचाङ्घ्रिगोचरात् सर्वो यस्य देहस्तु पौरुषः । द्विभुजस्तुहिनाभश्च स सत्यः प्राणदैवतम् ॥ १७९ ॥ सुपर्णः पद्मरागाभो निर्मलः स्वर्णलोचनः । गरुडः काञ्चनाभस्तु कुटिलभ्रवरुणेक्षणः ॥ १८० ॥ केकराक्षस्तु तार्थ्यो वै प्रावृड्जलदसन्निभः । द्रवत्कनकनेत्रस्तु शबलाभश्च पञ्चमः ॥ १८१ ॥ चतुर्भुजाः सुपर्णाद्याः सौम्यरूपास्त्वनाकुलाः । पतत्त्रिचरणाः सर्वे पक्षमण्डलमण्डिताः ॥ १८२ ॥ लम्बोदराः सुपीनाङ्गाः कुण्डलाद्यैस्तु भूषिताः । कुटिलभूसुवृत्ताक्षा वक्रतुण्डाः स्मिताननाः ॥ १८३ ॥ अपानादिसमीराणामाधिपत्येन संस्थिताः । महाबला महाकाया रक्ततुण्डोऽत्र पञ्चमः ॥ १८४ ॥ आधेयचरणाधःस्थः सव्य आद्यस्य वै करः । दक्षिणश्चाक्षसूत्रेण सुसितेन च भासितः ॥ १८५ ॥ एवमेव सुपर्णस्य परिज्ञेयं भुजद्वयम् । नाभ्युद्देशेऽपरो वाम उत्तानस्तु सविस्मयः ॥ १८६ ॥ पुष्पस्तबकसम्पूर्ण ऊर्ध्ववक्त्रस्तु दक्षिणः । गरुडस्य द्वयं विद्धि हृद्देशेऽञ्जजलीरूपिणम् ॥ १८७ ॥ तत्रैव सम्पुटाकारं चतुर्थस्य करद्वयम् ।
द्वादशः परिच्छेदः २९१ दक्षिणेऽमृतकुम्भस्तु वामे तु विषमः फणी ॥ १८८ ॥ पञ्चमस्य द्वयं शेषं त्रयाणां च द्वयोः समम् । आधेयचरणाक्रान्तो यदि वै दक्षिणः करः ॥ १८९ ॥ सञ्चारो विहितो वामे त्वक्षसूत्रस्य वै तदा । आधेयचरणाधःस्थं यस्य पाणितलद्वयम् ॥ १९० ॥ निरस्तसूत्रं तं विद्धि वाहनं भगवन्मयम् । अथ प्रसक्तस्य वाहनस्य भेदान् तल्लक्षणं चाह—यदनुस्मरणादित्यादिभिर्भागव- न्मयमित्यन्तैः । आ चाङ्घ्रिगोचरात् चरणादारभ्य यस्य सर्वो देहः पौरुषः समस्तोऽपि कायः पुरुषाकृतिरित्यर्थः । प्राणदैवतं प्राणाधिपतिरित्यर्थः । केकराक्षः केकरे वक्रे अक्षिणी यस्य स तथोक्तः । "बलिरः केकरे" (२।६।४९) इत्यमरः । केकरपदेनैव वक्राक्षत्वे सिद्धेऽप्यत्र पृथगक्षपदनिर्देशात् केकरशब्दस्य वक्रमात्रपरत्वं बोध्यम् । पारमेश्वरव्याख्याने तु—"केकराक्षो भगवद्ध्यानवशादर्धोन्मीलितलोचनः" इति लिखितम्, तद्विचारणीयम् । शबलाभः = चित्रवर्णाभ इत्यर्थः । आद्यस्य सत्यस्य सव्यः करो वामहस्तः । आधेयचरणाधस्थः आधेयस्य निजस्कन्धाधिरूढस्य भगवतः पादपद्माधः स्थित इत्यर्थः । दक्षिणस्तु अक्षसूत्रेण भासितः । अत्र चकारद्वयेन कदाचिद्वामहस्तस्याप्यक्षसूत्रभासितत्वम्, दक्षिणस्याप्याधेयचरणा(धः)स्थितत्वं च संभवतीत्यर्थः सूच्यते— आधेयचरणाक्रान्तो यदि वै दक्षिणः करः । सञ्चारो विहितो वामे त्वक्षसूत्रस्य वै तदा ॥ —(१२।