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सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

३६० सात्वतसंहिता फुल्लेन्दीवरसंकाशा त्वक्षसूत्रकराङ्किता । ध्येया भगवती निद्रा सर्वाश्चामरलाञ्छिताः ॥ ९२ ॥ सम्मुखा देवदेवस्य वस्त्रालङ्कारमण्डिताः । मूलमन्त्रादीनां ध्यानान्याह—एवं न्यस्त्वा ततो ध्यायेदित्यारभ्य वस्त्रालङ्कारमण्डिता इत्यन्तम् । अविद्यादलिनी मुद्रा वक्ष्यमाणा (१७।१०५-१०६) ज्ञेया ॥ ७२-९३ ॥ अब मूल मन्त्रों का ध्यान कहते हैं—इस प्रकार न्यास कर लेने के अनन्तर यथास्थित मन्त्रव्यूह का ध्यान करे । यह मन्त्रव्यूह सर्व देवमय हैं । समस्त तेजों के निधान हैं । सभी लक्षणों से संयुक्त और सभी ज्ञानादि गुणों से समन्वित हैं ॥ ७२-७३ ॥ ये उत्तप्त कनक के समान देदीप्यमान हैं, अङ्गों से सम्पूर्ण हैं, विशाल शरीर से संयुक्त हैं, सिंह के समान महाभयानक मुख वाले हैं, इनके नेत्र प्रचण्ड सूर्य के समान देदीप्यमान हैं ॥ ७४ ॥ बिजली समूहों के समान चमकीले रोमों में भरा हुआ इनका शरीर है । नख मण्डल कमल पत्र के समान लाल वर्ण का है तथा वज्र से भी अधिक कठोर और तीक्ष्ण है ॥ ७५ ॥ सटा (= रोम) चञ्चल साँप के समान चमकीली है जिसका प्रकाश करोड़ों चन्द्रमा की किरणों के समान है । वे अपने अन्दर में रहने वाली अग्नि को वायु वेग के समान शरीर के रोमछिद्रों से बाहर उगल रहे हैं ॥ ७६ ॥ अपने वाचक शब्द (ॐ) को प्रलयकालीन अम्बुद के समान गर्जन करते हुए उगल रहे हैं । कल्पान्तकालीन प्रलयाग्नि की ज्वाला अपने अन्तःकरण में धारण किये हुए हैं ॥ ७७ ॥ जो अपने छः अस्त्रों तथा आठ बाहुओं से व्याप्त होकर संसार में स्थित हैं, जिनका अङ्ग दिव्यगन्ध से अनुलिप्त है, जो दिव्य अम्बर धारण किये हुए हैं । जो दिव्य माला से वेष्टित हैं, दिव्यालङ्कारों से मण्डित हैं और जो वक्षःस्थल पर धारण किये हुए कौस्तुभ तथा श्रीवत्स से भी अलङ्कृत हैं, रत्न काञ्चन तथा उत्तमोत्तम मोतियों की माला तथा वनमाला से विभूषित हैं इतना ही नहीं, वे परमेश्वर ब्रह्मसूत्र से भी शोभित हैं ॥ ७८-८० ॥ जिनकी भुजायें श्रेष्ठ अस्त्रों के धारण करने से देदीप्यमान हो रही हैं और कमलों से भी संयुक्त हैं, जिनके दक्षिण हाथ में क्षीरसागर के समान श्वेत प्रणव ध्वनि निर्मित है और सैकड़ों हिमालय के समान शुभ्र कमल है और बायें हाथ में श्रेष्ठ शङ्ख तथा देदीप्यमान प्रभा वाली गदा और खड्ग शोभा दे रहा है, इस प्रकार भगवान् का ध्यान करे ॥ ८१-८२ ॥

सप्तदशः परिच्छेदः ३६१ दाहिने दोनों हाथों में कालानल के समान प्रकाशित चक्र, बायें दोनों हाथों में धनुष के सहित (बाण) विद्यमान है। पुनः दोनों हाथों में अविद्यादलिनी मुद्रा धारण किये हुए हैं ऐसे प्रभु का ध्यान करे ॥ ८३-८४ ॥ इसी प्रकार कुमुद के समान स्वच्छ हृन्मन्त्र का ध्यान करना चाहिये। पद्म- राग पर्वत के आकार के समान आरक्त हृन्मन्त्र (नमः) के शिर का स्मरण करे। अञ्जन पर्वत के समान उसी आकृति वाले शिखा मन्त्र का स्मरण करे ॥ ८५ ॥ जिस प्रकार सूर्य की किरणों से चारों ओर सुवर्ण पर्वत चमचमाता रहता है उसी प्रकार देदीप्यमान कवचमन्त्र का ध्यान काल में चिन्तन करे ॥ ८६ ॥ सहस्रों अग्नि ज्वाला से युक्त अयस्कान्तमणि के समान देदीप्यमान सम्पूर्ण शक्तिसम्पन्न अस्त्रमन्त्र कहा गया है उसका स्मरण करे ॥ ८७ ॥ धूम रहित अङ्गार पर्वत के समान नेत्र-मन्त्रराज का ध्यान करे। अपनी रुचि के अनुसार पुरुषोत्तम की दो भुजाओं का स्मरण करे ॥ ८८। अस्त्र सहित कौस्तुभ तथा गदा एवं वनमाला इत्यादि स्त्री वेश वाले विकसित कमल के समान मनोहर स्वरूप वाली महाश्री एवं नाल संयुक्ता नलिनी का ध्यान करे ॥ ८९ ॥ चन्द्रमा की चन्द्रिका के समान प्रकाश वाली, श्वेत चामरधारिणी पूर्णचन्द्र के समान हाथ में चामर लिये हुए पुष्टि का स्मरण करे ॥ ९० ॥ अमृत से सम्पूर्ण कनक, कलश तथा विज्ञान-पुस्तक हाथ में लिये हुए स्फटिक के समान शुभ्र वर्ण वाली सरस्वती का स्मरण करे ॥ ९१ ॥ विकसित कमल के समान शोभा वाली हाथ में अक्षसूत्र धारण किये हुए सभी देव लक्षणों से युक्त भगवती निद्रा का ध्यान करे, जो वस्त्रालङ्कार से मण्डित देवाधिदेव के सम्मुख स्थित हैं, इस प्रकार ध्यान करे ॥ ९२-९३ ॥ एवं ध्यात्वा ततः कुर्यात् पूजनं कुसुमादिकैः ॥ ९३ ॥ स्नानैर्विलेपनैर्वस्त्रैर्माल्यैर्धूपैश्च दीपकैः । दध्ना च मधुमिश्रेण क्षीरेणाज्यान्वितेन च ॥ ९४ ॥ हृद्यैर्मृष्टैः स्थिरैर्मेध्यैर्नैवेद्यैर्विविधैः शुभैः । यथाकालोद्भवैः सर्वैः फलमूलैस्तु षड्रसैः ॥ ९४ ॥ पूजितैर्मुक्तदोषैस्तु मुद्रामन्त्रोपलक्षितैः । मूर्त्तैर्ध्यानैस्तथा स्विन्नैर्बीजैर्होमादिनाऽथवा ॥ ९६ ॥ षष्ठपरिच्छेदे विस्तरेणोक्तत्वादिहोपचारानुपूर्वी संक्षेपेणाह—एवं ध्यात्वेत्या- दिभिः ॥ ९३-९६ ॥ सा० सं० - 27

३६२ सात्वतसंहिता इस प्रकार मन्त्र देवों का ध्यान कर पुष्पादि से उनका पूजन करे । स्नान विलेपन, वस्त्र, माला, धूप, दीप, दही, मधु मिश्रित क्षीर एवं घृत से हृदय को बल देने वाले, मीठे, स्थिर एवं बुद्धिवर्धक विविध कल्याणकारी नैवेद्य और यथाकाल उत्पन्न होने वाले षड्रस संयुक्त फल, मूल आदि से पूजित देव का ध्यान करे । मुद्रा मन्त्र द्वारा दोषों से मुक्त हो जावे और प्रकट मूर्ति के समान ध्यान करे । भीगे हुए बीजों से अथवा होमादि द्रव्यों से होम करे ॥ ९३-९६ ॥ ततः स्वहस्तौ संस्कृत्य अम्भसाऽऽलम्भनादिना । बद्ध्वा प्रदर्शयेन्मुद्रां त्रिशिखां सम्मुखे विभोः ॥ ९७ ॥ ध्यात्वा त्रेताग्निरूपं तु दक्षिणाङ्गुलित्रयम् । स्पृष्टमूर्ध्वशिखं सैव ज्येष्ठाक्रान्ता कनीयसी ॥ ९८ ॥ अथोऽखिलस्वरूपश्च ध्वान्तातीतोऽग्निरूपधृक् । देवो गुणत्रयातीतस्तथा मार्गत्रयातिगः ॥ ९९ ॥ धर्मैः स्थूलतरैर्मुक्तो योऽयं व्यक्तो धियार्चितः । मूलमुद्रादर्शनमाह—तत इति सार्द्धैस्त्रिभिः । अम्भसा = अर्घ्यजलेनेत्यर्थः । "मुद्राबन्धे कराभ्युक्षाम्" इत्यर्घ्यविनियोगस्य वक्ष्यमाणत्वात् । आलम्भनादिना चन्दनादिनेत्यर्थः । आदिशब्देन कर्पूरकुङ्कुमादिकं गृह्यते । दक्षिणहस्तेऽङ्गुष्ठेन कनिष्ठिकामाक्रम्य तर्जन्याद्यङ्गुलित्रयमृज्वीकृत्य भगवदभिमुखं दर्शयेदिति फलितोऽर्थः ॥ ९७-१०० ॥ अब मूल मुद्रा प्रदर्शन की विधि कहते हैं—फिर जल स्पर्शादि से हाथ प्रक्षालन कर, हाथ शुद्ध कर, दोनों हाथ जोड़कर भगवान् के सामने त्रिशिखा मुद्रा प्रदर्शित करे ॥ ९७ ॥ अब त्रिशिख मुद्रा का स्वरूप कहते हैं—त्रेताग्नि के स्वरूप का ध्यान करे फिर दाहिने हाथ के अंगूठे से कनिष्ठा को दबा देवे । तदनन्तर शेष तर्जनी आदि तीन अङ्गुलियों को सीधी खड़ी कर देवे । फिर इस मुद्रा को भगवान् के सामने प्रदर्शित करे तो वही मुद्रा त्रेताग्नि स्वरूप कही जाती है यही फलितार्थ है ॥९८॥ यही देव सर्वस्वरूप हैं, अज्ञान रूप अन्धकार से सर्वथा परे हैं, अग्नि स्वरूप हैं, किं बहुना, यही देव तीनों गुणों से परे हैं तथा मार्गत्रयातीत भी हैं । यही स्थूलतर धर्मों से तो मुक्त हैं, किन्तु मानसिक पूजा से अर्चित होने पर अभिव्यक्त होते हैं ॥ ९९-१०० ॥ हृन्मुद्राकथनम् सम्पुटं हृदयोद्देशे बद्ध्वा हस्तद्वयेन तु ॥ १०० ॥ निरन्तराभ्यां शाखाभ्यां मुद्रैषा हार्दिकी स्मृता ।

