सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका ३५ है जो अमृत का स्राव करता है और शीघ्र ही मोक्ष प्रदान करता है । छः पदों से युक्त २२ अक्षरों का मन्त्रोद्धार किया गया है । ये छः पद षाड्गुण्य के वाचक हैं । अङ्गमन्त्र की सिद्धि के लिए इन छः का हृदयादि छः अङ्गों से योजना क्रम निरूपित है । वैष्णव साधक बाहरी एवं भीतरी मलों को देह से बाहर निकालकर अर्चन करे । अर्चन में पात्रस्थापन की विधि, साधक के शुद्धासन का प्रकार, प्राकृत एवं तात्त्विक न्यास और मानसिक याग की विधि वर्णित है । भगवान् के मन्त्रमय स्वरूप का ध्यान और हृतकमल की कर्णिका में सूर्यचन्द्राग्नि रूप शब्दब्रह्म का अर्चन करे । नाद, बिन्दु, मध्यमा एवं बैखरी इन चार अवस्था वाले शब्दब्रह्म का यजन वाग्भ्रामरी तैलधारावत् करना चाहिए । फिर उन शङ्खचक्र के चिह्नों वाले शब्दब्रह्म का ध्यान वर्णित है । अन्त में निर्विकार भगवान् की मानसी पूजा के लिए उपयुक्त अर्ध्यादि की भावनावश गङ्गावतरण का विधान है । इस प्रकार जाग्रत्स्वप्नसुषुप्ति एवं तुर्याख्य पद चतुष्टय पर स्थित भगवान् वासुदेव को मानसी पूजा से प्रसन्न कर ॐ ॐ दो बार कह कर 'प्रीयतां मे प्रभु' ऐसा कहे । यही तुरीयव्यूहसमाराधन है । ३. सुषुप्ति व्यूहसमाराधन नामक तृतीय परिच्छेद में सुषुप्ति पदाश्रित व्यूहात्मक भगवान् के स्वरूप की विवेचना प्रस्तुत है । साधक ब्रह्मामृतमय योग से स्थिर चित्त हो यजन करे क्योंकि दो-दो गुणों से ही सङ्कर्षणादि मूर्तिमय हैं फिर भी उनमें शेष चार गुण भी अनुवृत्ति रूप से रहते हैं । इस प्रकार मूर्तिमय में दो-दो गुण व्यक्त रूप से तथा अवशिष्ट चार गुण अव्यक्त रूप से रहते हैं । ब्रह्मषाड्गुण्य के वाचक मन्त्र चतुष्क साधक भक्त को सतत मोक्ष प्रदान करने वाले कहे गए हैं । इन चारों मन्त्रों का उद्धार कर उनके पदों की संख्या भी वर्णित है । यहाँ पर विचार करना चाहिये कि सात्त्वत संहिता के द्वितीय परिच्छेद में तूर्यव्यूह का एक ही मन्त्र उद्धृत किया गया है जबकि सुषुप्ति, स्वप्न तथा जाग्रत इन तीन व्यूहों में चार-चार मन्त्र उद्धृत किये गये हैं उसके अनुरोध से तूर्यव्यूह में भी चार मन्त्र का उद्धार अपेक्षित है । जबकि न केवल भाष्य में अपितु संहिता में भी चातुरात्म्य चतुष्ट्य का प्रतिपादन किया गया है । जब तूर्यव्यूह में भी चातुरात्म्य भासित हो रहा है तब वहाँ भी चार मन्त्र होना चाहिए यह स्वाभाविकी शङ्का उत्पन्न होती है । तब इसका परिहार इस प्रकार करना चाहिये—द्वितीय परिच्छेद में पर स्वरूप का विवरण मात्र है । किन्तु तृतीय, चतुर्थ एवं पञ्चम परिच्छेद में सुषुप्ति, स्वप्न एवं जाग्रत्पद में स्थित व्यूह स्वरूपों का वर्णन है । इस व्यूहजन्य ब्रह्म को चातुरात्म्य पद से भी कहा जाता है । यह चातुरात्म्य परस्वरूप में अव्यक्तदशा में रहता है । इसलिये वहाँ भी चातुरात्म्य प्रयोग होता है । उसे तुर्यव्यूह नाम से भी कहा जाता है—यहाँ नित्योदित दशा तथा शान्तोदित दशा दो प्रकार की दशा स्वीकार की जाती है । नित्योदित दशा परात्पर वासुदेव दशा तथा शान्तोदित दशा पर वासुदेव दशा कही जाती है । किन्तु दोनों दशा में वासुदेव का प्राधान्य रहता है । उस अवस्था में सङ्कर्षणादि तीनों का तथा अच्युतादि तीन का अव्यक्त रूप से अवस्थान रहता है । प्रकृति में आदिमूर्ति वासुदेव का ही प्राधान्य प्रदर्शित करने के कारण