१८९-१९०) इत्युक्तेः । ननु— स्वस्वाङ्गुष्ठद्वयप्रोतगणित्रोभयपाणिना । पुष्पाञ्जलिधराः सर्वे मुख्येन विहगोत्तमाः ॥ —(ई०सं० ८।४८, पा०सं० ८।४७-४८) इतीश्वरपारमेश्वरोक्तेः करद्वयेऽप्यक्षसूत्रधारणं स्यात्, किन्तु दक्षिणहस्ते भग- वच्चरणाक्रान्ते सति तदा वामहस्तस्थितस्याक्षसूत्रस्य सञ्चारो गणनार्थं सञ्चालनं स्यादित्यर्थः सरस इति चेन्न, आधेयचरणाधःस्थं यस्य पाणितलद्वयम् । निरस्तसूत्रं तं विद्धि वाहनं भगवन्मयम् ॥ —(१२।१९०-१९१) इति वचनविरोधात् । भ(ग?) वदुक्तार्थे सिद्धे निरस्तसूत्रसञ्चारं तं विद्धीति वचनं (कथं) प्रवर्तेत । स्वस्वाङ्गुष्ठद्वयप्रोतगणित्रोभयपाणिनेत्यत्रापि पुष्पाञ्जलिप्रकरणाद- ङ्गुष्ठद्वयप्रोतमेकमेवाक्षसूत्रमिति ज्ञायते । यद्वा दक्षिणे वामे वाऽङ्गुष्ठेऽक्षसूत्रं धार्यमिति ज्ञापनार्थमङ्गुष्ठद्वयमप्युक्तमिति ज्ञेयम् । सुपर्णस्य भुजद्वयं मुख्यहस्तद्वयमेवमेव सत्योक्तलक्षणमेवेत्यर्थः । अपरो वामः
२९२ सात्वतसंहिता पाश्चात्यो वामहस्तः सविस्मयः, विस्मयमुद्रान्वित इत्यर्थः । दक्षिणः पाश्चात्यो दक्षिण- हस्तस्तु पुष्पस्तबकसम्पूर्णः, मन्दारपुष्पस्तबकान्वित इत्यर्थः । ऊर्ध्ववक्त्र उत्तानश्रे- त्यर्थः । तथा चेश्वरपारमेश्वर्योः— सुपर्णः पश्चिमाभ्यां तु पाणिभ्यां दक्षिणादितः । मन्दारपुष्पस्तबकं दधद् विस्मयमुद्रिकाम् ॥ इति । —(ई०सं० ८।४९, पा० सं० ८।४८-४९) गरुडस्य द्वयं पश्चात्करद्वयमित्यर्थः । चतुर्थस्य करद्वयं तार्क्ष्यस्य पश्चात्कर- द्वयमित्यर्थः । पञ्चमस्य विहगेश्वरस्य दक्षिणे पश्चाद्दक्षिणकरे । वामे पश्चाद्वामकर इत्यर्थः । त्रयाणां गरुडतार्क्ष्यविहगेश्वराणाम् । शेषं द्वयमवशिष्टं मुख्यहस्तद्वयम् । द्वयोः समं सत्यसुपर्णयोः समम्, तन्मुखहस्तयोः सदृशमिति यावत् । ननु गरुडस्य द्वयमित्याद्युक्तमेव मुख्यहस्तद्वयं स्यात् । त्रयाणां शेषं पश्चात्करद्वयं द्वयोः सुपर्णपश्चात्करयोः सदृशमित्यर्थः सरस इति चेन्न, तथाऽर्थवर्णने तत्तत्स्कन्धा- धिरूढभगवच्चरणारविन्दयोराधारासिद्धेः, “पञ्चमो विहगेश्वरः । दक्षिणेन सुधाकुम्भं वामेन तु फणीश्वरम्” (ई०सं० ८।५१, पा०सं० ८।५०-५१) इतीश्वरपारमेश्वरो- पबृंहणविरोधाच्च । ननु किं तर्हि मूलोपबृंहणयोः सर्वत्रैकार्थ्यं संभवति ? अत्र भवदुक्तरीत्या विरोधे परिहृतेऽपि, तथाविधाभ्यां गरुडस्ते धत्ते व्यत्ययेन तु । तार्क्ष्यः पश्चिमयोर्नित्यं धत्ते दक्षिणवामयोः ॥ कद्रू तथाऽमृतं कुम्भम् .... ..... ........ —(ई०सं८।५०-५१, पा०सं० ८।