भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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३६६ सात्वतसंहिता प्लावयेदमृतेनैव नेत्रमन्त्रेण नारद ॥ पूरकेणोपहृत्याथ स्वात्मन्युपशमं नयेत् । —(१५।६०-६२) इति जयाख्योक्तास्ताडनादिसंस्कारा ग्राह्याः । संगृहीताश्चैवमीश्वरतन्त्रेऽपि । समिद्भिः = पूर्वोक्तसप्तसमिद्भिरित्यर्थः । मन्त्रमण्डलं = मूलमन्त्रादिमन्त्रसमूह- मित्यर्थः । होमसंख्यां निवेद्य, मण्डलस्थाय भगवत इति शेषः ॥ १०९-११५ ॥ फिर आज्ञा लेने के पश्चात् एकादश परिच्छेद में कही गई विधि के अनुसार सुलक्षण कुण्ड निर्माण करे, षष्ठ परिच्छेद में कही गई विधि के अनुसार उप- लेपनादि विधि से कुण्ड को संस्कार से सुसंस्कृत करे ॥ १०९ ॥ अर्घ्य, पुष्पादि से कुण्ड की पूजा करे । उसमें शास्त्रीय विधि के अनुसार अग्नि स्थापन करे । उसे अस्त्र मन्त्र से ताड़न द्वारा संशुद्ध कर निर्धूम तथा सुसमिद्ध बनावे ॥ ११० ॥ अर्घ्य तथा शुष्क कुसुमों से अग्नि की पूजा करे । उनका ध्यान करे । यह अग्नि परब्रह्म का षष्ठ तेज है जो सबसे विलक्षण एवं गुणों का समूह है । सभी तेजों में सामान्य तेज है । इस प्रकार नेत्र मन्त्र से अग्नि का ध्यान कर कुण्ड के मध्य में अग्नि स्थापन करे ॥ १११-११२ ॥ उस अग्नि में शुष्क इन्धन डाल कर उसे निर्धूम बनाना चाहिये । उसके मध्य में मन्त्रमण्डल का समिधाओं से अर्चन करे ॥ ११३ ॥ पुनः ध्यान करे, फिर अर्चन करे, तदनन्तर घृत सहित तिल से एक लाख की संख्या में परिवार युक्त देवाधिदेव नृसिंह को सन्तुष्ट करे । फिर होम संख्या भगवान् को निवेदन कर अच्छी प्रकार से पूर्णाहुति प्रदान करे ॥ ११४-११५ ॥ ततः शुचीन् सोपवासान् शोधितान् बद्धलोचनान् ॥ ११५ ॥ भक्तान् प्रवेशयेत् तत्र गृहीतकुसुमांस्तु वै । प्रक्षेपयेन्मण्डलान्तर्नेत्रबन्धं विमुच्य च ॥ ११६ ॥ अष्टाङ्गप्रणिपातैस्तु प्रदक्षिणयुतैस्ततः । देवश्चाग्निर्गुरुः कुम्भः पूजनीयः पुनः पुनः ॥ ११७ ॥ तत्कालं भक्तिभावेन विज्ञाता योग्यता यदा । तीव्रमान्दादिकां तेषां तदा दीक्षां समाचरेत् ॥ ११८ ॥ जुहुयाद् व्यक्तसंशुद्धौ शतमष्टाधिकं तु वै । तिलानां तद्वदाज्यस्य द्वादशार्णेन बुद्धिमान् ॥ ११९ ॥ दद्यात् पूर्णाहुतिं पश्चान्मन्त्रमर्ध्यादिनार्च्य च । ततश्चाङ्गसमूहेन प्रागुक्तपरिसंख्यया ॥ १२० ॥ कुर्याद्व्यक्तशुद्ध्यर्थं दद्यात् पूर्णाहुतिं ततः ।