भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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२८६ सात्वतसंहिता वैखरी शब्दनिष्पत्तिर्मध्यमा बुद्धिसंयुता । द्योतितार्था च पश्यन्ती सूक्ष्मा वागनपायिनी ॥ इत्युक्तैः ॥ १५३-१५६ ॥ अब वेदव्यास का ध्यान कहते हैं—जो आत्मस्वरूप को प्रकाशित करने वाले, वेदमण्डल को स्वयं अपने ज्ञान से पश्यन्ती, मध्यमा एवं वैखरी पूर्वक तीन भागों में प्रविभक्त करते हैं, जो ज्ञानरूपी वायु से आहरण किये जाने के स्थान में उत्पन्न होते हैं । ऐसे अलसी पुष्प के समान प्रभा वाले भगवान् वेदव्यास का स्मरण करना चाहिये । जो अपने बायें हाथ से सभी शास्त्रों की पुस्तक तथा दाहिने हाथ से सभी शास्त्रों का उपदेश यथास्थित रूप से करते हैं और जो त्रिकालवेत्ता हैं, जो युगानुसारी बोध को बिना परिश्रम ज्ञान के लिये एक ही वेद को चार भागों में विभक्त कर देते हैं, उन वेदव्यास का ध्यान करना चाहिये ॥ १५३-१५६ ॥ ३४. कल्किध्यानकथनम् दानधर्मरतानां च यागयज्ञानुयाजिनाम् । तपःस्वाध्यायसक्तानां मुक्तानां वै पुनर्भावात् ॥ १५७ ॥ संरक्षणाय योग्यत्वविज्ञानव्यक्तयेऽपि च। समुदेति जगन्नाथस्तेषां हृत्कमलावने ॥ १५८ ॥ मनोवाजिनमाक्रम्य त्वादद्यात्मगुणायुधान् । नूनमुत्पाटयत्याशु जन्मान्तरशतोत्थितम् ॥ १५९ ॥ वैषयं वासनाजालं शुद्धविज्ञानसिद्धये । ध्यायेद् वराश्वगं तं वै तनुत्रावृतविग्रहम् ॥ १६० ॥ सितोष्णीषललाटं च नातिदीर्घजटाधरम् । द्रवत्कनकवर्णाभम् इषुधिद्वयमध्यगम् ॥ १६१ ॥ शरचापकरव्यग्रं खड्गकुन्तकुठारिणम् । यज्ञाध्ययनदानानि परिरक्षन्तमेव हि ॥ १६२ ॥ शातयन्तमवर्णांश्चाप्यधर्मनिरतात्मनः । अथ कल्किध्यानमाह—दानधर्मरतानां चेत्यादिभिः । अस्य स्थानं तु श्री- पौष्करे— कल्की विष्णुश्च भगवान् स्तूयमानो द्विजैः स्थितः । समासाद्य विपाशां च नदीं नियतमानसः ॥ (३६।३३१) इति ॥ १५७-१६३ ॥ अब कल्कि का ध्यान कहते हैं—दान, धर्म में निरत, योग-यज्ञ करने वाले तपःस्वाध्याय में लगे हुए, मुक्त जनों को संसार से संरक्षण के लिये,