भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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सप्तदशः परिच्छेदः ३६३ हृन्मन्त्रमुद्रामाह—सम्पुटमिति। हार्दिकी हृदयसम्बन्धिनीत्यर्थः॥ १००-१०१॥ अब हृन्मुद्रा कहते हैं—दोनों हाथों से सम्पुट बाँधकर हृदय प्रदेश पर स्थापित करे, दोनों हाथो की अङ्गुलियों में अन्तर न रहे तब यह हृदय सम्बन्धिनी मुद्रा कही जाती है ॥ १००-१०१ ॥ शिरोमन्त्रादिमुद्रापञ्चककथनम् अङ्गुष्ठादिकनिष्ठान्तं शाखायुग्मं पृथक् पृथक् ॥ १०१ ॥ सान्तरं सम्पुटादस्मात् कनिष्ठादौ तथा भवेत् । शिरश्शिखातनुत्रास्त्रनेत्रमुद्रा यथाक्रमम् ॥ १०२ ॥ शिरोमन्त्रादिमुद्रापञ्चकमाह—अङ्गुष्ठादीति सार्धेन । पूर्ववत् करद्वयेन सम्पुटं कृत्वाऽङ्गुष्ठयुग्मं तर्जनीयुग्मं मध्यमायुग्ममनामिकायुग्मं कनिष्ठिकायुग्मं च सान्तरालं यथा तथा पृथक् पृथक् विभज्य कनिष्ठाद्यङ्गुष्ठान्तमङ्गुलियुग्मपञ्चके क्रमेण शिरः- शिखाकवचास्त्रनेत्रमुद्रा इति विज्ञेयाः ॥ १०१-१०२ ॥ अब शिरोमन्त्रादिमुद्रा पञ्चक कहते हैं—दोनों हाथों से सम्पुट बनाकर दोनों अंगूठो, दोनों तर्जनी, दोनों मध्यमा, दोनों अनामिका, दोनों कनिष्ठा के बीच-बीच में थोड़ा अन्तर रख कर अलग-अलग प्रविभक्त करे । इस प्रकार कनिष्ठा युग्म से अङ्गुष्ठ युग्म पर्यन्त पाँचों अङ्गुलियों को क्रमशः शिरोमुद्रा, शिखामुद्रा, कवचमुद्रा, अस्त्रमुद्रा तथा नेत्रमुद्रा कहा जाता है ॥ १०१-१०२ ॥ श्रियादिशक्तिमुद्राचतुष्टय कथनम् अस्यामङ्गुष्ठयुग्मं तु मुद्रायां करमध्यगम् । प्रदेशिन्यां ततो विद्धि कनिष्ठान्तं श्रियादिषु ॥ १०३ ॥ श्रियादिशक्तिमुद्रा चतुष्टयमाह—अस्यामिति । अस्यां मुद्रायां पूर्वोक्तरीत्या पृथग्विभक्ताङ्गुलिद्विकपञ्चकविशिष्टायां मुद्रायामङ्गुष्ठयुग्मं करमध्ये कर्णिका- रूपेण संस्थाप्य तर्जन्यादिद्विकचतुष्टये क्रमेण लक्ष्मीपुष्टिसरस्वतीनिद्रामुद्राचतुष्टयं बोध्यम् ॥ १०३ ॥ अब श्रियादि शक्ति मुद्रा चतुष्टय का प्रकार कहते हैं—इस पूर्वोक्त मुद्रा में पृथग्विभक्त पाँचों युग्म अङ्गुलि विशिष्ट मुद्रा में, अङ्गुष्ठ युग्म को हाथ के मध्य में कर्णिका रूप से स्थापित कर देवे तो शेष तर्जनादि द्विक चतुष्टय को क्रमशः लक्ष्मीमुद्रा, पुष्टिमुद्रा, सरस्वतीमुद्रा और निद्रामुद्रा नामक चार मुद्रायें हो जाती हैं, ऐसा समझना चाहिये ॥ १०३ ॥ स्वमन्त्रयुक्ता चान्येषामर्चितानां यथाक्रमम् । पुनः पुनः प्रयोक्तव्या हार्दयं शिरसा सह ॥ १०४ ॥ अन्येषां हृन्मुद्रैव शिरोमुद्रया सह तत्तन्मन्त्रेण प्रयोक्तव्येत्याह—स्वमन्त्रयुक्तेति ।