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सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

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पृष्ठ 37

३४ सात्वतसंहिता सुस्पष्ट करना। इससे भाष्यकार के वैदुष्य का ज्ञान होता है। पाँचरात्र आगम की परमेश्वर संहिता के व्याख्यान के अतिरिक्त उन्होंने किसी अन्य संहिता के भाष्य का उल्लेख नहीं किया है। सात्वत संहिता का विषय विवेचन पाञ्चरात्र-आगम वैष्णवधर्म के सर्वप्राचीन मतों में से एक है। वैष्णवी शक्ति- उपासना का विधान पाञ्चरात्र-आगमान्तर्गत 'सात्वतसंहिता' में विशेषरूप से निर्दिष्ट है। सात्वतसंहिता को नारद मुनि ने भगवान् सङ्कर्षण से प्राप्त किया था और सङ्कर्षण ने साक्षात् वासुदेव से ग्रहण किया था। यह संहिता पच्चीस परिच्छेदों में आम्नात है। १. प्रश्नप्रतिवचन नामक प्रथम परिच्छेद में नारद मुनि का मलयाचल पर्वत पर भगवान् परशुराम से मिलना वर्णित है। परशुराम जी ने नारद जी से कहा—आप में भवबन्धन को नष्ट करने वाली ऐसी अचला भक्ति है जो सात्वतशास्त्र में प्रतिपादित है। अतः आप सात्वतशास्त्र में उपदिष्ट क्रियामार्ग अर्थात् अभिगमन, उपादान, इज्या एवं स्वाध्याय रूप शुद्ध मार्ग में मुनियों को प्रवृत्त कीजिए। पूर्वकाल में सत्ययुग की समाप्ति एवं त्रेतायुग के आरम्भ में जगद्धाता अच्युत रक्त वर्ण के हो गए। भगवान् सङ्कर्षण ने इस रक्तता का कारण जगद्धाता अच्युत से पूछा। भगवान् ने कहा—पहले लोग सत्त्वगुण सम्पन्न थे अब लोग रागपरक हो गए हैं। अतः मैं भी रागपर होकर रक्तवर्ण का हो गया हूँ। इस पर सङ्कर्षण ने प्रपन्नों के हित के लिए ब्रह्म का प्रतिपादन करने की उनसे प्रार्थना की। भगवान् ने कहा—वह ब्रह्म १. ज्ञान, २. ऐश्वर्य, ३. शक्ति, ४. बल, ५. वीर्य एवं तेजोमय होने से षाड्गुण्य विग्रह वाले हैं। वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न एवं अनिरुद्ध भेद से उन ब्रह्म की व्यूह संज्ञा है। वह व्यूह ही सत् होने से निःश्रेयस तथा मोक्ष फल देने वाले हैं। २. तुरीय व्यूहसमाराधन नामक द्वितीय परिच्छेद में सङ्कर्षण ने भगवान् से पूछा—हे विभो! आपने राग से दूर रहने के लिए उपासना का जो उपदेश दिया (१.२४) वह 'उपासना' क्या है? श्रीभगवान् ने कहा—एकायन श्रुति के सारभूत सात्वततन्त्र का मैं उपदेश करूँगा। यह सच्छब्द ब्रह्मशब्द एवं वासुदेव शब्द के अर्चन करने वाले ब्राह्मणों का लक्ष्यभूत है। ब्राह्मणों का परव्यूह अर्चन में समन्त्रक अधिकार है और भगवद्भक्त प्रपत्ति निष्ठा वाले क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र इन तीनों का व्यूहार्चन में अमन्त्रक अधिकार है। दीक्षाग्रहण किए हुए भगवद् भक्त का इस अर्चन में चारों वर्णों का अधिकार है। फिर मन्त्रोद्धार एवं चक्ररचना का क्रम वर्णित है। वर्ण चक्र पर वर्णात्मा भगवान् स्थित हैं। इस वर्ण चक्र की नाभि में अकारादि आठ ह्रस्व स्वर एवं आकारादि आठ दीर्घस्वर सौर एवं चान्द्र रूप से स्थित हैं। क से लेकर भ तक २४ वर्ण दो-दो के क्रम से १२ अरा पर स्थित हैं। नेमि भाग में स्वयं काल मकार से हकार तक ९ वर्ण का कलनात्मक देह धारण किए हुए स्थित हैं। प्रधिगण में क्षकार स्थित है। यह चक्रराट् विद्या का बीज है और परमात्मा का वाचक है। इसके बाद महामन्त्र का उद्धार कहा गया

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