४९-५०) इति वचनम्, स्वस्वाङ्गुष्ठद्वयप्रोतगणिन्त्रोभयपाणिना । पुष्पाञ्जलिधराः सर्वे मुख्येन विहगोत्तमाः ॥ —(ई०सं० ८।४८, पा०सं० ८।४७-४८) इति वचनं च मूलविरुद्धं भवति । तत्र का गतिरिति चेत्, सत्यम् । उप- बृंहणवचनविरोधेऽपि न प्रत्यवायः । तथाहि—तत्र सत्यादीनां प्रधानपक्षीश्वरपरिवार- त्वदशाप्रकरणाद् भगवद्वाहनत्वस्य तदानीमप्राप्तत्वाच्च सर्वेषामपि मुख्यहस्ताभ्यां पुष्पाञ्जलिधरत्वमेवोक्तम्, सुपर्णविहगेश्वरयोर्मूलानुसारेणैव सामञ्जस्यात् । पश्चा- त्कराभ्यां पुष्पस्तबकविस्मयमुद्रिकाधारणं सुधाकुम्भफणीश्वरधारणं चोक्तम् । गरुड- तार्क्ष्ययोस्तु मुख्यहस्ताभ्यामेव पुष्पाञ्जलिधारणस्योक्तत्वात् पुनः पश्चात्कराभ्यामञ्जलि- पुटधारणस्यासामञ्जस्यात् सुपर्णविहगेश्वरोक्तलाञ्छनयोरेवाभ्यां व्यत्ययेन धारण- मुक्तमिति ज्ञेयम् । भगवद्वाहनत्वदशायां सत्यादीनां ध्यानं तु यथामूलं विलिखित- मीश्वरे ॥ १७७-१९९ ॥
द्वादशः परिच्छेदः २९३ जिसके अनुसरण से, ध्यान से, अर्चन से पुरुष अपना अभीष्ट प्राप्त कर लेता है। सत्य, सुपर्ण, गरुड़, तार्क्ष्य और विहगेश्वर ये सभी पञ्चप्राण के विकार हैं, जिनका चरण से लेकर समस्त देह पुरुषाकृति है, जिनकी दो भुजायें हैं, जो तुहिन के समान स्वच्छ हैं, वह प्राण दैवत सत्य हैं। जिसकी पद्मरागमणि के समान निर्मल कान्ति है, सोने के समान चमकीली आँखें हैं, वह सुपर्ण हैं। जिसके शरीर की आभा काञ्चन के समान है, भ्रू कुटिल हैं, नेत्र लाल हैं, वह गरुड़ हैं। जिसकी आँखें वक्र हैं, जो वर्षाकालीन बादल के समान हैं, वह तार्क्ष्य हैं। तप्त कनक के समान चमकीले नेत्रों वाला चित्रवर्ण पञ्चम विहगेश्वर हैं। सुपर्णादि सभी चार भुजा वाले, सौम्य स्वरूप, धैर्यशाली, पक्षियों के समान चरण वाले, पङ्कों के मण्डल से मण्डित, लम्बोदर, मोटे तथा कुण्डलादि से विभूषित हैं, उनका भ्रू कुटिल है। मुख गोल है और नासिका चोंच की तरह टेढ़ी है, प्रसन्नचित्त हैं, ये सभी अपानादि वायुओं के अधिपतित्व के रूप में स्थित हैं, सभी महाबलवान् हैं, महाकाय हैं, इसमें पाँचवे विहगेश्वर रक्त तुण्ड हैं। आद्य प्राण अधिदैवत सत्य का बायाँ हाथ आधेय विष्णु के चरण के नीचे है। दाहिना हाथ भगवान् के अक्षसूत्र से भासित है। इसी प्रकार सुपर्ण की दोनों भुजायें सत्य की दोनों भुजाओं के समान हैं, ऐसा समझना चाहिये। पीछे का बायाँ दूसरा हाथ नाभि देश पर उतान है तथा विस्मय युक्त है। पीछे का दाहिने हाथ फूल के गुच्छों से युक्त है। ऊपर का मुख उतान है और गरुड़ का पीछे का