भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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द्वादशः परिच्छेदः २८७ सर्वोत्तम विज्ञान प्रगट करने के लिये, जो जगन्नाथ हृदयरूपी कमलावन में उत्पन्न होते हैं, जो मन रूपी घोड़े पर चढ़कर, अपने गुणरूपी आयुध को लेकर, सैकड़ों जन्म से उत्पन्न वैषयिक वासना जाल को शुद्ध विज्ञान वृद्धि के लिये शीघ्र उखाड़ कर फेंकते हैं, ऐसे शीघ्रगामी घोड़े पर सवार होकर शरीर में कवच धारण किये हुए, सिर पर स्वच्छ उष्णीष (साफा) बाँधे हुए, सामान्य जटा धारण किये हुए, तप्त काञ्चन के समान उद्दीप्त, दो तरकसों में बाण तथा हाथ में धनुष धारण किये हुए, तलवार, भाला और कुठार धारण कर संसारी लोगों के यज्ञ, अध्ययन एवं दान की रक्षा करते हुए, अधर्म निरत पापियों को विनष्ट करने वाले भगवान् कल्कि का ध्यान करना चाहिये ॥ १५७-१६३ ॥ ३५. पातालशयनध्यानकथनम् सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् । आधारं भुवनानां च ध्यातव्यस्तदधः स्थितः ॥ १६४ ॥ अनन्तशयनारूढः कल्पान्तहुतभुक्प्रभः । ज्वलज्ज्वालावलीयुक्तो ज्वलनांशुकवेष्टितः ॥ १६५ ॥ चक्राद्यायुधवृन्देन मूर्तेन परिवारितः । स्थिताङ्घ्रिदेशतो लक्ष्मीश्चिन्ता दक्षिणतो विभोः ॥ १६६ ॥ मूर्धदेशगता निद्रा पुष्टिस्तद्वामतः स्थिता । पातालशयनध्यानमाह—सर्वतत्त्वाश्रयमित्यादिभिः । पद्मनाभपातालशय्येकार्ण- वशायिन्यग्रोधशायिनां स्थानानि श्रीपौष्करे प्रतिपादितानि— क्षीरोदधौ पद्मनाभः शेषाहिशयनो हरिः । स्थितो नाभ्यब्जसंभूतो यस्माच्चैव पितामहः ॥ चतुर्धा रूपमाश्रित्य विश्वेऽस्मिन् सैव वर्तते । हिताय सर्वलोकानां यथा तदवधारय ॥ आसाद्य शयनं ब्रह्मन् पातालतलसंस्थितः । वटमादाय चाग्नेयं योऽन्ते संहरते जगत् ॥ वटमूलं समाश्रित्य प्रयागे सुरपूजिते । जगदेकार्णवं कृत्वा दिव्यमासाद्य पादपम् ॥ संतिष्ठते स भगवान् तस्मिंस्तीरे क्षितौ द्विज । न्यग्रोधशयनं चैव ध्यायेद् दिव्यगतिप्रदम् । (३६।३३८-३४२) अस्यैवं शक्तिचतुष्टयान्वितत्वं लक्ष्मीतन्त्रेऽप्युक्तम्— अनन्तशयनो नाम योऽवतारो हरेरहम् ॥ स्थिता चतुर्दिशं तस्य चातुरात्म्यमुपेयुषी । लक्ष्मीश्चिन्ता तथा निद्रा पुष्टिश्चेताख्यया युता ॥ (८।३५-३६) इति ॥ १६३-१६७ ॥