सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चदशः परिच्छेदः पवित्रस्नानविधिः श्रीभगवानुवाच तपोदानव्रतानां च विहितस्याह्निकस्य च । निश्शेषयागभोगानां कृत्वा सम्पूरणक्रियाम् ॥ १ ॥ अपरेऽहनि वै कुर्याच्चतुर्थे सप्तमे तु वा । स्नपनं पूज्यमन्त्रस्य तीर्थोद्देशे च सङ्गमे ॥ २ ॥ नद्यां समुद्रगामिन्यां देवखाते हदे तु वा । प्रीतये परमेशस्य त्वात्मनो दुःखशान्तये ॥ ३ ॥ आह्लादायामराणां च पितॄणां तृप्तये तु वै । आप्यायनार्थं भूतानां भुवनानां च भूतये ॥ ४ ॥ देशदोषप्रशान्त्यर्थं गोब्राह्मणहिताय च । अथ पञ्चदशपरिच्छेदो व्याख्यास्यते । एवं सर्वच्छिद्रपूरकं पवित्रारोपणाख्यं कर्म कृत्वा तदवरोपणदिने तदनन्तरं देवस्यावभृथं कार्यमित्याह—तप इत्यादिभिः ॥ १-५ ॥ श्री भगवान् ने कहा—इस प्रकार सर्वाच्छिद्रपूरक पवित्रारोपण कर्म करने के पश्चात् तप, दान एवं व्रतों को तथा विहित आह्निक कर्मों को सम्पूर्ण याग भोगों के छिद्र पूर्ति की सारी क्रिया सम्पादन करे । दूसरे दिन, अथवा चौथे दिन, अथवा सातवें दिन किसी तीर्थ प्रदेश में, अथवा सङ्गम स्थल में पूज्य मन्त्र के स्नान कराने की क्रिया सम्पादन करे ॥ १-२ ॥ अथवा समुद्रगामिनी नदी में, देवखात में, ह्रद में इस पूज्य मन्त्र का स्नान, परमेश्वर की प्रीति के उद्देश्य से, अथवा अपने दुःख की शान्ति के उद्देश्यों से, अथवा देवताओं को प्रसन्न करने के लिये, अथवा पितरों की तृप्ति के लिये करावे, अथवा प्राणियों के वृद्धि के उद्देश्य से, अथवा समस्त लोकों के कल्याण के लिये कराना चाहिये । देशदोष की प्रशान्ति के लिये, अथवा गौ ब्राह्मण के हित के लिये पूज्यमन्त्र का स्नान कराना चाहिये ॥ ३-४ ॥