भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

पृष्ठ 395, कुल 837 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 395

३३६ सात्वतसंहिता संसारभयभीतस्तु निर्वाणमभिवाञ्छति ॥ ४ ॥ वैराग्यधीरचपलश्चिरकालं गुरोगृहे । संस्थितो दासभावेन खेदोद्वेगविवर्जितः ॥ ५ ॥ दीक्षार्थं प्रथमं गुरुकुलवासः कार्य इत्याह—पूर्वोक्तेति द्वाभ्याम् ॥ ४-५ ॥ दीक्षा के लिये सर्वप्रथम गुरुकुल में वास करे, इस सम्बन्ध में कहते हैं— आचार्य सर्वप्रथम गुरुगृह में संसार के भय से मुक्ति की इच्छा रखने वाले, वैराग्यबुद्धि सम्पन्न, चाञ्चल्य रहित (स्थिर बुद्धि वाले), दासभाव से संस्थित, खेद एवं उद्वेग से रहित शिष्य को निवास कराए ॥ ४-५ ॥ प्रायश्चित्तशान्त्यादिनिर्देशः ज्ञात्वा तस्यार्थितां नूनमाहूयाग्रे निवेश्य च । कृताकृतं च प्रष्टव्य आ स्मृतेस्तत्क्षणावधि ॥ ६ ॥ ज्ञात्वा दोषबलं सम्यक् प्रायश्चित्तैर्यथोदितैः । कृच्छ्रातिकृच्छ्रपूर्वैस्तु शोधनीयं प्रयत्नतः ॥ ७ ॥ आचार्यस्तद्दोषबलाबले ज्ञात्वा यथोदितैः प्रायश्चित्तैस्तच्छान्तिं कुर्यादित्याह— ज्ञात्वेति द्वाभ्याम् ॥ ६-७ ॥ इस प्रकार पूर्वोक्त लक्षण सम्पन्न ऐसे दृढ़तर शिष्य के दोषादोष की जब परीक्षा कर लेवे तब शास्त्रीय रीति से उसके दोषों का प्रायश्चित्त करे । सर्वप्रथम उसकी दीक्षा विषयक प्रार्थना सुने । फिर निश्चयपूर्वक उसे अपने सामने बुला कर बैठावे । फिर तत्क्षण पर्यन्त उसके किये गये समस्त स्मृत कृत्याकृत्य के विषय में प्रश्न करे । इस प्रकार उसके दोष-बल का ज्ञान कर शास्त्र में यथोदित कृच्छ्रातिकृच्छ्र प्रायश्चित्त करा कर प्रयत्नपूर्वक उसके पाप का शोधन कर उसे शुद्ध करे ॥ ६-७ ॥ बहूनां परिपीडानामसामर्थ्यात् तु लाङ्गलिन् । मनःप्रसादपर्यन्तं कालं वा द्वादशाह्निकम् ॥ ८ ॥ नियोक्तव्यो मिते पूतेऽयाचिते नक्तभोजने । स्तुतिसम्मार्जनस्नानपुष्पाद्याहरणोद्यमे ॥ ९ ॥ आश्रमे वैष्णवानां तु दिव्याद्यायतने विभोः । अनिशं भगवद्बिम्बमा पीठादवलोकने ॥ १० ॥ बहुदिनमुपोषणाशक्तौ मनःप्रसादपर्यन्तं द्वादशदिनं वा मिते नक्तभोजने भगव- स्तोत्रादिसत्कार्येषु च नियोजयेदित्याह—बहुनामिति त्रिभिः । भगवद्बिम्बमापीठा- दवलोकने आपीठान्मौलिपर्यनतं भगवद्बिम्बदर्शन इत्यर्थः,