सप्तदशः परिच्छेदः ३६३ हृन्मन्त्रमुद्रामाह—सम्पुटमिति। हार्दिकी हृदयसम्बन्धिनीत्यर्थः॥ १००-१०१॥ अब हृन्मुद्रा कहते हैं—दोनों हाथों से सम्पुट बाँधकर हृदय प्रदेश पर स्थापित करे, दोनों हाथो की अङ्गुलियों में अन्तर न रहे तब यह हृदय सम्बन्धिनी मुद्रा कही जाती है ॥ १००-१०१ ॥ शिरोमन्त्रादिमुद्रापञ्चककथनम् अङ्गुष्ठादिकनिष्ठान्तं शाखायुग्मं पृथक् पृथक् ॥ १०१ ॥ सान्तरं सम्पुटादस्मात् कनिष्ठादौ तथा भवेत् । शिरश्शिखातनुत्रास्त्रनेत्रमुद्रा यथाक्रमम् ॥ १०२ ॥ शिरोमन्त्रादिमुद्रापञ्चकमाह—अङ्गुष्ठादीति सार्धेन । पूर्ववत् करद्वयेन सम्पुटं कृत्वाऽङ्गुष्ठयुग्मं तर्जनीयुग्मं मध्यमायुग्ममनामिकायुग्मं कनिष्ठिकायुग्मं च सान्तरालं यथा तथा पृथक् पृथक् विभज्य कनिष्ठाद्यङ्गुष्ठान्तमङ्गुलियुग्मपञ्चके क्रमेण शिरः- शिखाकवचास्त्रनेत्रमुद्रा इति विज्ञेयाः ॥ १०१-१०२ ॥ अब शिरोमन्त्रादिमुद्रा पञ्चक कहते हैं—दोनों हाथों से सम्पुट बनाकर दोनों अंगूठो, दोनों तर्जनी, दोनों मध्यमा, दोनों अनामिका, दोनों कनिष्ठा के बीच-बीच में थोड़ा अन्तर रख कर अलग-अलग प्रविभक्त करे । इस प्रकार कनिष्ठा युग्म से अङ्गुष्ठ युग्म पर्यन्त पाँचों अङ्गुलियों को क्रमशः शिरोमुद्रा, शिखामुद्रा, कवचमुद्रा, अस्त्रमुद्रा तथा नेत्रमुद्रा कहा जाता है ॥ १०१-१०२ ॥ श्रियादिशक्तिमुद्राचतुष्टय कथनम् अस्यामङ्गुष्ठयुग्मं तु मुद्रायां करमध्यगम् । प्रदेशिन्यां ततो विद्धि कनिष्ठान्तं श्रियादिषु ॥ १०३ ॥ श्रियादिशक्तिमुद्रा चतुष्टयमाह—अस्यामिति । अस्यां मुद्रायां पूर्वोक्तरीत्या पृथग्विभक्ताङ्गुलिद्विकपञ्चकविशिष्टायां मुद्रायामङ्गुष्ठयुग्मं करमध्ये कर्णिका- रूपेण संस्थाप्य तर्जन्यादिद्विकचतुष्टये क्रमेण लक्ष्मीपुष्टिसरस्वतीनिद्रामुद्राचतुष्टयं बोध्यम् ॥ १०३ ॥ अब श्रियादि शक्ति मुद्रा चतुष्टय का प्रकार कहते हैं—इस पूर्वोक्त मुद्रा में पृथग्विभक्त पाँचों युग्म अङ्गुलि विशिष्ट मुद्रा में, अङ्गुष्ठ युग्म को हाथ के मध्य में कर्णिका रूप से स्थापित कर देवे तो शेष तर्जनादि द्विक चतुष्टय को क्रमशः लक्ष्मीमुद्रा, पुष्टिमुद्रा, सरस्वतीमुद्रा और निद्रामुद्रा नामक चार मुद्रायें हो जाती हैं, ऐसा समझना चाहिये ॥ १०३ ॥ स्वमन्त्रयुक्ता चान्येषामर्चितानां यथाक्रमम् । पुनः पुनः प्रयोक्तव्या हार्दयं शिरसा सह ॥ १०४ ॥ अन्येषां हृन्मुद्रैव शिरोमुद्रया सह तत्तन्मन्त्रेण प्रयोक्तव्येत्याह—स्वमन्त्रयुक्तेति ।

३६४ सात्वतसंहिता अन्येषामित्यनेन श्रीवत्सादिभूषणानां चक्रादिलाञ्छनानामन्तादिपीठदेवानां विष्वक्से- नादिगुरूणां द्वारावरणस्थपरिवाराणां च ग्रहणं बोध्यम् । ननु जयाख्ये एतेषामपि मुद्राः प्रतिपादिताः । तत्राप्यनुक्तमुद्राणामेव हृ(न्मन्त्रा- न्मुद्रा)प्रदर्शनं सरसमिति चेन्न, तत्तत्संहितानिष्ठैस्तत्तदुक्तप्रकारेणैवानुष्ठेयत्वात् । ननु तर्हि सात्वतोपबृंहणे जयाख्योक्ताः श्रीवत्सादिमुद्राः संगृहीता इति चेत् सत्यम् । तत्र— सामान्या सर्वमन्त्राणामेका मुद्राञ्जलिः स्मृता ॥ स्वेन स्वेन तु मन्त्रेण संयुक्तां तां प्रयोजयेत् । —(ई०सं० २३।४१-४२) इति सात्वतोक्तपक्षस्यापि प्रतिपादित्वान्न भेतव्यमायुष्मता ॥ १०४ ॥ श्रीवत्सादि अन्य देवता के अर्चन में हृन्मुद्रा को ही शिरोमुद्रा के साथ तत्तन्मन्त्रों के साथ प्रयोग करे ॥ १०४ ॥ परस्परमुखौ श्लिष्टौ शाखाक्रान्तौ परस्परम् । किन्तु वै दक्षिणं हस्तमूर्ध्वं चाप्यधरेऽपरम् ॥ १०५ ॥ अविद्यादलिनी ह्येषा मुद्रा पूर्वमुदाहृता । अथ भगवतो हस्तस्थिताया अविद्यादलिन्या मुद्राया लक्षणमाह—परस्परेति सार्धेन । हस्तौ परस्पराभिमुखौ संश्लिष्टौ परस्पराङ्गुलिभिराक्रान्तौ च कृत्वा । दक्षिण- मुत्तरं अपरमधरं कुर्यादित्यर्थः ॥ १०५-१०६ ॥ अब भगवान् के हाथ में स्थित अविद्यादलिनी मुद्रा का लक्षण कहते हैं— अपने दोनों हाथों को परस्पर सामने रख कर एक में मिला देवे । फिर परस्पर अङ्गुलियों से दोनों हाथों को आक्रान्त कर दाहिने हाथ को ऊपर तथा बायें हाथ को नीचे करे । त्रिशिखा मुद्रा पहले कही गई है और अब अविद्यादलिनीमुद्रा कही गई ॥ १०५-१०६ ॥ एवं मुद्रात्रयं कृत्वा पूजां कृत्वा पुनः प्रभोः ॥ १०६ ॥ यथाशक्ति जपं कुर्याच्छतमष्टाधिकं तु वै । पूर्वोक्तां त्रिशिखामुद्रामिमामविद्यादलिनीमुद्रां च भगवते प्रदर्श्य पुनरर्घ्यादिभि- रभ्यर्च्राष्टोत्तरशतवारं यथाशक्ति वा मूलमन्त्रं जपेदित्याह—एवमिति । हृन्मन्त्रा- दीनामेकैकवारं जपः कार्यः । तेषां मूलमन्त्राराधनाङ्गभूतत्वात् सकृज्जपेऽपि न प्रत्यवायः ॥ १०६-१०७ ॥ इस प्रकार इन मुद्राओं को भगवान् के सामने प्रदर्शित करना चाहिए फिर अर्घ्यादि द्वारा अर्चना कर मूलमन्त्र का एक सौ आठ बार अथवा यथाशक्ति जप करना चाहिए ॥ १०६-१०७ ॥