दोनों हाथ हृदय स्थान पर अञ्जलि रूप में है। चतुर्थ तार्क्ष्य का दोनों हाथ वही सम्पुटाकार है। उनके दाहिने हाथ में अमृत का कुम्भ है और बायें हाथ में विषैला सर्प है। विहगेश्वर का दो हाथ खाली है, इस प्रकार तीन में दो का हाथ समान है। यदि दाहिना हाथ आधेय से आक्रान्त है तब वे बायें हाथ से अक्षमला घुमाते हैं। किन्तु जिनका दोनों हाथ आधेय के चरण के नीचे है, तब उन भगवन्मय वाहन को माला (अक्षसूत्र) से रहित समझना चाहिये ॥ १७७-१९१ ॥ अनुग्रहपरस्तवास्ते पक्षिपक्षाब्जविष्टरे ॥ १९१ ॥ स्वतेजोनिजसामर्थ्यमसूरकवरान्विते । पद्मासनादिना चैव केवलं वा श्रियान्वितः ॥ १९२ ॥ सुव्यक्तावयवस्थित्या विद्धि तं गरुडासनम् । एवमुक्तलक्षणे वाहने भगवदवस्थानक्रममाह—अनुग्रहेति द्वाभ्याम्। स्वतेजो- निजसामर्थ्यमेव मसूरकवरमास्तरणोत्तमं तेनान्विते ॥ १९१-१९३ ॥ भगवान् पक्षि के पक्ष रूपी कमल के विष्टर पर बैठे हुए हैं और वह अनुग्रह परायण रहते हैं। ऐसे तो अपने तेज, अपने सामर्थ्य से वे खोली युक्त रूई के गद्दे
२९४ सात्वतसंहिता अथवा पद्मासन पर रहते हैं। किन्तु वहाँ अकेले नहीं रहते लक्ष्मी के साथ से रहते हैं सुव्यक्त (स्पष्ट) शरीरावयव स्थिति में वे गरुड़ासन पर रहते हैं ॥ १९१-१९३ ॥ मेढ्रभूः सोदराऽस्यैव गोपिता वेगगामिना ॥ १९३ ॥ वीर्यपातात् स्वशिरसा गच्छतश्चाण्डजेन तु । भगवन्मेढ्रप्रदेशस्य पक्षीश्वरशिरसा गोपने प्रयोजनमाह—मेढ्रभूरिति । सोदरा उदरसहितेत्यर्थः । वीर्यपातादिति ल्यब्लोपे पञ्चमी । अण्डजेन (=पराक्रम) पक्षिणा गरुडेनेत्यर्थः ॥ १९३-१९४ ॥ वे गरुड़ जब चलने लगते हैं तब अपने वेगगामी शिर से उनके वीर्यपात से अण्डकोश को छिपा देते हैं ॥ १९३-१९४ ॥ लोकान्तराणां कार्यार्थं वात्सल्याद् ध्यायिनामपि ॥ १९४ ॥ प्रत्यक्षदर्शनार्थं तु स्मृतो गरुडवाहनः । भगवतो गरुडारोहणप्रयोजनमाह—लोकेति ॥ १९४-१९५ ॥ लोकान्तर में कार्य के लिये, अथवा ध्यान करने वालों पर वत्सलता प्रगट करने के लिये, अथवा प्रत्यक्ष दर्शन के लिये वे गरुड़ को वाहन रूप में स्मरण करते हैं ॥ १९४-१९५ ॥ तस्माद् भगवतो विष्णोरेवंरूपधरस्य तु ॥ १९५ ॥ समाहूतस्य सिद्ध्यर्थमासीनां संस्मरेत् स्थितिम् । साधकेन तत्तत्फलसिद्ध्यर्थं भगवदासनभेदः स्मर्तव्य इत्याह— तस्मादिति ॥ १९५-१९६ ॥ उपसंहृतवामाङ्घ्रिः कञ्जस्थो वा खगस्थितः ॥ १९६ ॥ वाममिच्छाफलानां यो ध्वंसयत्यन्यचिन्तितम् । आजानोर्दक्षिणस्यैवमविक्षिप्तः स्मृतोऽच्युतः ॥ १९७ ॥ आमोक्षात् सर्वसिद्धीनां दक्षिणोऽध्यायिनां भवेत् । सर्वमेव ऋजुस्थित्या संस्थितश्चार्थिना स्मृतम् ॥ १९८ ॥ स्वस्तिकाद्यैर्भवत्येवं किन्तु ते वाहनं विना । विहिताः पीठकह्वारसिंहासनगतस्य च ॥ १९९ ॥ आकुञ्चितवामपादो भगवाननिष्टं निवारयतीत्याह—उपसंहृतेति । वामं प्रति- कूलमित्यर्थः । कुञ्चितदक्षिणाङ्घ्रिस्त्विष्टं प्रापयतीत्याह—आमोक्षादिति । दक्षिण उदार इत्यर्थः । तदुभयं विना ऋजुस्थितो भगवाननिष्टनिवारमिष्टप्रदानं च सर्वं करोतीत्याह—सर्वमित्यर्धेन । एवं स्वस्तिकाद्यासनभेदा वाहनं विना पीठाधिरूढस्यापि संभवन्तीत्याह—स्वस्तिकाद्यैरिति ॥ १९६-१९९ ॥
द्वादशः परिच्छेदः २९५ इस कारण, भगवान् के इस प्रकार रूप धारण करने पर, सिद्धि की प्राप्ति के लिये बुलाये जाने पर, गरुड़वाहन विष्णु का ध्यान करे, अथवा बायें पैर को समेटे हुए कमल पर बैठे हुए ध्यान करे, अथवा गरुड़ पर बैठे हुए भगवान् का ध्यान करे । (यहाँ (काम्य कर्म रूप) कार्य भेद से विष्णु के आसन का भेद कहा गया) ये भगवान् प्रतिकूल इच्छित फल को शीघ्र विनष्ट करते हैं । इस प्रकार ध्यान करने वाले भक्तों द्वारा बुलाने पर भगवान् अच्युत जानु से लेकर दाहिने पैर को संकुचित कर सभी सिद्धियों से लेकर मोक्ष पर्यन्त सब कुछ देने के लिये तैयार रहते हैं । दोनों पैरों के संकोच विना केवल ऋजु स्थिति में भी वे वैष्णव अर्थियों को सब कुछ देने के लिये स्थित रहते हैं ॥ १९५-१९८ ॥ इसी प्रकार स्वस्तिकासन आदि भेद से वाहन के विना भी पीठ एवं कल्हार तथा सिंहासन पर बैठ कर भी वे वाञ्छित पूर्ण करते रहते हैं ॥ १९९ ॥ विहगाधिपतिश्चात्र योगैश्वर्याद् बिभर्ति च । सवक्त्रं भुजवृन्दं तु नागेन्द्रास्त्रवरान्वितम् ॥ २०० ॥ विभोराज्ञावशेनैव तुष्ट्यर्थं वा स्वयं विभोः । जगज्जयोद्यार्थं तु शान्तये शरणैषिणाम् ॥ २०१ ॥ विभिन्नेन च रूपेण नानालोकान्तरेषु च । अनिरुद्धगतिर्वीरो विचरत्येक एव हि ॥ २०२ ॥ स्वाधिरूढशक्तीश इव पक्षीशोऽपि तदाज्ञया निखिलजगत्संरक्षणार्थं वक्त्र- भुजायुधादिभिर्विविधस्वरूपः स्वयमेक एव सर्वत्र विचरतीत्याह—विहगाधिपतिरिति त्रिभिः ॥ २००-२०२ ॥ इसी प्रकार पक्षीश भी भगवान् की आज्ञा से समस्त जगत् की रक्षा के लिये मुख सहित भुजवृन्द नागेन्द्र युक्त श्रेष्ठ अस्त्र धारण कर भगवान् की आज्ञावश होकर, अथवा अपनी तुष्टिवश, अथवा जगज्जय के लिये, अथवा शरणार्थियों को शरण देने के लिये विभिन्न रूप धारण कर अनेक लोक-लोकान्तरों में बेरोक-टोक अकेले विचरण करते हैं ॥ २००-२०२ ॥ तदारूढस्य यद् रूपं शक्तीशस्य च सम्प्रति । अनेकभेदभिन्नं तु निबोध गदतो मम ॥ २०३ ॥ शक्तीशस्य रूपभेदान् शृण्वित्याह—तदारूढस्येति ॥ २०३ ॥ गरुड़ पर आरूढ़ रहने वाले शक्तीश का सम्प्रति जो अनेक भेद एवं भिन्न रूप है उसे हे सङ्कर्षण ! आप सुनिये, मैं कह रहा हूँ ॥ २०३ ॥ संयच्छन्तं सदा शान्तिं भविनां दक्षिणेन तु । प्रोद्वहन्तं च वामेन शङ्खं पूर्वोक्तलक्षणम् ॥ २०४ ॥
२९६ सात्वतसंहिता द्विभुजस्य त्विदं रूपं शक्तीशस्य तु केवलम् । रूपेणानेन च पुनः षोढा समुपयाति च ॥ २०५ ॥ सह कान्तागणैनैव त्वेकाद्येन पृथक् पृथक् । प्राग्वल्लक्ष्म्या समेतं यत्तदेकं रूपमैश्वरम् ॥ २०६ ॥ श्रीपुष्ट्योरथ मध्यस्थं द्वितीयं परिकीर्तितम् । श्रियादिमायानिष्ठेन चतुष्केणावृतं परम् ॥ २०७ ॥ पूर्वं केवलं द्विभुजरूपं तस्य लक्ष्यादिभिः षोढा भेदांश्चाह— संयच्छन्त- मित्यादिभिः ॥ २०४-२०७ ॥ वे शक्तीश अपने दाहिने हाथ से संसारी जनों को सर्वदा शान्ति प्रदान करते हैं और बायें हाथ से पूर्वोक्त लक्षण वाला शङ्ख धारण किये हुए हैं । यह केवल शक्तीश का द्विभुज रूप है । वे शक्तीश पुनः इसी रूप से छह प्रकार के हो जाते हैं ॥ २०४-२०५ ॥ वे एकादि कान्ता गणों के साथ पृथक्-पृथक् रूप धारण करते हैं । पूर्व में कही गई लक्ष्मी के साथ उनका जो एक रूप है वह ऐश्वर्य रूप है । जब वे श्री एवं पुष्टि के मध्य में रहते हैं, तब वह दूसरा रूप होता है । जब चारों श्रियादि माया के साथ रहते हैं तब वह उनका तृतीय रूप हो जाता है ॥ २०६-२०७ ॥ शुद्ध्यादिकेन षट्केन चतुर्थं विद्धि संवृतम् । पुष्ट्यन्तेन श्रियाद्येन त्वष्टकेन तु पञ्चमम् ॥ २०८ ॥ लक्ष्म्याद्येन द्विषट्केन षष्ठं विद्धि समन्वितम् । श्रीदेवी कीर्तिदेवी च जयादेवी हलायुध ॥ २०९ ॥ चतुर्थी भगवन्माया विश्वस्यास्य निबन्धनी । शुद्धिर्नीरञ्जना नित्या ज्ञानशक्त्यपराजिते ॥ २१० ॥ प्रकृतिः सुन्दरी षट्कमित्युक्तं सर्वसिद्धिदम् । लक्ष्मीः शब्दनिधिः सर्वकामदा प्रीतिवर्धनी ॥ २११ ॥ यशस्करी शान्तिदा च तुष्टिदा पुष्टिदाष्टकम् । श्रियादिचतुष्टयस्य शुद्ध्यादिषट्कस्य लक्ष्म्याद्यष्टकस्य च नामधेयान्याह— श्रियेति (त्रिभिः?पञ्चभिः) । शब्दनिधिः = सरस्वतीत्यर्थः ॥ २०७-२१२ ॥ शुद्ध्यादि छह के साथ जब वे (शक्तीश) रहते हैं तब उनका वह चतुर्थ रूप होता है । श्री से लेकर पुष्ट्यन्त के साथ जब वे रहते हैं, तब उनका पञ्चम रूप होता है एवं जब लक्ष्म्यादि बारह देवियों के साथ वे रहते हैं, तब उनका षष्ठ रूप होता है ॥ २०८-२१० ॥
