सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१८ सात्वतसंहिता एवं किरीटादिपारिवारध्यानैः सहितं वा तैर्विना केवलतत्तद्भगवन्मूर्त्तिध्यानमात्रेणं वाऽन्वितमर्चनं कार्यमित्याह—किरीटेति सार्धेन ॥ ६३-६४ ॥ इस प्रकार जो किरीटादि परिवारों के साथ, अथवा केवल भगवन्मूर्त्ति के साथ भक्तिपूर्वक परिवार सहित अथवा परिवार रहित ध्यान एवं अर्चन पूजन करता है, भगवान् दोनों प्रकार से उसे चतुर्विध पुरुषार्थ प्रदान करते हैं ॥ ६४ ॥ विदधात्यर्चनान्नूनं स्वपदं फलसंयुतम् ॥ ६४ ॥ ज्ञात्वैवं साधकः कुर्याद् यथाभिमतमर्चनम् । आत्मशक्तिसमैर्भोगैरखिलैः शुद्धविग्रहैः ॥ ६५ ॥ हृदि वेद्यां बहिर्मूर्ती प्रासादे स्वगृहे तु वा । बहुप्राकारनिर्मुक्ते धूमदाहादिनोज्झिते ॥ शरणे रमणीये च निःसम्पर्के तु भाविते ॥ ६६ ॥ ॥ इति श्रीपाञ्चरात्रे श्रीसात्वतसंहितायां भूषणाद्यस्त्रदेवताध्यानं नाम त्रयोदशः परिच्छेदः ॥ १३ ॥ — ❧ ❃ ❧ — उभयथाऽर्चनेऽपि भगवान् चतुर्विधपुरुषार्थानपि प्रयच्छतीति ज्ञात्वा स्वेच्छानु- सारेण यथाशक्त्यार्जितैर्भोगैर्मनसि बहिर्वेद्यां बिम्बे वाऽऽलये स्वगृहे वाऽर्चनं कुर्यादि- त्याह—विदधातीति त्रिभिः ॥ ६४-६६ ॥ ॥ इति श्रीमौज्यायनकुलतिलकस्य यदुगिरीश्वरचरणकमलार्चकस्य योगानन्दभट्टाचार्यस्य तनयेन अलशिङ्गभट्टेन विरचिते सात्वततन्त्रभाष्ये त्रयोदशः परिच्छेदः ॥ १३ ॥ — ❧ ❃ ❧ — यह अर्चन, आत्मशक्ति के अनुरूप तथा आत्मशक्ति के अनुसार शुद्ध विग्रह से हृदय में या वेदी पर, किसी शुद्ध स्थान में, मूर्त्ति में, प्रासाद में, अपने गृह में, बहुत प्राकार से निर्मुक्त स्थान पर, धूम एवं दाह विवर्जित स्थान में, सर्वोत्तम मनोरम गृह में, निर्जन स्थान में तथा अत्यन्त पवित्र स्थान में करना चाहिए ॥ ६४-६६ ॥ ॥ इस प्रकार डॉ० सुधाकर मालवीय कृत सात्त्वत संहिता के भूषणाद्यस्त्रदेवताध्यान नामक त्रयोदश परिच्छेद की हिन्दी समाप्त हुई ॥ १३ ॥ — ❧ ❃ ❧ —