सप्तदशः परिच्छेदः ३६५ एकैकं हृदयादीनां सर्वेषां विहितं त्वथ ॥ १०७ ॥ क्रियाङ्गत्वान्न दोषोऽस्ति अन्यथा तज्जपं विना । सकृज्जपस्याप्यकरणे प्रत्यवाय इत्याह—एकैकमिति ॥ १०७-१०८ ॥ हृन्मन्त्रादि का एक-एक बार जप करे । ये मन्त्र मूलमन्त्र के आराधन के अङ्ग हैं । अतः एक बार भी जप करने में कोई दोष नहीं । यदि इन मन्त्रों को एक बार भी जप न करे तब प्रत्यवाय होता है ॥ १०७-१०८ ॥ तमर्चयित्वाऽष्टाङ्गेन प्रणम्य परमेश्वरम् ॥ १०८ ॥ स्मृत्वाऽनुज्ञां समादाय यजेद् वह्निगतं ततः । एवं जपयज्ञानन्तरं साष्टाङ्गप्रणामजितन्तादिस्तोत्रपठनपूर्वकं भगवदनुज्ञया वह्नि- सन्तर्पणं कुर्यादित्याह—तमिति ॥ १०८-१०९ ॥ फिर साधक भगवान् का अर्चन कर अष्टाङ्ग प्रणिपात द्वारा उनको प्रणाम करे । तत्पश्चात् भगवान् का स्मरण कर वह्नि सन्तर्पण द्वारा उनके यजन की आज्ञा लेवे ॥ १०८-१०९ ॥ कुण्डं सुलक्षणं कृत्वा संस्कारैः संस्कृतं पुरा ॥ १०९ ॥ पूजयित्वार्घ्यपुष्पाद्यैस्तत्राग्निमवतार्य च । सुसमिद्धं च निर्धूमं संशुद्धं ताडनादिना ॥ ११० ॥ अर्घैर्निरम्बुकुसुमैः पूजयित्वा च भावयेत् । व्यस्तो गुणगणः षष्ठस्तेजो नाम गुणो हि यः ॥ १११ ॥ परस्य ब्रह्मणः सोऽयं सामान्यं सर्वतेजसाम् । ध्यात्वैवं नेत्रमन्त्रेण निक्षिपेत् कुण्डमध्यतः ॥ ११२ ॥ पावनैरिन्धनैः शुष्कैः कृत्वा निर्धूममेव तम् । समिद्भिरर्चयित्वाऽथ तन्मध्ये मन्त्रमण्डलम् ॥ ११३ ॥ ध्यात्वाऽभ्यर्च्य यथापूर्वं सन्तर्प्य सघृतैस्तिलैः । परिवारयुतं देवं सहस्रशतसंख्यया ॥ ११४ ॥ दद्यात् पूर्णाहुतिं सम्यग् होमसंख्यां निवेद्य च । वह्निसन्तर्पणक्रममाह—कुण्डमित्यारभ्य होमसंख्यां निवेद्य चेत्यन्तम् । सुलक्षणम् = एकादशपरिच्छेदोक्तलक्षणान्वितमित्यर्थः । संस्कारैः = षष्ठपरिच्छेदोक्तैः, उप- लेपनादिभिरित्यर्थः । पूजयित्वाऽर्घ्यपुष्पाद्यैरित्यत्रापि—"तदभ्यर्च्यर्घ्यपुष्पाद्यैर्ध्यायेत् तद्ब्रह्मपीठवत्" (६।८३) इत्याद्युक्तप्रकारो ज्ञेयः । संशुद्धं ताडनादिनेत्यत्र— सन्ताड्य चास्त्रमन्त्रेण प्रोक्षयेच्छिखया च तम् ॥ अर्चयेत् कवचेनैव कवचेनावकुण्ठ्य च ।

३६६ सात्वतसंहिता प्लावयेदमृतेनैव नेत्रमन्त्रेण नारद ॥ पूरकेणोपहृत्याथ स्वात्मन्युपशमं नयेत् । —(१५।६०-६२) इति जयाख्योक्तास्ताडनादिसंस्कारा ग्राह्याः । संगृहीताश्चैवमीश्वरतन्त्रेऽपि । समिद्भिः = पूर्वोक्तसप्तसमिद्भिरित्यर्थः । मन्त्रमण्डलं = मूलमन्त्रादिमन्त्रसमूह- मित्यर्थः । होमसंख्यां निवेद्य, मण्डलस्थाय भगवत इति शेषः ॥ १०९-११५ ॥ फिर आज्ञा लेने के पश्चात् एकादश परिच्छेद में कही गई विधि के अनुसार सुलक्षण कुण्ड निर्माण करे, षष्ठ परिच्छेद में कही गई विधि के अनुसार उप- लेपनादि विधि से कुण्ड को संस्कार से सुसंस्कृत करे ॥ १०९ ॥ अर्घ्य, पुष्पादि से कुण्ड की पूजा करे । उसमें शास्त्रीय विधि के अनुसार अग्नि स्थापन करे । उसे अस्त्र मन्त्र से ताड़न द्वारा संशुद्ध कर निर्धूम तथा सुसमिद्ध बनावे ॥ ११० ॥ अर्घ्य तथा शुष्क कुसुमों से अग्नि की पूजा करे । उनका ध्यान करे । यह अग्नि परब्रह्म का षष्ठ तेज है जो सबसे विलक्षण एवं गुणों का समूह है । सभी तेजों में सामान्य तेज है । इस प्रकार नेत्र मन्त्र से अग्नि का ध्यान कर कुण्ड के मध्य में अग्नि स्थापन करे ॥ १११-११२ ॥ उस अग्नि में शुष्क इन्धन डाल कर उसे निर्धूम बनाना चाहिये । उसके मध्य में मन्त्रमण्डल का समिधाओं से अर्चन करे ॥ ११३ ॥ पुनः ध्यान करे, फिर अर्चन करे, तदनन्तर घृत सहित तिल से एक लाख की संख्या में परिवार युक्त देवाधिदेव नृसिंह को सन्तुष्ट करे । फिर होम संख्या भगवान् को निवेदन कर अच्छी प्रकार से पूर्णाहुति प्रदान करे ॥ ११४-११५ ॥ ततः शुचीन् सोपवासान् शोधितान् बद्धलोचनान् ॥ ११५ ॥ भक्तान् प्रवेशयेत् तत्र गृहीतकुसुमांस्तु वै । प्रक्षेपयेन्मण्डलान्तर्नेत्रबन्धं विमुच्य च ॥ ११६ ॥ अष्टाङ्गप्रणिपातैस्तु प्रदक्षिणयुतैस्ततः । देवश्चाग्निर्गुरुः कुम्भः पूजनीयः पुनः पुनः ॥ ११७ ॥ तत्कालं भक्तिभावेन विज्ञाता योग्यता यदा । तीव्रमान्दादिकां तेषां तदा दीक्षां समाचरेत् ॥ ११८ ॥ जुहुयाद् व्यक्तसंशुद्धौ शतमष्टाधिकं तु वै । तिलानां तद्वदाज्यस्य द्वादशार्णेन बुद्धिमान् ॥ ११९ ॥ दद्यात् पूर्णाहुतिं पश्चान्मन्त्रमर्ध्यादिनार्च्य च । ततश्चाङ्गसमूहेन प्रागुक्तपरिसंख्यया ॥ १२० ॥ कुर्याद्व्यक्तशुद्ध्यर्थं दद्यात् पूर्णाहुतिं ततः ।

