भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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३६ सात्वतसंहिता तुर्यव्यूहापर नामक परस्वरूप के आराधन के लिये यहाँ एक ही मन्त्र का निर्देश किया गया है । ४. स्वप्नव्यूहसमाराधन नामक चतुर्थ परिच्छेद में स्वप्न में परमात्मा को जीवात्मा के समान (मातृका) वर्ण कमल के ऊपर प्रकाशित होता हुआ बताया गया है । यहाँ सर्वप्रथम वासुदेवादि चार व्यूहों के मूलभूत विशाखयूप संज्ञक भगवान् का लक्षण प्रतिपादित है । षाड्गुण्य विभव वाले तेजःस्वरूप विशाखयूप भगवान् का कर्णिका के अग्रभाग में अवलम्बन कर मन्त्रमय देह की मूर्ति का दर्शन करे । फिर उस मन्त्रमय शरीर का उपसंहार करे क्योंकि वह तेजःस्वरूप विशाखयूप भगवान् ब्रह्मयूप शरीर से विद्यमान हो जाते हैं । अतः उन सर्वव्यापक विभु के वासुदेवादि शाखाएँ हैं इसलिए उन्हें विशाखयूप कहा जाता है । फिर इन विशाखयूप भगवान् का लक्षण बताया गया है । फिर अन्त में विभिन्न शरीर वाले विशाखयूप संज्ञक देव के विद्या एवं विवेक प्रदान करने वाले चार महामन्त्र का उद्धार किया गया है । द्वितीय परिच्छेद में 'प्रीयतां मे परः प्रभुः' यह प्रीति मन्त्र कहा गया । किन्तु यहाँ 'पर' के स्थान में दो प्रणव लगाकर वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न एवं अनिरुद्ध का प्रयोग करना चाहिए जैसे 'ॐ ॐ वासुदेवः प्रीयताम्' इत्यादि । ५. जाग्रद्व्यूह समाराधन नामक पञ्चम परिच्छेद में सङ्कर्षण के जाग्रल्लक्षण व्यूह का विवेचन है । वस्तुतः हृदयकमलाकाश 'तुर्य' पद है और उसका कर्णिका स्थान 'सुषुप्ति पद' है । केशर 'स्वप्न' पद है; उसके नीचे स्थित पत्र-स्थान 'जाग्रत्' पद है । इस हृदय रूप वर्ण कमल में जाग्रत् संज्ञक अब्ज पत्र में जाग्रत् नामक व्यूह है । यहीं पर ॐ प्रणव सहित ब्रह्मबीज चतुष्टय शं षं सं हं रूप से चारों दिशाओं में उदीयमान वासुदेवादि मूर्तियों का दर्शन करना चाहिए । यह मूर्ति स्वप्न व्यूह की अपेक्षा 'जाग्रत् ' होने के कारण अधिक सुव्यक्त है । फिर वासुदेवादि के विशेष एवं मान्य लक्षणों को कहकर जाग्रद्व्यूहमन्त्र चतुष्टय का उद्धार किया गया है । जाग्रद्व्यूह का लक्षण युग भेद से अलग-अलग भी बताया गया है । साधक कब और कहाँ स्मरण करे यह वर्णित है । सृष्टि क्रम से तथा संहार क्रम से भगवान् का स्मरण परम गति को प्रदान करने वाला कहा गया है । अर्चन के लिए भगवान् के विभवावतारों का क्रम वर्णित है । इस प्रकार परमात्मा विष्णु के अन्तर्याग का विधान संक्षेप से प्रस्तुत किया गया है । अब 'बहिर्याग' का उपक्रम वर्णित है । ६. चातुरात्म्यबाह्याराधन नामक षष्ठ परिच्छेद में बाह्यसाधनभूत द्रव्ययाग (= बहिर्याग) का वर्णन है । इसके लिए सबसे पहले भद्रपीठ के शोधन का विधान है । तुलसी पत्रादि सभी पूजा द्रव्य पहले इकट्ठा कर भद्रपीठ को झाड़-पोंछ कर वस्त्र से छाने हुए जल से प्रणव सम्पुटित द्वादशाक्षर मन्त्र से भद्रपीठ का प्रक्षालन करे । फिर चक्रराजार्चन का विधान है । 'ॐ चक्रराजाय नमः' से विभिन्न उपचारों द्वारा चक्रराज का पूजन करे । आधारपीठ पर उन्हें सर्वौषधि-आदि विभिन्न पूजा सामग्रियों द्वारा कलश के बाहर कोणों पर स्थापित करे । आठ कलशों की स्थापना बहिर्याग में कही गई