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सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 355

२९६ सात्वतसंहिता द्विभुजस्य त्विदं रूपं शक्तीशस्य तु केवलम् । रूपेणानेन च पुनः षोढा समुपयाति च ॥ २०५ ॥ सह कान्तागणैनैव त्वेकाद्येन पृथक् पृथक् । प्राग्वल्लक्ष्म्या समेतं यत्तदेकं रूपमैश्वरम् ॥ २०६ ॥ श्रीपुष्ट्योरथ मध्यस्थं द्वितीयं परिकीर्तितम् । श्रियादिमायानिष्ठेन चतुष्केणावृतं परम् ॥ २०७ ॥ पूर्वं केवलं द्विभुजरूपं तस्य लक्ष्यादिभिः षोढा भेदांश्चाह— संयच्छन्त- मित्यादिभिः ॥ २०४-२०७ ॥ वे शक्तीश अपने दाहिने हाथ से संसारी जनों को सर्वदा शान्ति प्रदान करते हैं और बायें हाथ से पूर्वोक्त लक्षण वाला शङ्ख धारण किये हुए हैं । यह केवल शक्तीश का द्विभुज रूप है । वे शक्तीश पुनः इसी रूप से छह प्रकार के हो जाते हैं ॥ २०४-२०५ ॥ वे एकादि कान्ता गणों के साथ पृथक्-पृथक् रूप धारण करते हैं । पूर्व में कही गई लक्ष्मी के साथ उनका जो एक रूप है वह ऐश्वर्य रूप है । जब वे श्री एवं पुष्टि के मध्य में रहते हैं, तब वह दूसरा रूप होता है । जब चारों श्रियादि माया के साथ रहते हैं तब वह उनका तृतीय रूप हो जाता है ॥ २०६-२०७ ॥ शुद्ध्यादिकेन षट्केन चतुर्थं विद्धि संवृतम् । पुष्ट्यन्तेन श्रियाद्येन त्वष्टकेन तु पञ्चमम् ॥ २०८ ॥ लक्ष्म्याद्येन द्विषट्केन षष्ठं विद्धि समन्वितम् । श्रीदेवी कीर्तिदेवी च जयादेवी हलायुध ॥ २०९ ॥ चतुर्थी भगवन्माया विश्वस्यास्य निबन्धनी । शुद्धिर्नीरञ्जना नित्या ज्ञानशक्त्यपराजिते ॥ २१० ॥ प्रकृतिः सुन्दरी षट्कमित्युक्तं सर्वसिद्धिदम् । लक्ष्मीः शब्दनिधिः सर्वकामदा प्रीतिवर्धनी ॥ २११ ॥ यशस्करी शान्तिदा च तुष्टिदा पुष्टिदाष्टकम् । श्रियादिचतुष्टयस्य शुद्ध्यादिषट्कस्य लक्ष्म्याद्यष्टकस्य च नामधेयान्याह— श्रियेति (त्रिभिः?पञ्चभिः) । शब्दनिधिः = सरस्वतीत्यर्थः ॥ २०७-२१२ ॥ शुद्ध्यादि छह के साथ जब वे (शक्तीश) रहते हैं तब उनका वह चतुर्थ रूप होता है । श्री से लेकर पुष्ट्यन्त के साथ जब वे रहते हैं, तब उनका पञ्चम रूप होता है एवं जब लक्ष्म्यादि बारह देवियों के साथ वे रहते हैं, तब उनका षष्ठ रूप होता है ॥ २०८-२१० ॥

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