भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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षोडशः परिच्छेदः ३३९ दोषाधिक्ये तत्रापि द्वित्रिचतुर्गुणमासाभिवृद्धिः कार्येत्याह—कालेनेति द्वाभ्याम्। तद्दुष्कृतं क्षपयेद् नाशयेदित्यर्थः॥ २०-२१॥ जब पाप का दिन अधिक बढ़ता जाय तब काल के अनुसार उत्तरोत्तर एक गुना द्विगुणित, त्रिगुणित मास के क्रम से प्रायश्चित्त में भी वृद्धि करे॥ २०-२१॥ नृपविट्शूद्रजातीय एकैकं वर्धयेत् क्रमात्। मासमेकादिकात् कालात् समारभ्य यथाक्रमम्॥ २२॥ नृपादीनां द्विगुणत्रिगुणचतुर्गुणक्रमेण प्रायश्चित्ताभिवृद्धिमाह—नृपेति॥ २२॥ नृपादि के लिये क्रमश द्विगुणित, त्रिगुणित, चतुर्गुणित प्रायश्चित्त कहते हैं— राजा ब्राह्मण की अपेक्षा उतने ही पाप का द्विगुणित, वैश्य त्रिगुणित और शूद्र चतुर्गुणित प्रायश्चित्त करे। इस प्रकार एक मास से आरम्भ कर यथाक्रम प्रायश्चित्त काल भी वर्णानुसार बढ़ाते रहना चाहिये॥ २२॥ दुराचारोऽपि सर्वाशी कृतघ्नो नास्तिकः पुरा। समाश्रयेदादिदेवं श्रद्धया शरणं यदि॥ २३॥ निर्दोषं विद्धि तं जन्तुं प्रभावात् परमात्मनः। किं पुनर्योऽनुतापार्तः शासनेऽस्मिन् हि संस्थितः॥ २४॥ विरतो दुष्कृताचैव भक्तिच्छायां समाश्रितः। भगवच्छासनोल्लङ्घनपरोऽपि तच्छरणागत्या निर्दोषो भवति। एतच्छासननिष्ठ- स्य शरणागतस्य निर्दोषत्वं किंपुनर्न्यायसिद्धमित्याह—दुराचार इति सार्धद्वाभ्याम्। कृताकृताद्विरत इत्यनेन सर्वधर्मपरित्यागः सूचितो भवति। भक्तिच्छायां भक्तेश्छायेव छाया यस्यास्तां शरणागतिमित्यर्थः॥ २३-२५॥ दुराचारी, कुत्ते, चाण्डाल के समान सब का सब कुछ खाने वाला, सर्वाशी, कृतघ्न, नास्तिक भी यदि श्रद्धापूर्वक आदिदेव की शरण ग्रहण करे, तो उसे परमात्मा के प्रभाव से सर्वथा दोषमुक्त समझना चाहिये। फिर जो पाप कर के भी उसके अनुताप से आर्त होकर भगवत् शरणागत हो जाता है अथवा जो भक्ति के शरणागत होकर पापों से विरत हो गया है उसके विषय में क्या कहा जा सकता है॥ २३-२५॥ एवं संशुद्धदोषाणां बहुजन्मार्जितस्य च॥ २५॥ कल्मषस्य विघातार्थं नारसिंही महामते। कृत्वा वै साम्प्रतं दीक्षां दद्याद् वै मन्त्रपूर्वकम्॥ २६॥ आराधनं हि तस्यैव वैष्णवीयस्य वै विभोः। सबाह्याभ्यन्तरं चैव सम्यङ्मासचतुष्टयम्॥ २७॥ मासाष्टकं वत्सरं वा बुद्ध्वा भावबलं पुरा।