सप्तदशः परिच्छेदः ३६७ स्वरूपापादनार्थं तु मूलबीजेन वै तथा ॥ १२१ ॥ प्रणवादिनमोऽन्तेन कुर्याद् होममतन्द्रितः । ध्यात्वा निरस्तबन्धं तं शुद्धं शान्तं तु सर्वगम् ॥ १२२ ॥ समस्तसंवित्पूर्णं च दद्यात् पूर्णाहुतिं ततः । मूलमन्त्रेण मन्त्रज्ञो भक्तानामनुकम्पया ॥ १२३ ॥ अस्मिन्नवसरे कर्तव्यं शिष्याणां नृसिंहमन्त्रदीक्षाक्रममाह—ततः शुचीनित्यारभ्य भक्तानामनुकम्पयेत्यन्तम् । शोधितान् पूर्वोक्तब्रह्मकूर्चप्रायश्चित्तादिभिः संशुद्धानित्यर्थः । प्रक्षेपयेत् तदञ्जलिस्यपुष्पाणीति शेषः । देवः = मण्डलस्थो देव इत्यर्थः । तत्कालम् भक्तिभावेन = वक्ष्यमाणोत्पुलकानन्दबाष्पादिभक्तिसूचकेनेत्यर्थः । व्यक्तसंशुद्धौ = महदादिरूपेण स्थूलावस्थापन्नप्रकृतिशुद्ध्यमित्यर्थः । द्वादशार्णेन नृसिंहद्वादशाक्षरेणे- त्यर्थः । अङ्गसमूहेन हृन्मन्त्रादिषट्केन । अव्यक्तशुद्ध्यर्थं = सूक्ष्मावस्थापन्नप्रकृति- शुद्ध्यर्थमित्यर्थः । स्वरूपापादनार्थं = चेतनशुद्ध्यर्थमित्यर्थः । मूलमन्त्रेण = नृसिंह- बीजेनेत्यर्थः ॥ ११५-१२३ ॥ इसके बाद पवित्रता से पूर्ण कार्य, वचन, मन से सर्वथा शुद्ध जिनके नेत्र बँधे हुए हों ऐसे हाथ में पुष्प लिये हुए भक्तों का प्रवेश करावे । फिर उनका नेत्र खोल कर मन्त्र कुसुमाञ्जलि का उन्हीं से प्रक्षेप करावे ॥ ११५-११६ ॥ वे भक्त भगवान् को प्रदक्षिणा सहित अष्टाङ्ग प्रणाम करें, तदनन्तर देव, अग्नि, गुरु और कलश की पुनः पूजा करें ॥ ११७ ॥ इस प्रकार तत्काल भक्तिभाव देखकर जब गुरु उसकी योग्यता का ज्ञान कर लेवे, तब उत्तम और मन्द के क्रम से उन शिष्यों को दीक्षा प्रदान करे ॥ ११८ ॥ फिर स्थूलावस्थापन्न प्रकृति की शुद्धि के लिये द्वादशवर्ण के मन्त्र से एक सौ आठ बार तिल और घृत से बुद्धिमान गुरु होम करे ॥ ११९ ॥ फिर अर्घ्यादि द्वारा मन्त्र देवता को पूर्णाहुति प्रदान करे । पुनः इसके बाद हृन्मन्त्रादि छह मन्त्रों से अङ्गसमूहों को आहुति प्रदान करे ॥ १२० ॥ फिर सूक्ष्मावस्थापन्न प्रकृति की शुद्धि के लिये तथा स्वरूप की प्राप्ति के लिये नृसिंह बीज से पुनः होम करे ॥ १२१ ॥ उक्त पूर्णाहुति होम भगवान् को सर्वथा बन्धनरहित, शुद्ध, शान्त, सर्वग एवं समस्त संविदापूर्ण समझकर उनका ध्यान भक्तों के ऊपर प्रसन्न होने के लिये करना चाहिए ॥ १२२-१२३ ॥ शिष्याणां समयोपदेशप्रकारविधानम् समयान् श्रावयेत् पश्चात् कुम्भेऽग्नौ मण्डले ततः । भक्त्या यया तु सम्प्राप्तमैहिकामुष्मिकं त्वया ॥ १२४ ॥

३६८ सात्वतसंहिता नास्याः कुर्याः परित्यागं कर्मणा मनसा गिरा । सध्यं विना न कुर्याद् वै स्नानादीनां च लोपनम् ॥ १२५ ॥ यावज्जीवं यथाशक्तिः संस्थितो यत्र कुत्रचित् । स्थानेषु हृदयाद्येषु कुर्यान्मन्त्रगणार्चनम् ॥ १२६ ॥ द्रव्यैः पुष्षाम्बुपूर्वैस्तु तदभावे तु वै हृदि । मानसीं पूर्ववत् पूजां निर्वपेन्न्यासपूर्विकाम् ॥ १२७ ॥ मन्त्रनाथं गुरुं मन्त्रं समत्वेनाभिवीक्षयेत् । मन्त्रमण्डलमुद्राणां परां गुप्तिं समाचरेत् ॥ १२८ ॥ दूरादेव नमस्कार्यो मृगराड् व्याघ्र एव वा । तदाकृतिमृगोऽन्यो वा तच्चर्म क्वापि नारुहेत् ॥ १२९ ॥ न चाक्रमेत पादेन न च तल्पादिकं स्पृशेत् । पद्मपत्रैस्तथाश्वत्थपर्णैर्भोजनभाजनम् ॥ १३० ॥ वर्जनीयं तथा शङ्खपद्माद्याङ्कितमासनम् । नक्तं वा परिपीडं वाऽप्येकादश्यां समाचरेत् ॥ १३१ ॥ विशेषपूजनं कुर्याद् द्वादशीष्वखिलासु च । अयनादिषु चान्येषु सूर्यसंक्रमणे षु च ॥ १३२ ॥ न भूतग्रहदुष्टानां व्याधीनां वा कदाचन । असिद्धेन स्वमन्त्रेण कुर्यादुत्सारणं तु वै ॥ १३३ ॥ मन्त्रजं सिद्धिलिङ्गं यत् स्वप्ने प्रत्यक्षतोऽपि वा । अनुभूतं न वक्तव्यं कस्यचिद् गुरुणा विना ॥ १३४ ॥ व्यक्तं नृसिंहबीजं तु दृश्यते यत्र कुत्रचित् । नमस्कुर्यात् समभ्यर्च्य वाक्पुष्पैः सप्रदक्षिणैः ॥ १३५ ॥ कृत्वाऽश्रुपातं शोकं वा विप्रयोगनिमित्ततः । स्नानादृते न कुर्याद् वै देवाग्निपितृतर्पणम् ॥ १३६ ॥ आ नाभिवर्धनात् कालादन्यत्र सति सङ्करे । सूतकाख्ये न कर्तव्यं प्रागुक्तं चैव यत्नतः ॥ १३७ ॥ स्वानुष्ठानं हि वै यस्मादागमात् समुपागतम् । तस्य सम्पूजनं यत्नाद् गोपनं च समाचरेत् ॥ १३८ ॥ ब्राह्मणादीन् यथाशक्ति दीनानाथांश्च पालयेत् । एवं हि समयान् दद्याद् भक्तानां भावितात्मनाम् ॥ १३९ ॥ सम्पालनाच्च येषां वै प्राप्नुयान्मन्त्रजं फलम् ।

सप्तदशः परिच्छेदः ३६९ अथ शिष्याणां समयोपदेशप्रकारमाह-समयान् श्रावयेत् पश्चादित्यारभ्य प्राप्नुयान्मन्त्रजं फलमित्यन्तम् । कुम्भमण्डलादिस्थितभगवद्विषयकया यया भक्त्या ऐहिकामुष्मिकफलसिद्धिर्भवति, तां भक्तिं करणत्रयेणापि न त्यजेदिति प्रथम- नियमार्थः । साध्यं विना औषधिसवनादिकं विनेत्यर्थः । तल्पादिकं = व्याघ्रचर्म- कृततल्पादिकमित्यर्थः । न स्पृशेदित्यत्रापि पादेनेत्यनुषङ्गः । परिपीडं = शुद्धोपोषण- मित्यर्थः । आ नाभिवर्धनात् कालाद् अन्यत्र नाभिनालच्छेदनानन्तरमित्यर्थः । तत्पूर्वं सूतकाभावादिति भावः । तथा च जैमिनिः- यावन्न छिद्यते नालं तावन्नाप्नोति सूतकम् । छिन्ने नाले ततः पश्चात् सूतकं तु विधीयते ॥ इति । एवं च- अत्र दद्यात् सुवर्णं वा भूमिं गां तुरगं रथम् । छत्रं छागं वस्त्रमाल्ये शयनं वासनं गृहम् ॥ धान्यं गुडं तिलं सर्पिरन्यद्वास्ति गृहे वसु । आयान्ति पितरो देवा जाते पुत्रे गृहं प्रति ॥ तस्मात् पुण्यमहः प्रोक्तं भारते चादिपर्वणि । इत्युक्तप्रकारेणापि स्पष्टमेव श्रीनृसिंहो भजनीय इति फलितोऽर्थः । मन्त्रमण्डलमूद्राणां गोपनं पूर्वमुक्तम् । स्वानुष्ठानमित्यनेन शास्त्रस्य गोपनमुक्तमिति ज्ञेयम् ॥ १२४-१४० ॥ फिर गुरु उन शिष्यों को वैष्णव-धर्म के नियमों को इस प्रकार सुनावे-जिन कुम्भ अग्नि मण्डल पर स्थित भगवान् की भक्ति से आपने ऐहिक एवं आमुष्मिक समस्त कल्याणों की प्राप्ति की है । उन भगवान् की भक्ति का मन, वचन और कर्म से कदापि परित्याग न करना-यह प्रथम नियम है । साध्य (कारण) के बिना स्नानादि क्रिया का लोप नहीं करना-यह दूसरा नियम है । जीवन पर्यन्त यथाशक्ति जहाँ कहीं भी संस्थित रहे वहीं हृदयादि स्थानों में मन्त्रगणों का अर्चन करते रहना चाहिये ॥ १२४-१२६ ॥ यदि पुष्प, जलादि पूजा सामग्री हो तो उन्ही द्रव्यों से पूजन करे और उसके अभाव में हृदय में ही मानसी पूजा न्यास विधानपूर्वक करे ॥ १२७ ॥ मन्त्रनाथ, गुरु और मन्त्र में समान दृष्टि रखे । मन्त्र, मण्डल और मुद्रा को सर्वथा गुप्त रखे ॥ १२८ ॥ मृगराट् तथा व्याघ्र को देखकर उन्हें दूर से ही नमस्कार करे । उसकी आकृती के समान अन्य मृगादिकों को भी देखकर नमस्कार करे । उसके चर्म पर कदापि ने बैठे, न आरोहण करे ॥ १२९ ॥ पैर से स्पर्श भी न करे, व्याघ्र चर्मादि द्वारा निर्मित शय्या का पैर से स्पर्श न करे । कमल पत्र तथा अश्वत्थपत्र का पात्र न बनावे और न उस पर कदापि भोजन ही करे ॥ १३० ॥

