सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८२ सात्वतसंहिता इसके अतिरिक्त दश मुद्रायें भी उन्हीं हाथों में रहती हैं, उनका भी ध्यान करना चाहिये। भयङ्कर, विस्मय, हृदययुक्त, वेणी, कण्ठ और ग्रहण लक्षण वाली इन पाँच मुद्राओं का भी ध्यान करे, जो बायें पाँचों हाथों में रहती हैं। वरा नाम वाली, भूति नाम वाली, युक्ता नाम वाली, समया और गोपनी नामक मुद्राएँ उनके दाहिने पाँचों हाथों में रहती हैं। इनका भी ध्यान करे॥ १२८-१३६॥ २७-३०. नर-नारायण-हरि-कृष्णानां ध्यान कथनम् जगत्सूत्रं सहाक्षैस्तु येनोक्तममितात्मनाम्॥ १३६॥ गुणषट्कस्वरूपेण पूर्वोक्ताकृतिभिर्विना। स्मर्त्तव्यः स चतुर्धा वै लाञ्छनास्त्रविवर्जितः॥ १३७॥ सर्वदा परिरक्षन्तु जपपूर्वं चतुष्टयम्। योगक्रियातपोऽन्तं च सद्दिभूत्यपवर्गदम्॥ १३८॥ नराद्यः कृष्णनिष्ठश्च पृथगेकत्र चेच्छया। नरं तत्र प्रवालाभमर्धोन्मीलितलोचनम्॥ १३९॥ अन्तर्निविष्टभावं च शब्दब्रह्मैकमानसम्। पदोपलक्षणं मन्त्रं लपमानमलक्षितम्॥ १४०॥ स्फाटिकेनाक्षसूत्रेण करस्थेन च शोभितम्। गणयन्नक्षसूत्रीयानावर्तान् वामपाणिना॥ १४१॥ अथ नारायणं देवं ध्यायेत् कुमुदपाण्डरम्। बद्धब्रह्माञ्जलिं शान्तं हृत्पद्मार्पितमानसम्॥ १४२॥ युञ्जानं च स्वमात्मानं परस्मिन्नव्यये पदे। कमण्डलुधरं ध्यायेत् काञ्चनाभमतो हरिम्॥ १४३॥ विष्टराविष्टपाणिं च क्रियाकाण्डप्रदर्शकम्। पठन्तमनिशं शास्त्रं पञ्चरात्रपुरस्सरम्॥ १४४॥ कृष्णमिन्दीवरश्याममूर्ध्वबाहुं जटाधरम्। पादेनैकेन तिष्ठन्तमाहरन्तं च मारुतम्॥ १४५॥ एकत्रिषड्द्विषड्रत्राद्यतिकृच्छ्रपरायणम्। पक्षमासोपवासांश्च दिशन्तमनुचिन्तयेत्॥ १४६॥ कृष्णाजिनोत्तरीयाश्च सर्वे काषायधारिणः। ब्रह्मलिङ्गधराः सर्वे सर्वे ब्रह्मपरायणाः॥ १४७॥ मुख्यकर्मपरिक्रान्ताः साधूनां प्रेरणाय च। कालानुकालमाश्रित्य सर्वे सर्वपरायणाः॥ १४८॥