सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषोडशः परिच्छेदः ३४१ श्रीभगवान् ने कहा—जब चित्त अभूतपूर्व प्रसन्न हो जावे, तेज की वृद्धि अत्यन्त हो जावे, धैर्य, उत्साह, सन्तोष तथा अदैन्य एवं अकार्पण्य आदि गुण उत्पन्न हो जावे। जिनमें इतने गुण आ जावे, तब समझ लेना चाहिये कि मन्त्रात्मा इसके अनुकूल है ॥ ३०-३१ ॥ यदि शान्ति के कार्यों में प्रवृत्ति हो, अल्पकाल में कार्य का साफल्य हो, तब समझे कि मन्त्र साधक पर सफल हो गया है ॥ ३२ ॥ मन्त्रराट् के प्रसन्न हो जाने पर पाप का दाह सम्पन्न हो जाता है और वह धर्म अर्थ और काम प्रदत्त करता है ॥ ३३ ॥ मन्त्रराट् प्रसन्न होने पर अणिमादि आठों सिद्धियाँ तथा विविध योग सिद्धियाँ प्रदान करता है। सभी मन्त्र आत्मसिद्धि समेत उस पर परितुष्ट हो जाते हैं ॥३४॥ यस्मिन् वै वैभवे रूपे यस्याभिरमते मनः । तस्य कल्मषशान्त्यर्थं दीक्षां कुर्याच्च तेन वै ॥ ३५ ॥ तमाराध्य हि पूर्वोक्तं कालं तमनुयोज्य च । एवं नारसिंहमन्त्रेणैव दुरितक्षयार्थं दीक्षाराधनादिकं कार्यमिति नियमो नास्ति । वैभवमन्त्रेषु यस्य यस्मिन्नभिरुचिस्तेनैव तत्कार्यमित्याह—यस्मिन्निति सार्धेन। पूर्वोक्तं कालं मासचतुष्टयं मासाष्टकं संवत्सरं वेत्यर्थः ॥ ३५-३६ ॥ वैभव मन्त्रों में जिसकी जिस मन्त्र में अभिरुचि हो कल्मष नाश के लिये उसको उसी मन्त्र की दीक्षा देवे ॥ ३५ ॥ गुरु शिष्य को पूर्वोक्त (चार मास, आठ मास अथवा संवत्सर मास पर्यन्त) काल तक आराधना में अनुयोजन करे ॥ ३५-३६ ॥ योग्यतायाः परीक्षार्थमा शान्तेः सर्ववस्तुषु ॥ ३६ ॥ नारसिंहेन वान्येन मन्त्रेणाभिमतेन च। दीक्षयाऽऽराधनेनैव होमजापव्रतादिना ॥ ३७ ॥ कर्मणा केवलेनैव शान्तिकात्युच्छ्रितेन च। विनाऽणिमादिसिद्धिभ्यो बुद्ध्वा पापं क्षयं गतम् ॥ ३८ ॥ भावयेत् तेन कालेन ततः पद्मदलेक्षण । दीक्षितस्य मुमुक्षुत्वेन सर्वविषयेष्वप्याशाविरहे सति शान्तिकादिकर्मणामपि विरहात् तत्तत्सिद्धिलिङ्गानि विना चित्तप्रसादादिलिङ्गैरैव पापक्षयो ज्ञातव्य इत्याह— योग्यताया इति त्रिभिः ॥ ३६-३९ ॥ इसके बाद उसकी योग्यता की परीक्षा सभी वस्तुओं की शान्ति के लिये भी करे। नारसिंह मन्त्र से, अभिमतमन्त्र के जप से, दीक्षा से, आराधना से, होम,