३७० सात्वतसंहिता जिस आसन पर शङ्ख और कमल का चिह्न हो उसे वर्जित करे उस पर न बैठे। रात्रि के समय अथवा एकादशी के दिन शुद्ध उपवास करे ॥ १३१ ॥ सम्पूर्ण द्वादशी तिथियों, उत्तरायण, दक्षिणायन में तथा सङ्क्रान्ति काल में विशेष पूजा करे ॥ १३२ ॥ यदि मन्त्र सिद्ध न किया गया हो तो उस असिद्ध मन्त्र से भूत एवं ग्रह से दूषितों का तथा व्याधियों का स्वतन्त्र रूप से उत्सारण कदापि न करे ॥ १३३ ॥ स्वप्न में, अथवा प्रत्यक्ष जिसे मन्त्र द्वारा सिद्धि के लक्षण दिखाई पड़ जावे, अथवा मन्त्र से अनुभूत हो जावे यह सिद्धि का चिह्न कदापि किसी से न कहे। किन्तु गुरु से कहा जा सकता है ॥ १३४ ॥ जहाँ किसी नृसिंह का बीज स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ जावे। उसे वाक्पुष्प से अर्चन करे, प्रदक्षिणा करे और नमस्कार करे ॥ १३५ ॥ किसी के विप्रयोग का निमित्त होने पर यदि अश्रुपात हो जावे, अथवा शोक हो जावे, तब बिना स्नान किये देवाग्नि पितृ तर्पण न करे ॥ १३६ ॥ जब तक नाभिनाल का छेदन न हो तब तक सूतक का दोष नहीं लगता। अन्यत्र साङ्कर्य हो जाने पर दोष लगता है। अतः पहले जितनी क्रियायें कही गई हैं उन्हें सूतक में तथा अन्य प्रत्यवायों में न करे ॥ १३७ ॥ जिस आगम से अपना अनुष्ठान सिद्ध हो, अथवा प्राप्त हो, उस आगम- शास्त्र का सर्वदा पूजन करे और सर्वदा गुप्त रखे ॥ १३८ ॥ अपनी शक्ति के अनुसार ब्राह्मणादि दीन तथा अनाथों का पालन करे। इस प्रकार संसारी शिष्य भक्तों के कल्याण के लिये गुरु उपदेश करे। जिनके कृपा प्रसाद से शिष्य मन्त्र जन्य फल प्राप्त करता है, उन गुरु का शिष्य को पूजन करना चाहिए ॥ १३९-१४० ॥ इष्ट्वैवं हि ततः कुर्यात् सेचनं कलशेन तु ॥ १४० ॥ आत्मनश्चानु भक्तानां नैवेद्यं प्रार्थयेत् ततः । ब्राह्मणाय च तद्दद्याद् न्यस्तमाहत्य मन्त्रराट् ॥ १४१ ॥ शिष्यस्य महाकुम्भोदकेनाभिकेनाभिषेकमाह—इष्ट्वेत्यर्धेन। एतत्क्रमो विस्तरेण वक्ष्यमाणो ग्राह्यः। स्वानुयागार्थं कारिप्रदानार्थं च देवं हविः प्रार्थयेदित्याह—आत्मन इत्यर्धेन। कारिप्रदानमाह—ब्राह्मणायेत्यर्धेन। अत्रैकमूर्तेर्नृसिंहस्याराधनप्रकरणाद् ब्राह्म- णायेत्येकवचनमुक्तम्, पूर्वं चातुरात्म्यार्चनप्रकरणात्— सम्पूज्य गन्धधूपैश्च ततस्तु भगवन्मयान् ॥

सप्तदशः परिच्छेदः ३७१ यथाक्रमं समभ्यर्च्य नैवेद्यं प्रतिपाद्य च। (६।७४-७५) इति, एवमुक्त्वा समभ्यर्च्य चतुरः पाञ्चरात्रिकान्॥ (१४।३०) इति च चत्वारः कारिणः प्रोक्ता इति ज्ञेयम् । तत्राप्यशक्तावेक एवोक्तः सप्तम- परिच्छेदे (७।७८) । तदानीमेकस्यैव चतुर्मूर्त्यात्मकत्वं बोध्यम् । न्यस्तमन्त्रराडाहृत्य हविषि न्यस्तं मन्त्रत्रयमुपसंहृत्येत्यर्थः । एवमेवोक्तं पारमेश्वरादिष्वपि- विनिवेश्य च देवाय विन्यास्तानोदनोपरि ॥ बलवीर्यादिसन्मन्त्रान् रसवीर्यादिवर्जितान् । ओमित्युपाहरेन्मन्त्री ततः संहृतिमुद्रया ॥ इति । (१८।३८७-३८८) त्रय्यन्तज्ञानसम्पन्नान् यथोक्ताचारनिष्ठितान् । समाहूयार्घ्यगन्धाद्यैः समभ्यर्च्य यथाक्रमम् ॥ भगवच्छेषमादाय न्यस्तमाहृत्य मन्त्रपम् । प्राङ्निवेदनकाले तु चतुर्धा संविभज्य तम् ॥ प्रापणं मधुपर्काद्यमन्यच्चाभ्यवहारिकम् । तेभ्यो दद्यादेकभागमर्घ्योदकपुरस्सरम् ॥ इति । पूर्वं होमात् पूर्वं कारिप्रदानमुक्तम्, इदानीं होमानन्तरमपि कारिप्रदानस्योक्तत्वात् तस्य कालद्वयेऽन्यतरकर्तव्यत्वमुक्तं भवति ॥ १४०-१४१ ॥ इसके पश्चात् गुरु कलशोदक से शिष्य का अभिषेक करे । फिर कार्य- कर्त्ताओं को देने के लिये तथा अपने यज्ञ की सिद्धि के लिये भगवान् से नैवेद्य ग्रहण की प्रार्थना करे । इस प्रकार मन्त्रराज को निवेदित नैवेद्य प्रथमतः ब्राह्मण को ही देना चाहिए ॥ १४०-१४१ ॥ क्षमापयेत् ततो देवं यत्र यत्रावतारितम् । अथ शिष्टैस्तु नैवेद्यैर्यजेद् गणपतिं प्रभुम् ॥ १४२ ॥ अपराधक्षमापणमाह—क्षमापयेदित्यर्धेन । यत्र यत्र कुम्भे मण्डलेऽग्नौ चेत्यर्थः । फिर जहाँ-जहाँ कुण्ड, मण्डल और अग्नि में भगवान् को पधराया गया हो उन-उन स्थानों पर भगवान् से क्षमा प्रार्थना करे । फिर शेष नैवेद्यों से प्रभु गणपति का यजन करे ॥ १४२ ॥ विष्वक्सेनाभिधानं चाप्यर्घ्याद्यैरर्चितो हि यः । चरुरूपेण चान्नेन सोदकेन हृदा ततः ॥ १४३ ॥ बहिराराधनस्थानात् प्रादक्षिण्‍येन निक्षिपेत् । पूर्वादीशानपर्यन्तं मन्त्री भूतबलिं तदा ॥ १४४ ॥ विष्वक्सेनार्चनमाह—अथेति । शिष्टैः कारिप्रदानावशिष्टैरित्यर्थः, नैवेद्यैर्मधुपर्काद्यैर्मुख्यमूर्तेर्निवेदितैः ॥ द्विजप्राशनशिष्टैस्तु स्वयं प्राशनवर्जितैः। (२०।१३-१४)

३. तृतीय भाग (परिच्छेद १४-१९): मन्दिर-प्रतिष्ठा, विग्रह-लक्षण एवं पूजा-पद्धति

३७२ सात्वतसंहिता इति पौष्करे विष्वक्सेनार्चनप्रकरणे व्यक्तोक्तेः ॥ १४२-१४३ ॥ ततः कुमुदादिभूतेभ्यो बलिदानमाह-चरुरूपेणेति सार्धेन ॥ १४३-१४४ ॥ जिन अर्ध्यादिकों से विष्वक्सेन की पूजा की गई हो उन अर्घ्य सहित चरु रूप अन्नों को पूजा स्थान से बाहर दक्षिण दिशा की ओर सोदक हृद (तालाब या वापी) आदि में प्रक्षिप्त कर देवे । फिर मन्त्रज्ञ साधक पूर्व दिशा से आरम्भ कर ईशान पर्यन्त भूतबलि देवे ॥ १४३-१४४ ॥ ततो विसर्जनं कुर्यादुपसंहृत्य चाखिलम् । विनिक्षिप्याम्भसो मध्ये पत्रपुष्पफलादि यत् ॥ १४५ ॥ निष्कामः पावनार्थं तु स्तोकमुद्धृत्य वै पुरा । सन्ध्याय मन्त्रपूर्वं प्राक् तमश्नीयाच्च मौनवान् ॥ १४६ ॥ विसर्जनमाह—तत इत्यर्धेन । विसर्जनमत्र विष्वक्सेनस्येति बोध्यम् । भगवद्वि- सर्जनं तु विष्वक्सेनार्चनात् पूर्वमेव कार्यम्, तच्च—"क्षमापयेत् ततो देवं यत्र यत्राव- तारितम्" (१७।१४२) इत्यनेनैव सूचितं भवति । यता मण्डलेऽग्नौ च भगवद्विसर्ज- नानन्तरं तस्मिन्नेव स्थाने विष्वक्सेनः पूजनीय इति जयाख्यपञ्चदशपटले (१५।२४२- २५०) विस्तरेण एताद्विधानमुक्तम्, अत्रापेक्षितं च । उपसंहृत्य चाखिलं परिवार- देवतासमूहं च विसृज्येत्यर्थः । विष्वक्सेनार्चनानन्तरं पत्रपुष्पफलान्नादीनां जलमध्ये प्रक्षेपम्, स्वप्राशनार्थं किञ्चिदंशस्य तत्पूर्वमेव प्रत्येकं स्थापनम्, तदर्चनानन्तरं प्राशनं चाह—विनिक्षिप्येति सार्धेन । अत्र निष्काम इत्यनेन सकामस्य विष्वक्सेनार्चनानन्तरं प्रत्येकमुद्धृतस्यापि प्राशनं वर्ज्यमिति ज्ञायते । तथा च पञ्चरात्ररक्षायामागमप्रामाण्यवचनम्— यतो भगवदर्थेन त्यक्तं स्रक्चन्दनादिकम् । पश्चादभोग्यतां याति विष्वक्सेनपरिग्रहात् ॥ अत एव निवेद्यादि ततः प्रागेव सात्वतैः । सेव्यते तेन तत् तेषामुत्कर्षस्यैव कारणम् ॥ (पृ० ८२-८३) इति ॥ १४५-१४६ ॥ इसके अखिलकर्म का उपसंहार करके विष्वक्सेन का भी विसर्जन करे । फिर सम्पूर्ण पत्र पुष्पादि फलों को एकत्र कर जल के मध्य में फेंक देवे । विष्वक्सेन की पूजा के पहले अपने को पवित्र करने के लिये कामनारहित हो नैवेद्य का कुछ अंश अपने लिये निकाल कर रख लेवे । विष्वक्सेन के पूजन के पहले उसे मौन हो कर भोजन करे लेवे क्योंकि विष्वक्सेन की पूजा के बाद अलग कर रखे गये भी नैवेद्य का भोजन वर्जित है ॥ १४५-१४६ ॥ भोजनान्ते ततः कुर्यात् सम्प्राप्ते तु निशामुखे । मन्त्रजापं ततो ध्यानं तोयतर्पणपूर्वकम् ॥ १४७ ॥

