सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका ३७ है । इसके बाद बिम्बशोधन करना चाहिए । फिर आवाहन का क्रम वर्णित है । वेदी, कुम्भ एवं मण्डल पर आवाहित देवों के उपचारों के समर्पण का प्रकार बताया गया है । आसनादि उपचारों के समर्पण का प्रकार बताया गया है । फिर क्षीरादि २५ कलशों के स्नपन का प्रकार वर्णित है । इसके बाद नीराजन विधि कही गई है । भगवान् को नया वस्त्र निवेदित करे । उपचारों के बाद आकाश से आते हुए भगवद्बिम्ब का ध्यान करे । गन्धोदक से चार कलशों को पूर्ण करे । फिर अलङ्कार आसन का समर्पण कहते हैं । फिर भोज्यासन उपचार का वर्णन है । इसके बाद मुद्राबन्धलक्षण, जप का विधान और जप के बाद पुनः भगवदर्चन कहा गया है । कुण्ड के चारों ओर आठ पूर्ण कुम्भ का स्थापन करना चाहिए । अग्नि का आनयन और अपने हृदयस्थित तेज का उस अग्नि में स्थापन करे । कुण्ड में अग्निस्थापन, फिर उसके प्रज्वलन के लिए चार समित्रक्षेप करे । इस प्रकार परिस्तरण के बाद होमोपकरण का सन्निधापन वर्णित है । प्रणीतासंस्कार, इध्मप्रक्षेपण, आज्यसंस्कार, स्रुक्स्रुवसंस्कार, पवित्रधारण, आधाराधेय विवरण एवं अग्निमध्य में भगवद् आवाहन करे । विधिज्ञ ब्राह्मण को सव्यभिचार मौन (= संकेत युक्त) वर्जित करना चाहिए । शुभ और व्यभिचार रहित मौन धारणकर क्रिया पर होना चाहिए । अन्त में अनुयाग विधि का विस्तृत विवेचन प्रस्तुत है । ७. अमन्त्रकविधि नामक सातवें परिच्छेद में उस पुण्यावह कर्म का निरूपण है जो भक्त के पाप समूह को जला देता है । जिस प्रकार जाग्रद् व्यूह वासुदेवादि चतुष्टय में पहले जैसा वर्णभेद कहा गया है, केशवादि त्रिक चतुष्टय में भी उसी प्रकार का वर्णभेद विद्यमान रहता है । केशवादि से रूप का आश्रय लेकर साधक दान एवं धर्म के आचरण से शीघ्र परं धाम को प्राप्त कर लेता है । वासुदेवादि तथा केशवादि को प्रसन्न करने के लिए व्रतानुष्ठान का क्रम कहा गया है । कार्तिक मास में दशमी तिथि को सायंकाल व्रत का संकल्प करे ओर एकादशी को व्रत करने का विधान है । इसमें वासुदेव का सलाञ्छन ध्यान विहित है । द्वादशी को चतुरात्मा प्रभु की पूजा कर पारण करे । यहीं पर 'जितन्ता' मन्त्र चतुष्टय स्तोत्र कहा गया है । चातुरात्म्य की आराधना में वर्णों का क्रम भी बताया गया है । सङ्कर्षणादि का लाञ्छन से युक्त ध्यान कहा गया है । फिर मात्र मुमुक्षु के लिए अनुष्ठेय व्रत की विधि वर्णित है । निष्काम व्रत करने वाले के लिए और सकाम व्रत करने वाले साधक के लिए अलग-अलग दान का विधान् है । शूद्रों के लिए व्रत कर्म में दान में असिद्ध अन्न देने का विधान है । द्वादशवार्षिक व्रत का विधान और व्रतान्तर का भी निरूपण किया गया है । द्वादशाख्य व्रत का विशेष विधान किया गया है । बारह मासों में केशवादि द्वादश मूर्तियों का अर्चन किया जाता है । फिर दो संवत्सर पर्यन्त चलने वाले व्रत का विधान है । इसमें केशवादि द्वादश और वासुदेवादि चार कुल सोलह मूर्तियों का अर्चन होता है । फिर व्रत करने वाले साधक के लिए भोज्य पदार्थ देने का विवेचन प्रस्तुत है ।