भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 354

द्वादशः परिच्छेदः २९५ इस कारण, भगवान् के इस प्रकार रूप धारण करने पर, सिद्धि की प्राप्ति के लिये बुलाये जाने पर, गरुड़वाहन विष्णु का ध्यान करे, अथवा बायें पैर को समेटे हुए कमल पर बैठे हुए ध्यान करे, अथवा गरुड़ पर बैठे हुए भगवान् का ध्यान करे । (यहाँ (काम्य कर्म रूप) कार्य भेद से विष्णु के आसन का भेद कहा गया) ये भगवान् प्रतिकूल इच्छित फल को शीघ्र विनष्ट करते हैं । इस प्रकार ध्यान करने वाले भक्तों द्वारा बुलाने पर भगवान् अच्युत जानु से लेकर दाहिने पैर को संकुचित कर सभी सिद्धियों से लेकर मोक्ष पर्यन्त सब कुछ देने के लिये तैयार रहते हैं । दोनों पैरों के संकोच विना केवल ऋजु स्थिति में भी वे वैष्णव अर्थियों को सब कुछ देने के लिये स्थित रहते हैं ॥ १९५-१९८ ॥ इसी प्रकार स्वस्तिकासन आदि भेद से वाहन के विना भी पीठ एवं कल्हार तथा सिंहासन पर बैठ कर भी वे वाञ्छित पूर्ण करते रहते हैं ॥ १९९ ॥ विहगाधिपतिश्चात्र योगैश्वर्याद् बिभर्ति च । सवक्त्रं भुजवृन्दं तु नागेन्द्रास्त्रवरान्वितम् ॥ २०० ॥ विभोराज्ञावशेनैव तुष्ट्यर्थं वा स्वयं विभोः । जगज्जयोद्यार्थं तु शान्तये शरणैषिणाम् ॥ २०१ ॥ विभिन्नेन च रूपेण नानालोकान्तरेषु च । अनिरुद्धगतिर्वीरो विचरत्येक एव हि ॥ २०२ ॥ स्वाधिरूढशक्तीश इव पक्षीशोऽपि तदाज्ञया निखिलजगत्संरक्षणार्थं वक्त्र- भुजायुधादिभिर्विविधस्वरूपः स्वयमेक एव सर्वत्र विचरतीत्याह—विहगाधिपतिरिति त्रिभिः ॥ २००-२०२ ॥ इसी प्रकार पक्षीश भी भगवान् की आज्ञा से समस्त जगत् की रक्षा के लिये मुख सहित भुजवृन्द नागेन्द्र युक्त श्रेष्ठ अस्त्र धारण कर भगवान् की आज्ञावश होकर, अथवा अपनी तुष्टिवश, अथवा जगज्जय के लिये, अथवा शरणार्थियों को शरण देने के लिये विभिन्न रूप धारण कर अनेक लोक-लोकान्तरों में बेरोक-टोक अकेले विचरण करते हैं ॥ २००-२०२ ॥ तदारूढस्य यद् रूपं शक्तीशस्य च सम्प्रति । अनेकभेदभिन्नं तु निबोध गदतो मम ॥ २०३ ॥ शक्तीशस्य रूपभेदान् शृण्वित्याह—तदारूढस्येति ॥ २०३ ॥ गरुड़ पर आरूढ़ रहने वाले शक्तीश का सम्प्रति जो अनेक भेद एवं भिन्न रूप है उसे हे सङ्कर्षण ! आप सुनिये, मैं कह रहा हूँ ॥ २०३ ॥ संयच्छन्तं सदा शान्तिं भविनां दक्षिणेन तु । प्रोद्वहन्तं च वामेन शङ्खं पूर्वोक्तलक्षणम् ॥ २०४ ॥