सप्तदशः परिच्छेदः ३७३ तथैव रात्रिशेषं तु कालं सूर्योदयावधि । कर्तव्यं सजपं ध्यानं नित्यमाराधकेन तु ॥ १४८ ॥ अथ भोजनानन्तरमा सायं सद्ध्यानमन्त्रजपं सायंकाले जलमध्ये स्वमन्त्रार्चनतर्पणं तदारभ्य सूर्योदयावधि च सध्यानजपमाह—भोजनान्त इति द्वाभ्याम् ॥ १४७-१४८ ॥ भोजन के अनन्तर सायङ्काल के समय जल से तर्पण कर मन्त्रजाप करे । फिर ध्यान करे । आराधक को रात्रिकाल के शेष काल से सूर्योदय पर्यन्त निरन्तर जप और ध्यान में व्यतीत करना चाहिये ॥ १४७-१४८ ॥ एवमेव विधानेन पूजयित्वा दिने दिने । जपेलक्षाष्टकं मन्त्री ततः सिद्ध्यति मन्त्रराट् ॥ १४९ ॥ ददाति मनसोऽभीष्टा सिद्धिः सर्वानुरूपकाः । रुद्रादित्येन्द्रऋषिभ्यो भक्तेभ्यश्च मयोदितम् ॥ १५० ॥ एवं प्रत्यहं भगवदर्चनपूर्वकं शिष्यैर्लक्षाष्टसंख्याके जपे कृते मन्त्रसिद्धिर्भवति, ततः स्वेष्टसिद्धिश्च भवतीत्याह—एवमेवेति सार्धेन ॥ १४९-१५० ॥ इस प्रकार दिन-प्रतिदिन पूजा कर मन्त्रज्ञ साधक आठ लाख की संख्या में जप करे । तब मन्त्रराज सिद्ध हो जाते हैं । सिद्ध हो जाने पर ये मन्त्रराज सर्वानुरूप मानसिक सिद्धियाँ प्रदान करते हैं ॥ १४९-१५० ॥ इसके अतिरिक्त जो बात यहाँ नहीं कही गई है उसे रुद्रादित्यादि के लिये एवं ऋषियों के लिये और भक्तों के लिये अन्यत्र कहा गया है । उसे वहाँ से ज्ञात कर कर्म करना चाहिए ॥ १५० ॥ लोकचित्तानुसारेण शास्त्रं वै युगभेदतः । यागो यागोपकरणं विमलं प्रतिपादकम् ॥ १५१ ॥ ज्ञातव्यं तत् त्वया सम्यगविरोधेन सर्वदा । आगमेभ्योऽथ तज्ज्ञेभ्यः सकाशादात्मसिद्धये ॥ १५२ ॥ अनुक्तमन्यतो ग्राह्यमित्याह—रुद्रादित्येत्यादिभिः । अविरोधेन स्वोक्तार्था- विरोधेनेत्यर्थः ॥ १५०-१५२ ॥ उन स्थानों पर युगभेद से लोकचित्तानुसार वहाँ याग एवं यागोपकरण का स्पष्ट रूप से प्रतिपादन किया गया है ॥ १५१ ॥ हे सङ्कर्षण ! वे सभी बातें अपनी कही हुई बातों के अनुसार ही यहाँ कही गई हैं—किसी बात में कहीं कोई विरोध नहीं है, ऐसा समझना चाहिये । यहाँ आत्मसिद्धि के लिये आगमशास्त्र के अनुसार जो नृसिंहानुष्ठान के पूर्ण ज्ञाता हैं उनसे जान कर सभी बातें कही गई हैं ॥ १५२ ॥

३७४ सात्वतसंहिता अथोक्तमिह संक्षेपाद् वदेदन्यत्र विस्तरात् । अथ संसाधितं मन्त्रं ब्रह्मचर्यादिसंयमैः ॥ १५३ ॥ पयोयावकशाकाम्बुघृतमूलफलाशनैः । मन्त्री यथा प्रयुञ्जीयाच्छान्तिकादिषु तच्छृणु ॥ १५४ ॥ एवं पयोयावकादिप्राशनब्रह्मचर्यनियमैः साधितस्य मन्त्रस्य शान्तिकादिषु प्रयोग- क्रमं शृण्वित्याह—अथेति द्वाभ्याम् ॥ १५३-१५४ ॥ यहाँ संक्षेप में कहा गया है । अन्यत्र विस्तार से कहा गया है । अब दूध यावकादि प्राशनपूर्वक ब्रह्मचर्यादि नियमों द्वारा साधित मन्त्र का शान्तिकादि कर्म में जिस प्रकार अनुष्ठान किया जाता है, हे सङ्कर्षण ! उसे सुनिये ॥ १५३-१५४ ॥ शान्तिविधानम् ज्ञात्वादौ स्वशरीरोत्थैर्लौकिकैरपि लक्षणैः । प्राप्तेन स्वप्नयोगेन संस्थितिं जीवितस्य च ॥ १५५ ॥ ततः शल्यविनिर्मुक्तं स्थानमासाद्य शोभनम् । संच्छन्नं शरजालेन साम्बरेणाथवा गृहम् ॥ १५६ ॥ तत्र मण्डलमालिख्य सर्वोपकरणान्वितम् । चन्दनक्षोदयुक्तेन शशिना सहितेन च ॥ १५७ ॥ सुगन्धशालिचूर्णेन प्रागुदीरितलक्षणम् । निर्व्रणं लक्षणाढ्यं च पूरितं गालिताम्भसा ॥ १५८ ॥ हेमरत्नौषधीवृक्षशाखादूर्वाफलोदरम् । धूपिताहतशुष्केण वाससा परिवेष्टितम् ॥ १५९ ॥ सुसमाधारसंस्थं च बाह्यतो मण्डलस्य च । विन्यसेत् समसूत्रेण दिग्विदिक़्कलशाष्टकम् ॥ १६० ॥ सुधाचन्दनलिप्ताङ्गं लाजतण्डुलपूरितम् । श्वेतपट्टगलोपेतं सितपुष्पस्रगान्वितम् ॥ १६१ ॥ मुक्तफलोदरं चैव बीजमल्लकभूषितम् । उपकुम्भाष्टकं त्वेवं कुम्भानामुपरि न्यसेत् ॥ १६२ ॥ श्वेतचामरसंयुक्तं सितमूर्ध्ववितानकम् । बद्ध्वा सितेन सूत्रेण सप्तधा कलशाष्टकम् ॥ १६३ ॥ संवेष्ट्य कण्ठदेशान्तं त्वच्छिन्नेन दृढेन च । कृत्वैवं च ततः स्नायात् कुर्यान्न्यासादिकं ततः ॥ १६४ ॥ निशाम्बुना चन्दनेन श्वेतदूर्वाङ्कुरेण च ।

