भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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द्वादशः परिच्छेदः २८३ अथ नरादीनां चतुर्णां ध्यानमाह—जगत्सूत्रमित्यादिभिः । जप-योग-क्रिया- तपः-परिरक्षकत्वं नर-नारायण-हरि-कृष्णानां क्रमेण बोध्यम् । एषां स्थानानि तु— नरसंज्ञो जगन्नाथः सिद्धैः सम्पूजितेषु च । भूभागेषु च रम्येषु नित्यं सन्निहितः स्थितः ॥ गिरौ गोवर्धनाख्ये तु देवः सर्वेश्वरो हरिः । संस्थितः पूजिते स्थाने गवां निष्क्रमणेेषु च ॥ सालिग्रामे च भगवान् राजेन्द्राख्ये वने द्विज । तथैव वसुधांशेन स्थितो देवव्रताभिधे ॥ कृष्णोऽपरश्चतुर्मूर्तिरवत्तीर्य धरातले । स्थितः पिण्डारके विप्र मोचयन् दुष्कृताज्जनान् ॥ —(पौ० सं० ३६।३३३-३३६) इति ॥ १३६-१४८ ॥ अब नर, नारायण, हरि और कृष्ण का ध्यान कहते हैं—जिन्होंने पूर्वोक्त आकृति के बिना केवल षाड्गुण्य स्वरूप से ज्ञानियों के लिये अक्षसूत्र के साथ जगत्सूत्र का उपदेश किया । लाञ्छनास्त्र से विवर्जित उन्हें चार प्रकार से ध्यान करना चाहिये । वे अपने चारों रूपों से सद्विभूति और अपवर्ग देने वाले जप, योग, क्रिया और तप की सर्वदा रक्षा करें । नर, नारायण, हरि और कृष्ण चाहे पृथक् हों अथवा एकत्र हों, उनमें इनकी इच्छा ही प्रधान है, उनमें भगवान् नर प्रवाल की आत्मा वाले हैं, उनके नेत्र आधे खुले हैं, समस्त भाव उनके अन्तःकरण में सन्निविष्ट हैं, मानस शब्दब्रह्मैकनिष्ठ है, वे अलक्षित होकर पदोपलक्षण मन्त्र का जप करते रहते हैं और बायें हाथ में स्थित स्फटिक की माला से आवृत्त माला की संख्या की गणना करते रहते हैं । अब कुमुद के समान स्वच्छ वर्ण वाले नारायण का ध्यान कहते हैं जो ब्रह्माञ्जलि बाँधे हुए हैं, शान्त हैं, अपना मन हृदयपद्म में अर्पित किये हुए हैं, अपनी आत्मा को पर अव्यय पद में संयुक्त किये हुए हैं । अब हरि का ध्यान कहते हैं जो कमण्डल धारण किये हुए हैं । जिनके शरीर की आभा काञ्चन के समान है, विष्टर पर हाथ रखे हुए हैं, जो क्रियाकाण्ड के प्रदर्शक हैं और जो पञ्चरात्रपुरःसर सर्वदा शास्त्रों का पाठ करते रहते हैं । अब कृष्ण का ध्यान कहते हैं—नीलकमल के समान श्याम वर्ण वाले, ऊपर की ओर भुजा उठाये, जटा धारण किये हुए, एक पैर से खड़े होकर वायु पान करते हुए, भगवान् कृष्ण का ध्यान करना चाहिए । एक, तीन, छह या बारह रात्रि पर्यन्त अतिकृच्छ्र व्रत करने वाले एक पक्ष एवं मास पर्यन्त उपवास का उपदेश करने वाले ऐसे कृष्ण का ध्यान करना चाहिये । नर, नारायण हरि और