भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 421

३६२ सात्वतसंहिता इस प्रकार मन्त्र देवों का ध्यान कर पुष्पादि से उनका पूजन करे । स्नान विलेपन, वस्त्र, माला, धूप, दीप, दही, मधु मिश्रित क्षीर एवं घृत से हृदय को बल देने वाले, मीठे, स्थिर एवं बुद्धिवर्धक विविध कल्याणकारी नैवेद्य और यथाकाल उत्पन्न होने वाले षड्रस संयुक्त फल, मूल आदि से पूजित देव का ध्यान करे । मुद्रा मन्त्र द्वारा दोषों से मुक्त हो जावे और प्रकट मूर्ति के समान ध्यान करे । भीगे हुए बीजों से अथवा होमादि द्रव्यों से होम करे ॥ ९३-९६ ॥ ततः स्वहस्तौ संस्कृत्य अम्भसाऽऽलम्भनादिना । बद्ध्वा प्रदर्शयेन्मुद्रां त्रिशिखां सम्मुखे विभोः ॥ ९७ ॥ ध्यात्वा त्रेताग्निरूपं तु दक्षिणाङ्गुलित्रयम् । स्पृष्टमूर्ध्वशिखं सैव ज्येष्ठाक्रान्ता कनीयसी ॥ ९८ ॥ अथोऽखिलस्वरूपश्च ध्वान्तातीतोऽग्निरूपधृक् । देवो गुणत्रयातीतस्तथा मार्गत्रयातिगः ॥ ९९ ॥ धर्मैः स्थूलतरैर्मुक्तो योऽयं व्यक्तो धियार्चितः । मूलमुद्रादर्शनमाह—तत इति सार्द्धैस्त्रिभिः । अम्भसा = अर्घ्यजलेनेत्यर्थः । "मुद्राबन्धे कराभ्युक्षाम्" इत्यर्घ्यविनियोगस्य वक्ष्यमाणत्वात् । आलम्भनादिना चन्दनादिनेत्यर्थः । आदिशब्देन कर्पूरकुङ्कुमादिकं गृह्यते । दक्षिणहस्तेऽङ्गुष्ठेन कनिष्ठिकामाक्रम्य तर्जन्याद्यङ्गुलित्रयमृज्वीकृत्य भगवदभिमुखं दर्शयेदिति फलितोऽर्थः ॥ ९७-१०० ॥ अब मूल मुद्रा प्रदर्शन की विधि कहते हैं—फिर जल स्पर्शादि से हाथ प्रक्षालन कर, हाथ शुद्ध कर, दोनों हाथ जोड़कर भगवान् के सामने त्रिशिखा मुद्रा प्रदर्शित करे ॥ ९७ ॥ अब त्रिशिख मुद्रा का स्वरूप कहते हैं—त्रेताग्नि के स्वरूप का ध्यान करे फिर दाहिने हाथ के अंगूठे से कनिष्ठा को दबा देवे । तदनन्तर शेष तर्जनी आदि तीन अङ्गुलियों को सीधी खड़ी कर देवे । फिर इस मुद्रा को भगवान् के सामने प्रदर्शित करे तो वही मुद्रा त्रेताग्नि स्वरूप कही जाती है यही फलितार्थ है ॥९८॥ यही देव सर्वस्वरूप हैं, अज्ञान रूप अन्धकार से सर्वथा परे हैं, अग्नि स्वरूप हैं, किं बहुना, यही देव तीनों गुणों से परे हैं तथा मार्गत्रयातीत भी हैं । यही स्थूलतर धर्मों से तो मुक्त हैं, किन्तु मानसिक पूजा से अर्चित होने पर अभिव्यक्त होते हैं ॥ ९९-१०० ॥ हृन्मुद्राकथनम् सम्पुटं हृदयोद्देशे बद्ध्वा हस्तद्वयेन तु ॥ १०० ॥ निरन्तराभ्यां शाखाभ्यां मुद्रैषा हार्दिकी स्मृता ।