सुश्लक्ष्णभूर्जपत्रे तु नाम सान्तर्गतं लिखेत्॥ १६५ ॥ अरान्तोपगतेनैव कुर्याद् बीजेन संयुतम्। कमलं तद्बहिर्लेख्यमष्टपत्रं सकर्णिकम् ॥ १६६ ॥ नाभितुर्यमधोवक्त्रं वर्णपत्राष्टकं लिखेत्। तदन्तस्तच्चतुर्थान्तं मन्त्रेशं च लिखेत् परम् ॥ १६७ ॥ नतिप्रणवगर्भं तु ततः कमलबाह्यगम्। विलिख्य नेमिनवमं द्विधोध्र्वाधोमुखं तु वै ॥ १६८ ॥ संवेष्ट्य सितसूत्रेण अर्घ्यकुम्भे निवेशयेत्। आधारे शालिचूर्णीये मण्डलाग्रे निधाय तम्॥ १६९ ॥ आवाह्य मण्डले मन्त्रं प्राग्वद् हृदयकोटरात्। ततः श्वेतोपचारेण तत्र मन्त्रेश्वरं यजेत् ॥ १७० ॥ पूर्णेन्दुमण्डलान्तस्थमुद्गिरन्तं सुधारसम्। शशाङ्कशतसङ्काशं ध्यात्वा सपरिवारकम् ॥ १७१ ॥ यच्छ यच्छ महाशान्तिं पूजान्ते समुदीरयेत्। ततः शशाङ्कदिग्भागे कुण्डे पूर्णेन्दुलक्षणे ॥ १७२ ॥ क्षीरतण्डुलमध्वाज्यैर्गुग्गुलेन तिलेन च। सचन्दनेन होमं तु सप्तरात्रं समाचरेत् ॥ १७३ ॥ पयोभुक् परमेशं च प्रहराष्टकमर्चयेत्। होमान्ते कलशस्थस्य पयसा शीतलेन तु ॥ १७४ ॥ सेचनं चाम्भसा कुर्यात् प्रत्यहं प्रहराष्टकम्। स्नानान्ते ब्रह्मरन्ध्रोर्ध्वं संस्मरेन्मन्त्रनायकम् ॥ १७५ ॥ स्रवन्तममृतं त्वेवं शान्तिर्भवति शाश्वती। अथवाऽऽदाय मृत्पात्रं वैदलं वाऽथ काष्ठजम् ॥ १७६ ॥ तत्र पङ्कजवत् कुर्याद् रचनामोदनेन च। पिष्टनिर्मितपात्राणां सम्प्रज्वाल्य घृतेन तु ॥ १७७ ॥ दीपाष्टकं ततः पूजां कुर्यात् पूजादिकैर्बलैः। स्विन्नानि सप्तबीजानि विकीर्य च तदूर्ध्वतः॥ १७८ ॥ ततोऽर्चिते तोयकुम्भे धूपपात्रं तु विन्यसेत्। अच्छिन्नधूपप्रसरं त्रैकाल्यं च बलिं हरेत् ॥ १७९ ॥ शान्त्यर्थं देशपालानां भूतानामेवमेव हि। पृष्ठे चोदकधारां वै अच्छिन्नां पदसप्तकम् ॥ १८० ॥

शान्तये बलिमन्त्राणामस्त्रमन्त्रेण पातयेत् । इति शान्तिविधानं च पौष्टिकं च निबोधतु ॥ १८१ ॥ पूर्वं शान्तिविधिमाह—ज्ञात्वेत्यारभ्य इति शान्तिविधानं चेत्यन्तम् । शशिना = कर्पूरेण । नाम = साध्यनामधेयमित्यर्थः । साध्यनामधेयप्रकारः पारमेश्वरे प्रतिपादितः— साध्यनामस्वरूपं तु व्यापकं वक्ष्यते पुनः ॥ तारान्ते बीजशक्तिश्च देवतं तस्य चेत् ततः । शान्तिं पुष्टिं च वश्यं च विजयं चैवमादिकम् ॥ द्वितीयान्तं समुच्चार्य कुरुवीप्सान्वितं ततः । यच्छ-यच्छ-पदान्तं वा प्राक्स्थितैः प्रणवान्तिमैः ॥ अङ्गयैदवसाने च साध्यलक्षणमीरितम् ॥ —(२४।११६-११९) इति । सान्तर्गतं = सकारान्तर्गतमित्यर्थः । अरान्तोपगतेन बीजेन, अमुस्वारेणेत्यर्थः । नाभितुर्यं वकारम्, तच्चतुर्थान्तं नाभिचतुर्थान्तम्, वकारान्तमिति यावत् । मन्त्रेशं श्रीनृसिंहबीजम् । नेमिनवमं = टकारमित्यर्थः । तथा च प्रयोगः—आदौ स्वशरीरोत्थैर्लौकिकैर्लक्षणैः प्राप्तेन स्वप्नयोगेन च जीवितस्य संस्थितिं ज्ञात्वा सर्वशल्यविनिर्मुक्तं शोभनं स्थानमासाद्य केवले(न) शरजालेन सवस्त्रेण वा समाच्छादितं यागगेहं परिकल्प्य तत्र मध्ये वेदिकायां चन्दनचूर्णमिश्रेण कर्पूरसहितेन सुगन्धशालिचूर्णेन— चतुरश्रं चतुर्द्वारं मार्गपीठाब्जभूषितम् ॥ त्रिनाभिनेमिषडरं चक्रं तु कमलाद् बहिः । (१७।४९-५०) इत्युक्तलक्ष(ण णं) मण्डलमालिख्य नि(पु र्वणं) सलक्षणं गालितोद(कं क)- पूर्णं हेमरत्नसर्वौषधिपल्लवदूर्वाफलपूरितं सुधूपिताहतशुक्लवस्त्रपरिवेष्टितं महाकु(म्भ म्भं) मण्डलस्य बहिः पूर्वभागे आधारचक्रिकोपरि संस्थाप्य तत्परितोऽष्टदिक्ष्वपि तथाविधं कलशाष्टकं विन्यस्य सुधान्चन्दनलिप्ताङ्गं तण्डुलपूरितं शुक्लकौशेय परिवेष्टितकण्ठं शुक्लपुष्पमालिकाअलङ्कृतं मुक्ताफलोदरं बीजपूरितशरावपिहितमुप- कुम्भाष्ट (क कं) दिक्कलशानामुपरि विन्यस्य यागगेहं श्वेतचामरसंयुक्तसितदुकूल- वितानकैरलङ्कृत्याच्छिद्रेण दृढेन सितेन सूत्रेण कलशाष्टकं कण्ठदेशान्तं सप्तवारं परितः संवेष्टयेत् । एवं सर्वोपकरणानि सम्पाद्य यथाविधि स्नात्वा मन्त्रन्या, सादिकं कृत्वा हरिद्रोदकविमिश्रितेन चन्दनेन दूर्वाङ्कुरेण लेखिन्या सुलक्षणे भूर्जपत्रमध्ये सकारान्तर्गतं साध्यनाम विलिख्य, तद्बहिः सकर्णिकमष्टपत्रं कमलं विलिख्य पत्राष्टकेऽधोवक्त्रं वकारं विलिख्य तदन्तः प्रणवनमःसम्पुटितं वकारान्वितं नृसिंहबीजं विलिख्य कमलाद् बहिरूर्ध्वमुखमधोमुखं च संख्याहीनं टङ्कारमूर्मिकारूपेण परितः संलिख्य तद्यन्त्रं सितसूत्रेण संवेष्ट्यार्घ्यकुम्भे निधाय मण्डलाग्रे शालिचूर्णपरिकल्पिते स्थण्डिले तं कुम्भं निधाय, मण्डले स्वहृदयान्मन्त्रनाथमावाह्य, तत्र श्वेतैरुपचारैरभ्यर्च्य,

सप्तदशः परिच्छेदः ३७७ पूर्णेन्दुमण्डलान्तस्थं सुधारसमुद्गिरन्तं शशाङ्कशसंकाशं सपरिवारं मन्त्रनाथं ध्यात्वा, पूजान्ते महाशान्तिं यच्छ यच्छेति प्रार्थयेत् । तत उत्तरदिग्भागे पूर्णेन्दुसदृशे वृत्तकुण्डे क्षीरतण्डुलमघुघृतगुग्गुलतिलचन्दनैः सप्तभिर्द्रव्यैः सप्तरात्रं होममाचरन् केवलपयः- प्राशनं कुर्वन्, परमेशं मन्त्रनाथं प्रत्यहं प्रहराष्टकेऽप्यर्चयन्, होमान्ते कलशस्थस्य भगवतः पयसा शीतलोदकेन च प्रहराष्टकेऽपि सेचनं कुर्वन्, प्रत्यहं स्नानान्ते साधकस्य ब्रह्मारन्ध्रोपर्यमृतं स्रवन्तं मन्त्रनाथं स्मरेत् । अनेन शान्तिर्भवति । अथवा मृण्मयं वैदलं काष्ठजं वा पात्रमादाय तत्र केवलान्नेनाष्टपत्रं कमलं विरचय्य तद्दलाष्टके पिष्टनिर्मितघृतपूरितप्रज्वालितदीपाष्टकं विन्यस्य पुष्पादि- भिरभ्यर्च्य स्विन्नानि सप्तविधबीजानि तदुपरि विकीर्यैकं तोयकुम्भमभ्यर्च्य तदुपरि धूपपात्रं निधायाच्छिन्नधूपप्रसरं यथा तथा कालत्रयेऽपि देशपालानां भूतानां बलिं हरेत् । बलिधर्तॄणां पृष्ठे सप्तपदावधि शान्त्यर्थमच्छिन्ना करकोदकधारामस्त्रमन्त्रेण सेचयेत् ॥ १५५-१८१ ॥ इति शान्तिविधिः ॥ अब सबसे पहले शान्तिविधि कहते हैं—साधक अपने शरीर में होने वाले लौकिक लक्षणों से, अथवा स्वप्नयोग के लक्षणों से, जीवन की स्थिति का ज्ञान कर किसी उपद्रवरहित शोभन स्थान में जाकर केवल शरपत से आच्छादित किसी स्थान में, अथवा वस्त्र से आच्छादित किसी स्थान में जाकर, वहाँ यागगृह का निर्माण करे । उसके मध्य में वेदी निर्माण कर, उस वेदी पर चन्दनचूर्ण, कर्पूर तथा सुगन्धि शालिचूर्ण को एक में मिश्रित कर, पहले जैसा कहा गया है वैसा, उत्तमोत्तम लक्षण युक्त मण्डल निर्माण करे । फिर उस मण्डल के बाहर पूर्वभाग में सुलक्षण कलश जो वस्त्र से छाने गये जल से पूर्ण हो, हेमरत्न, सर्वौषधि एवं पञ्चपल्लव और दूर्वाफल से पूर्ण हो और सुधूपित नवीन शुक्ल वस्त्र से परिवेष्टित हो ऐसे कलश को आधार चक्र के ऊपर स्थापित करे । उसके आठों दिशाओं में वैसा ही सुलक्षण आठ कलश स्थापित करे । उसे चन्दन तथा चूने से अनुलिप्त करे । तण्डुल (= चावल) से परिपूर्ण करे । शुक्ल रेशमी वस्त्र से तथा शुक्ल माला से उसका कण्ठ परिवेष्टित करे । उन कलशों के ऊपर मोती, चावल एवं बीज पूर्ण शराव (पुरवा) स्थापित करे । इस प्रकार आठो दिशाओं के कलशों पर उपकुम्भाष्टक स्थापित कर याग गेह को भी श्वेत चामर संयुक्त एवं श्वेत वस्त्र निर्मित दुकूल वितान से अलङ्कृत करे तथा उसे आच्छन्न कर, दृढ़ श्वेत सूत्र से उस कलशाष्टक के कण्ठ प्रदेश को सात बार चारों ओर से लपेट देवे ॥ १५५-१६४ ॥ तदनन्तर यज्ञ की समस्त सामग्री एकत्रित कर यथाविधि स्नान करे । फिर मन्त्रन्यास कर, हरिद्रा मिश्रित चन्दन से, दूर्वाङ्कुर की लेखनी से, अत्यन्त चिकने भोजपत्र पर, सकारान्त साध्य नाम लिखकर, उसके बाहर कर्णिका सहित अष्टपत्र कमल लिखे । उसके आठो पत्रों पर अधोमुख वकार लिखकर, उसके भीतर प्रणव एवं नमः सम्पुटित वकारान्वित नृसिंह बीज लिखकर, कमल के बाहर ऊर्ध्वमुख एवं अधोमुख संख्या रहित टकार का ऊर्मिका रूप से चारों ओर लिखकर उस सा० सं० - 28

