भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 347

अब पातालशयन का ध्यान कहते हैं—सभी तत्त्वों के आश्रय तत्त्व, सर्व- शक्तिमय, विभु (= व्याप्त), सभी इन्द्रियों को भासित करने वाले, किन्तु स्वयं सर्वान्द्रिय विवर्जित, सभी भुवनों के आधार, पाताल में स्थित, अनन्तशायी और कल्पान्त अग्नि स्वरूप पातालशायी भगवान् का ध्यान करना चाहिये । जो जाज्वल्यमान ज्वाला से युक्त ज्वलन का वस्त्र धारण किये हुए हैं । जो मूर्त्तिमान् चक्रादि आयुध समूह रूप परिवारों से घिरे हुए हैं । जिनके पाद-प्रदेश में लक्ष्मी तथा जिन प्रभु के दाहिने चिन्ता स्थित हैं, शिर के पास निद्रा एवं बायीं ओर पुष्टि स्थित हैं इस प्रकार के पातालशायी प्रभु का ध्यान करना चाहिए ॥ १६३-१६७॥

प्रधानदेवताध्यानमिदमुक्तं समासतः ॥ १६७ ॥ यज्ज्ञात्वा विनिवर्त्तन्ते जन्ममृत्युजरारुजः । नास्त्रैर्वस्त्रैर्ध्वजैर्येषां व्यक्तिर्व्यक्ता जगत्त्रये ॥ १६८ ॥ तेऽपि लाञ्छनवृन्दं तु धारयन्त्यङ्घ्रिगोचरे । ललाटे चांसपट्टे तु पृष्ठे पाणितलद्वये ॥ १६९ ॥ तनूरुहचये मूर्ध्नि कर्मिणां प्रतिपत्तये ।

फलकथनेन सहोक्तमर्थं निगमयति—प्रधानेति । एषां विभवदेवानामुक्तक्रमेण हस्तादिषु तत्तन्मूर्त्तिज्ञापकायुधादिलाञ्छनराहित्ये- ऽपि तेषामङ्घ्रिललाटादिषु लाञ्छनमस्ति, तत्सावधानं परीक्षित्वव्यमित्याह—नास्त्रैरिति द्वाभ्याम् । इदं श्लोकद्वयमीश्वर (३।१८४-१८३) पारमेश्वर(१०।९३-९५)योरपि विमानार्चनप्रकरणे प्रतिपादितम् । किन्तु तयोः केषुचित् कोशेषु—''अस्त्रैर्वस्त्रै- र्ध्वजैर्येषाम्'' इति नकारो न दृश्यते । तल्लेखकप्रमादकृतम्, मूलविरुद्धत्वात् । यद्वा ईश्वरव्याख्याने तत्पाठस्यापि गतिर्दर्शिताैव । पारमेश्वरव्याख्याने—''अङ्घ्रिगोचरे स्थित्यासनादिना, ललाटे नेत्रत्रयादिना, अंसपट्टे भुजभेदेन, पृष्ठे शरचक्रादिना'' इत्यादिक्रमेण व्याख्यातम् । तदसंगतम्, लाञ्छनशब्दस्य चक्रादिपरत्वेनैव सार्वत्रिक- प्रसिद्धेः । उत्तरश्लोक एव ''न जहात्यच्युतं लिङ्गम्'' (१२।१७१) इति कण्ठरवेणात्र वक्ष्यमाणत्वाच्च ॥ १६७-१७०॥

यहाँ तक हमने संक्षेप में प्रधान देवता का ध्यान कहा । (अध्याय नव में पाताल शयन प्रभु ही तक मुख्य अवतार कहा गया है जैसा कि वेदवित् भगवान् कल्की पाताल शयनः प्रभुः १९.९३) कहा । अब विभव देवताओं का वर्णन करते हैं—जिनके ज्ञान से जन्म, मृत्यु, जरा और रोग निवृत्त हो जाते हैं, जिनकी अभिव्यक्ति (प्राकट्य) अस्त्र, वस्त्र और ध्वज से तीनों लोक में नहीं जानी जाती किन्तु वे भी अपने पैरों में, ललाट में, अंसपट्ट में, पृष्ठ में, दोनों हाथों में, बालों में एवं शिर में कर्म करने वाले जीवों के ज्ञान के लिये तथा संसारी मनुष्यों के लिये अथवा वैष्णव स्वभाव से लाञ्छन वृन्द धारण करते हैं ॥ १६७-१७० ॥