भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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षोडशः परिच्छेदः ३३७ आपीठान्मौलिपर्यन्तं पश्यतः पुरुषोत्तमम्। पातकान्याशु नश्यन्ति किं पुनस्तूपपातकम्॥ (शाण्डिल्य स्मृ० २।८८) इति प्रसिद्धेः ॥ ८-१०॥ हे लाङ्गलिन् ! यदि शिष्य बहुत दिन तक उपोषण में अशक्त हो तो उसके मन को शुद्ध होने तक, अथवा द्वादश दिन पर्यन्त, अथवा अयाचित नक्त काल में भोजन की आज्ञा देकर, अथवा भगवत्स्तोत्रादि सत्कार्य में उसे लगा कर उस शिष्य को शुद्ध करे ॥ ८ ॥ अथवा उसके दोष की शान्ति के लिये वैष्णवों के आश्रम में, अथवा भगवान् विभु के दिव्य आयतन में, स्तुति, सम्मार्जन, स्नान, पुष्पाद्याहरण कार्य में नियुक्त करे, अथवा भगवान् के पीठ से लेकर बिम्बपर्यन्त निरन्तर दिन रात दर्शन कार्य में लगाकर उसे शुद्ध करे ॥ ९-१० ॥ ब्रह्मकूर्चसहितं प्रायश्चित्तकथनम् अभिजाततनूर्यः प्राग् दुष्कृतैर्मलिनीकृतः । साम्प्रतं भगवद्भक्त्या पवित्रीकृतमानसः ॥ ११ ॥ अहोरात्रोषितो भूत्वा नखकेशादिलुण्ठितः । पञ्चगव्यमथापाद्यं हृदाद्यैः सकुशोदकम् ॥ १२ ॥ मन्त्रैस्तद् वासुदेवाद्यैः समावर्त्य चतुःशतम्। एवं दिनचतुष्कं तु स्नापयेत् तेन तं सुधीः ॥ १३ ॥ प्रत्यहं चतुरो वाराना प्रभातनिशागमम्। ब्रह्मतीर्थं चतुष्कं स त्वापूर्यापूर्य संपिबेत् ॥ १४ ॥ क्रमात् सञ्चोदितैर्मन्त्रैः समाचम्यान्तराऽन्तरा । अतृप्तमशनं कुर्यादन्ते क्षीराज्यभावितम् ॥ १५ ॥ क्षपयेत् फलमूलैर्वा अहोरात्रचतुष्टयम् । इति भक्त्या प्रपन्नानामा जीवमपि दुष्कृतात् ॥ १६ ॥ कथितं विरतानां च देहशुद्धिकरं परम्। ब्रह्मकूर्चसमेतं तु प्रायश्चित्तं मयाऽद्य ते ॥ १७ ॥ ब्रह्मकूर्चसहितं प्रायश्चित्तमाह—अभिजाततनुरित्यादिभिः ॥ ११-१७ ॥ अब ब्रह्मकूर्च सहित प्रायश्चित्त कहते हैं—पापी शिष्य का जो शरीर पापों के कारण अत्यन्त मलिन हो गया था। अब वह दोषों के प्रायश्चित्त करने से सर्वथा नवीन और निर्मल हो गया और भगवद् भक्ति से सर्वथा कार्य, वाणी तथा मन तक पवित्र हो गया ॥ ११ ॥