३७८ सात्वतसंहिता यन्त्र को सफेद सूत्र से वेष्टित करे। उसे अर्घ्य वाले कुम्भ पर रखकर मण्डल के अग्रभाग में शालि के चूर्ण से निर्मित स्थण्डिल (वेदी) पर स्थापित करे। मण्डल पर अपने हृदय से मन्त्रनाथ का आवाहन कर, श्वेत उपचारों से उसकी पूजा कर, पूर्णेन्दुमण्डल में स्थित सुधा समुद्र का उद्‌गिररण करते हुए सैकड़ों चन्द्रमा के प्रकाश के समान सपरिवार मन्त्रनाथ का ध्यान करे। फिर पूजा करे और पूजा के अन्त में 'महाशान्तिं यच्छ यच्छ' ऐसी प्रार्थना करे। फिर उसके उत्तर दिग्भाग में पूर्णमासी के चन्द्रमा के समान निर्मित वृत्तकुण्ड में दूध, चावल, मधु, घृत, गुग्गुल, तिल और चन्दन इन सात पदार्थों से सात रात तक होम करे। केवल दूध पीकर रहे। परमेश्वर मन्त्रनाथ का प्रतिदिन आठों प्रहर अर्चन करे। होम के अन्त में प्रतिदिन कलश स्थित भगवान् को शीतलोदक से आठों प्रहर सेचन करे। प्रतिदिन स्नान के बाद साधक के ऊपर ब्रह्मरन्ध्र से अमृत की वर्षा करते हुए मन्त्र नाथ का स्मरण करे इस विधि से शान्ति हो जायेगी ॥ १५५-१७५ ॥ अब शान्ति का दूसरा विधान कहते हैं—मिट्टी का, अथवा पत्ते का, अथवा काष्ठ का पात्र लेकर केवल अन्न से अष्टपत्र कमल का निर्माण करे। उस अष्टपत्र पर पिष्ट निर्मित घृत पूर्ण प्रज्ज्वलित आठ दीपक स्थापित करे। फिर पुष्पादि से उसकी पूजा कर आर्द्र सप्तविध बीज उसके ऊपर विकीर्ण (फैलावे) करे। फिर एक जलपूर्ण कलश की पूजा कर उसके ऊपर धूप पात्र स्थापित कर अविच्छिन्न रूप से उस पर धूप जलाते रहे। इस प्रकार तीनों कालों तक देश के पालक भूतों को बलि देवे। बलि देने वाले के पीठ को सात पद पर्यन्त शान्ति के लिये अविच्छिन्न रूप से करकोदक (करवा के जल की) धारा द्वारा अस्त्र मन्त्रों के साथ बलि मन्त्रों से सींचते रहे ॥ १७६-१८१ ॥ पौष्टिकविधानम् कुङ्कुमक्षोदमिश्रेण कुसुम्भरजसा तु वै। पूर्ववन्मण्डलं कुर्याद् रक्तचन्दनभूषितम् ॥ १८२ ॥ नीवारतण्डुलैर्नैव ताम्रवर्णैस्तिलैः शुभैः। सम्पूर्य बदरोपेतैरुपकुम्भाष्टकं हि यत् ॥ १८३ ॥ सोपकुम्भानि कुम्भानि रक्तसूत्रेण वेष्ट्य च। शेषं यद्विहितं चात्र तत्तद् रक्तं प्रकल्पयेत् ॥ १८४ ॥ ततः स्नातः कृतन्यासो नाम रोचनया लिखेत्। अलक्ताम्बुयुक्तेन सान्द्रदर्भाङ्कुरेण तु ॥ १८५ ॥ पूर्ववत् पद्मगर्भस्थं ततः पत्रेष्वधोमुखम्। बीजं नियोजयेत् तन्मे गदतश्चावधारय ॥ १८६ ॥ नेभैरेकोनविंशाख्यवर्णस्याधोगतं न्यसेत्।

सप्तदशः परिच्छेदः ३७९ बीजं नाभितृतीयं यत् तदधः पञ्चमारगम् ॥ १८७ ॥ शिरसाऽरान्तपूर्वेण युक्तं बाह्याद् दशादिना । तदन्तस्थं न्यसेद् बीजं नाभितुर्यासनस्थितम् ॥ १८८ ॥ नाभिसप्तमगर्भेऽथ विन्यसेत् कमलं तु तत् । बीजं पुष्टिपदोपेतं कुरुवीप्सासमन्वितम् ॥ १८९ ॥ लिखेत् प्रणवपूर्वं तु बहिरष्टासु दिक्षु वै । संवेष्ट्य रक्तसूत्रेण मधुतोयघटे न्यसेत् ॥ १९० ॥ निधाय पूर्ववत् कुर्याद् दिग्बन्धं हृदयादिकैः । अस्त्रेण तु विदिग्बन्धं नेत्रेणोर्ध्वमधस्तथा ॥ १९१ ॥ ततो विद्रुमसंकाशं मन्त्रमावाह्य संयजेत् । अथो मन्त्रगणं सर्वं लोके शास्त्रान्तसंयुतम् ॥ १९२ ॥ रक्तैरकण्टकैर्हृद्यैरर्चनं कुसुमैर्हितम् । राजमुद्गैस्तु नैवेद्यं युक्तमत्र गुलोदनम् ॥ १९३ ॥ गुलरञ्जितभक्ष्याणि कुर्यान्नानाविधानि वै । सम्भवे सति वै रक्तं सर्वं कार्यमसम्भवे ॥ १९४ ॥ रञ्जयेत् कुङ्कुमाद्येन केनचिद् रक्तधातुना । सर्वं जपावसानं तु कृत्वा होमं समाचरेत् ॥ १९५ ॥ घृतैस्तिलैस्तु पूर्वोक्तैः शर्कराबदरान्वितैः । दत्त्वा पूर्णाहुतिं कुर्यात् सेचनं शर्कराम्भसा ॥ १९६ ॥ पूर्ववन्मन्त्रनाथस्य साध्यगर्भीकृतस्य च । ततः पूर्वोक्तविधिना बलिकर्म समाचरेत् ॥ १९७ ॥ सप्तरात्रं त्रिरात्रं वा पुष्टिरुत्पद्यते महत् । प्रभावान्मन्त्रराज्यस्य विधिनानेन सर्वदा ॥ १९८ ॥ अथ पौष्टिकविधिमाह—पौष्टिकं च निबोधतु इत्यारभ्य विधिनानेन सर्वदे- त्यन्तम् । नाम = साध्यनामधेयम् । पूर्ववत् पद्मगर्भस्थं लिखेत्, कर्णिकामध्ये लिखे- दित्यर्थः । नेमेरेकोनविंशाख्यवर्णस्य बकारस्य नाभितृतीयं बीजं लकारं पञ्चमारगम् उकारमरान्तपूर्वेणानुस्वारेण बाह्याद् दशादिना टकारेणेत्यर्थः । नाभितुर्यासनस्थितं पूर्ववद् वकारस्योपरि स्थितं बीजं नृसिंहबीजं तदन्तस्थं न्यसेत्, कर्णिकामध्ये विलिखेदित्यर्थः । नाभिसप्तमगर्भे = सकारगर्भे इत्यर्थः । बीजं = नृसिंहबीजम् । पुष्टिपदोपेतं कुरुवीप्सासमन्वितं 'पुष्टिं कुरु कुरु' इत्यनेनान्वितमित्यर्थः । तथा च प्रयोगः—कुङ्कुमक्षोदमिश्रेण कुसुम्भरजसा पूर्ववन्मण्डलमालिख्य रक्त- चन्द्रकभूषितं कृत्वां कुम्भस्थापनादिकं सर्वं पूर्ववत् कृत्वोपकुम्भाष्टकं तु नीवारतण्डुलै-