सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६० सात्वतसंहिता फुल्लेन्दीवरसंकाशा त्वक्षसूत्रकराङ्किता । ध्येया भगवती निद्रा सर्वाश्चामरलाञ्छिताः ॥ ९२ ॥ सम्मुखा देवदेवस्य वस्त्रालङ्कारमण्डिताः । मूलमन्त्रादीनां ध्यानान्याह—एवं न्यस्त्वा ततो ध्यायेदित्यारभ्य वस्त्रालङ्कारमण्डिता इत्यन्तम् । अविद्यादलिनी मुद्रा वक्ष्यमाणा (१७।१०५-१०६) ज्ञेया ॥ ७२-९३ ॥ अब मूल मन्त्रों का ध्यान कहते हैं—इस प्रकार न्यास कर लेने के अनन्तर यथास्थित मन्त्रव्यूह का ध्यान करे । यह मन्त्रव्यूह सर्व देवमय हैं । समस्त तेजों के निधान हैं । सभी लक्षणों से संयुक्त और सभी ज्ञानादि गुणों से समन्वित हैं ॥ ७२-७३ ॥ ये उत्तप्त कनक के समान देदीप्यमान हैं, अङ्गों से सम्पूर्ण हैं, विशाल शरीर से संयुक्त हैं, सिंह के समान महाभयानक मुख वाले हैं, इनके नेत्र प्रचण्ड सूर्य के समान देदीप्यमान हैं ॥ ७४ ॥ बिजली समूहों के समान चमकीले रोमों में भरा हुआ इनका शरीर है । नख मण्डल कमल पत्र के समान लाल वर्ण का है तथा वज्र से भी अधिक कठोर और तीक्ष्ण है ॥ ७५ ॥ सटा (= रोम) चञ्चल साँप के समान चमकीली है जिसका प्रकाश करोड़ों चन्द्रमा की किरणों के समान है । वे अपने अन्दर में रहने वाली अग्नि को वायु वेग के समान शरीर के रोमछिद्रों से बाहर उगल रहे हैं ॥ ७६ ॥ अपने वाचक शब्द (ॐ) को प्रलयकालीन अम्बुद के समान गर्जन करते हुए उगल रहे हैं । कल्पान्तकालीन प्रलयाग्नि की ज्वाला अपने अन्तःकरण में धारण किये हुए हैं ॥ ७७ ॥ जो अपने छः अस्त्रों तथा आठ बाहुओं से व्याप्त होकर संसार में स्थित हैं, जिनका अङ्ग दिव्यगन्ध से अनुलिप्त है, जो दिव्य अम्बर धारण किये हुए हैं । जो दिव्य माला से वेष्टित हैं, दिव्यालङ्कारों से मण्डित हैं और जो वक्षःस्थल पर धारण किये हुए कौस्तुभ तथा श्रीवत्स से भी अलङ्कृत हैं, रत्न काञ्चन तथा उत्तमोत्तम मोतियों की माला तथा वनमाला से विभूषित हैं इतना ही नहीं, वे परमेश्वर ब्रह्मसूत्र से भी शोभित हैं ॥ ७८-८० ॥ जिनकी भुजायें श्रेष्ठ अस्त्रों के धारण करने से देदीप्यमान हो रही हैं और कमलों से भी संयुक्त हैं, जिनके दक्षिण हाथ में क्षीरसागर के समान श्वेत प्रणव ध्वनि निर्मित है और सैकड़ों हिमालय के समान शुभ्र कमल है और बायें हाथ में श्रेष्ठ शङ्ख तथा देदीप्यमान प्रभा वाली गदा और खड्ग शोभा दे रहा है, इस प्रकार भगवान् का ध्यान करे ॥ ८१-८२ ॥