सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वादशः परिच्छेदः २९३ जिसके अनुसरण से, ध्यान से, अर्चन से पुरुष अपना अभीष्ट प्राप्त कर लेता है। सत्य, सुपर्ण, गरुड़, तार्क्ष्य और विहगेश्वर ये सभी पञ्चप्राण के विकार हैं, जिनका चरण से लेकर समस्त देह पुरुषाकृति है, जिनकी दो भुजायें हैं, जो तुहिन के समान स्वच्छ हैं, वह प्राण दैवत सत्य हैं। जिसकी पद्मरागमणि के समान निर्मल कान्ति है, सोने के समान चमकीली आँखें हैं, वह सुपर्ण हैं। जिसके शरीर की आभा काञ्चन के समान है, भ्रू कुटिल हैं, नेत्र लाल हैं, वह गरुड़ हैं। जिसकी आँखें वक्र हैं, जो वर्षाकालीन बादल के समान हैं, वह तार्क्ष्य हैं। तप्त कनक के समान चमकीले नेत्रों वाला चित्रवर्ण पञ्चम विहगेश्वर हैं। सुपर्णादि सभी चार भुजा वाले, सौम्य स्वरूप, धैर्यशाली, पक्षियों के समान चरण वाले, पङ्कों के मण्डल से मण्डित, लम्बोदर, मोटे तथा कुण्डलादि से विभूषित हैं, उनका भ्रू कुटिल है। मुख गोल है और नासिका चोंच की तरह टेढ़ी है, प्रसन्नचित्त हैं, ये सभी अपानादि वायुओं के अधिपतित्व के रूप में स्थित हैं, सभी महाबलवान् हैं, महाकाय हैं, इसमें पाँचवे विहगेश्वर रक्त तुण्ड हैं। आद्य प्राण अधिदैवत सत्य का बायाँ हाथ आधेय विष्णु के चरण के नीचे है। दाहिना हाथ भगवान् के अक्षसूत्र से भासित है। इसी प्रकार सुपर्ण की दोनों भुजायें सत्य की दोनों भुजाओं के समान हैं, ऐसा समझना चाहिये। पीछे का बायाँ दूसरा हाथ नाभि देश पर उतान है तथा विस्मय युक्त है। पीछे का दाहिने हाथ फूल के गुच्छों से युक्त है। ऊपर का मुख उतान है और गरुड़ का पीछे का दोनों हाथ हृदय स्थान पर अञ्जलि रूप में है। चतुर्थ तार्क्ष्य का दोनों हाथ वही सम्पुटाकार है। उनके दाहिने हाथ में अमृत का कुम्भ है और बायें हाथ में विषैला सर्प है। विहगेश्वर का दो हाथ खाली है, इस प्रकार तीन में दो का हाथ समान है। यदि दाहिना हाथ आधेय से आक्रान्त है तब वे बायें हाथ से अक्षमला घुमाते हैं। किन्तु जिनका दोनों हाथ आधेय के चरण के नीचे है, तब उन भगवन्मय वाहन को माला (अक्षसूत्र) से रहित समझना चाहिये ॥ १७७-१९१ ॥ अनुग्रहपरस्तवास्ते पक्षिपक्षाब्जविष्टरे ॥ १९१ ॥ स्वतेजोनिजसामर्थ्यमसूरकवरान्विते । पद्मासनादिना चैव केवलं वा श्रियान्वितः ॥ १९२ ॥ सुव्यक्तावयवस्थित्या विद्धि तं गरुडासनम् । एवमुक्तलक्षणे वाहने भगवदवस्थानक्रममाह—अनुग्रहेति द्वाभ्याम्। स्वतेजो- निजसामर्थ्यमेव मसूरकवरमास्तरणोत्तमं तेनान्विते ॥ १९१-१९३ ॥ भगवान् पक्षि के पक्ष रूपी कमल के विष्टर पर बैठे हुए हैं और वह अनुग्रह परायण रहते हैं। ऐसे तो अपने तेज, अपने सामर्थ्य से वे खोली युक्त रूई के गद्दे