सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८४ सात्वतसंहिता कृष्ण ये सभी कृष्णमृग का उत्तरीय तथा काषाय (गेरुआ) वस्त्र धारण किये हुए हैं। सभी ब्राह्मण चिह्नधारी हैं और वेद पाठ में लगे रहने वाले हैं। साधुओं को प्रेरणा देने के लिये अपने मुख्य कर्म में लगे रहते हैं, काल-अनुकाल का आश्रय लेकर सभी सबका हित करते हैं ऐसे चारों विष्णु के अवतारों का ध्यान करना चाहिए ॥ १३६-१४८ ॥ ३१. परशुरामध्यानकथनम् असङ्गशक्त्या भगवान् सत्कुठाराभिधानया । छिनत्ति बद्धमूलान् यः कर्मवृक्षांस्तु कर्मिणाम् ॥ १४९ ॥ तमेव द्विभुजं ध्यायेदुदयादित्यवर्चसम् । कृष्णैणचर्मवसनं सत्कुठारकराङ्कितम् ॥ १५० ॥ परशुरामध्यानमाह—असङ्गशक्त्येति द्वाभ्याम्। अस्य स्थानं तु— नगोत्तमे महेन्द्राख्ये परश्वधकरो द्विजः । रामसंज्ञश्च भगवान् संस्थितः क्षत्रियान्तकः ॥ —(पौ०सं० ३६।३२७) इति ॥ १४९-१५० ॥ अब परशुराम का ध्यान कहते हैं—जो भगवान् बिना किसी की सहायता से अपनी कुल्हाड़ी मात्र से संसारी जीवों के बद्धमूल कर्मवृक्ष का उच्छेदन करते हैं, उदीयमान सूर्य के समान तेजस्वी दो भुजा वाले उन भगवान् परशुराम का ध्यान करना चाहिये। काले मृग के चर्म का वस्त्र तथा हाथ में कुठार धारण किये हुए उन परशुराम का ध्यान करना चाहिये ॥ १४९-१५० ॥ ३२. श्रीरामध्यानकथनम् दशेन्द्रियाननं घोरं यो मनोरजनीचरम् । विवेकशरजालेन शमं नयति योगिनाम् ॥ १५१ ॥ ध्येयः स एव विश्वात्मा सतोयजलदप्रभः । रक्तराजीवनयनो धनुःशरकराङ्कितः ॥ १५२ ॥ श्रीरामध्यानमाह—दशेन्द्रियाननमिति द्वाभ्याम्। अस्य स्थानं तु— धराधरे चित्रकूटके रक्षःक्षयकरो महान् । संस्थितश्चापरो रामः पद्मपत्रायतेक्षणः ॥—(पौ० सं० ३६।३२८) इति ॥ १५१-१५२ ॥ अब राम का ध्यान कहते हैं—जो योगियों के मन रूपी महाघोर रावण राक्षस को अपने विवेक रूप शर जाल से शान्त कर देते हैं। सज्ज्ल बादल के