भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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भूमिका ३३ संक्षेप में हम यह जान लें कि एकपादविभूति में लीला निमित्त रूप धारण किए हुए परब्रह्म के अनुक्त रूप 'व्यूह' कहलाते हैं। यही पाञ्चरात्र में वर्णित व्यूह का रहस्य है। सात्वतसंहिता के टीकाकार परम वैष्णव पं० अलशिंग भट्ट भगवान् यदुगिरि के पदचञ्चरीक पं० अलशिंग भट्ट के पिता मौञ्ज्यायन गोत्रीय श्री योगानन्द भट्टाचार्य थे, जो नृसिंह के नाम से भी प्रख्यात थे। १ अलशिंग ने मंगलाचरण में अपने इष्टदेव विहगपति श्रीमन्नारायण का एवं अपने पिता का स्मरण किया है। यदुगिरि कर्नाटक में है। वर्तमान में यह 'मेलकोटे' नाम से प्रसिद्ध है। इनकी माता का नाम यदुगिरि नाथ की अम्मण्यम्बा था और पं० नारायण मुनि इनके विद्यागुरु थे। 'वज्र- मुकुटीविलास चम्पू' नामक एक चम्पूकाव्य की भी इन्होंने रचना की थी। ये अत्यन्त सरस कवि हैं। महाराज यदुकुल श्रीकृष्णराज सार्वभौम की सभा में पं० अलशिंग को श्वेत छत्र, चामर, मुक्तामण्डित कुण्डल, सुवर्ण का यज्ञोपवीत तथा कंकण प्रदान किया गया था। अलशिंग की रचनाएँ सं० १८३४ (= १७५६ शाकाब्द) में इन्होंने 'सात्वतार्थप्रकाशिका' नामक ईश्वर- संहिता की व्याख्या को पूर्ण किया था। २ १८३८ ई० में यतिराजशतक और १८३६ ई० में 'वज्रमुकुटीविलासचम्पू' की रचना की। ३ 'यतिराजविजय व्याख्या' तथा 'सम्प्रदाय- प्रदीपिका' नामक ग्रन्थ भी इनके द्वारा रचित हैं। ४ इन्होंने २५.६३-९० की टीका में कन्नड़ भाषा का प्रयोग भी किया है। जैसे त्रिफलोदक के लिए 'नेल्लिकायि अरलेकायि तारेकायि। वचा बजे।' गोलोमी = पिल्लगरिके, सिंहलोमी = नरियाल्दहुल्लु, महागरुड- वेगा = गरुडनगरिगिड्डा, कार्कोटा = तोट्टिगिड्डा, वाराहकर्णी = अनेलदालु। बला बेण्णे- गरुड आदि। अलशिंग ने सात्वतसंहिता की टीका में ईश्वरसंहिता के अपने व्याख्यान का कुछ अंश भी प्रस्तुत किया है। ५ (द्र० ६.१८० पर टीका) इन्होंने ईश्वरसंहिता के व्याख्यान के अतिरिक्त एक 'सात्वतामृतसार' की भी रचना की थी। ६ अलशिंग के भाष्य की मुख्य विशेषता है अनेक ग्रन्थों से उद्धरण लेकर विषय को १. इति श्रीमौञ्ज्यायनकुलतिलकस्य यदुगिरीश्वरचरणकमलार्चकस्य योगानन्दभट्टाचार्यस्य तनयेन अलशिङ्गभट्टेन विरचिते सात्वततन्त्रभाष्ये ... । २. द्र० श्री के०वी स्वामीनाथन् द्वारा सम्पादित पाण्डुलिपि। ३. द्र० न्यू कैटलागस् कैटलोगोरम् भा० १, पृ० ३००। ४. द्र० ६.१६५-१६८ टीका। नाम्ना गोत्रेण मन्त्रपूर्वं तिलोदकं दद्यादिति। अत्रैवं प्रयोगः- ॐ पुरुषाय नमः, मौञ्ज्यायनगोत्राय नृसिंहशर्मणे पुरुषरूपिणे पित्रे इदं तिलोदकं ददामीति। ५. ननु भवत्कृतेश्वरसंहिता व्याख्याने एव पितृसंविभागः प्रभातिकार्चनमात्रानुष्ठाने होमानन्तर कार्य इत्युक्तम्, तदसंगतम् , ... संतोष्टव्यमायुष्मता ।। ६.१८० ।। ६. आड्यार पुस्तकालय की सूची। किन्तु गवर्नमेण्ट लाइब्रेरी, मद्रास के अनुसार यह ग्रन्थ अलशिंग के पिता योगानन्द की कृति है। सा० सं० - 3