द्वादशः परिच्छेदः २९७ हे हलायुध, श्री देवी, कीर्त्ति देवी, जया देवी और चौथी भगवन्माया जो इस समस्त जगत् को बाँधने वाली हैं। ये श्रियादि चतुष्टय है ॥ २०९-२१० ॥ अब शुद्ध्यादि षट्क कहते हैं। शुद्धि, निरञ्जना, नित्या, ज्ञानशक्ति, अपराजिता, सुन्दरी, प्रकृति इसके बाद लक्ष्म्याद्यष्टक, लक्ष्मी, शब्दानिधि (= सरस्वती), सर्वकामदा, प्रीतिवर्धनी, यशस्करी, शान्तिदा, तुष्टिदा और पुष्टिदा ये आठ लक्ष्म्याद्यष्टक हैं ॥ २१०-२११ ॥ द्विषट्कं वैभवे योगे देवीनां कीर्तिदं हि यत् ॥ २१२ ॥ लक्ष्म्याद्यं तच्च बोद्धव्यं भेदेऽस्मिन् पारमेश्वरे । लक्ष्म्यादिद्विषट्कं पूर्वं नवमपरिच्छेदे (९।८५) एवोक्तं द्रष्टव्यमित्याह— द्विषट्कमिति । वैभवे योगे = विभवदेवताकथनप्रकरण इत्यर्थः । नन्वेवं व्याख्यानं सात्वतोपबृंहणलक्ष्मीतन्त्रविरुद्धम्, यतस्तत्र— एकधा द्विचतुर्धा च षोढा चैव तथाष्टधा । पुनर्द्वादशधा चैव तत्र नामानि मे शृणु ॥ श्रीर्नाम द्विभुजस्याहमङ्कस्था वरवर्णिनी । तस्यैवोभयतो रूपे श्रीश्च पुष्टिश्च वासव ॥ चतुर्दिशं तु तस्यैव श्रीः कीर्तिश्च जया तथा । मायेति कृत्वा रूपाणि भुज्येऽहं तेन विष्णुना ॥ तस्यैव कोणषट्कस्था षोढाऽहं शृणु नाम च । शुद्धिर्निरञ्जना नित्या ज्ञानशक्तिश्च वासव ॥ तथाऽपराजिता चैव षष्ठी तु प्रकृतिः परा । तस्यैव चाष्टधा दिक्षु साहं रूपैर्व्यवस्थिता ॥ लक्ष्मीः सरस्वती सर्वकामदा प्रीतिवर्धनी । यशस्करी शान्तिदा च तुष्टिदा पुष्टिरष्टमी ॥ कोणद्विषट्के तस्यैव स्थिता द्वादशधाऽस्म्यहम् । श्रीश्च वागीश्वरी कान्तिः क्रियाशक्तिर्विभूतयः ॥ इच्छा प्रीती रतिश्चैव माया धीर्महिमेति च । —(८।२०-२७) इति श्रीसात्वताष्टमपरिच्छेदोक्तं (८।३१-३२) लक्ष्मीवागीश्वर्यादिद्विषट्कमेव प्रतिपादितम्, अतो वैभवयोग इत्यत्रापि विभोरयं वैभव इति भगवत्सम्बन्धिनि व्रतार्चन इत्येवार्थो वर्णनीय इति चेन्न, सत्यं तन्नायं भवद्दोषः, किन्तु लक्ष्मीतन्त्रलेखकदोषः । यतस्तेन “लक्ष्मीः पुष्टिर्दया निद्रा” (९।८५) इत्यादिश्लोकस्थाने प्रमादात् “श्रीश्च वागीश्वरी कान्तिः” (८।३१-३२) इत्यादिश्लोको विलिखितः । यद्यपि तदेव भवता समर्थितम्, तथापि त्रयोदशपरिच्छेदे ध्यानप्रकरणे (१३।३६-४३) नवमपरि- च्छेदोक्तलक्ष्मीपुष्ट्यादिद्विषट्कस्यैव कण्ठरवेण वक्ष्यमाणत्वान्न भवतोऽभिमतं सिद्ध्यति । ननु च लक्ष्मीतन्त्रकोशेषु सर्वत्राप्येकरूपः पाठः परिदृश्यते, कथं तस्य प्रामा- सा० सं० - २३