सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३७० सात्वतसंहिता जिस आसन पर शङ्ख और कमल का चिह्न हो उसे वर्जित करे उस पर न बैठे। रात्रि के समय अथवा एकादशी के दिन शुद्ध उपवास करे ॥ १३१ ॥ सम्पूर्ण द्वादशी तिथियों, उत्तरायण, दक्षिणायन में तथा सङ्क्रान्ति काल में विशेष पूजा करे ॥ १३२ ॥ यदि मन्त्र सिद्ध न किया गया हो तो उस असिद्ध मन्त्र से भूत एवं ग्रह से दूषितों का तथा व्याधियों का स्वतन्त्र रूप से उत्सारण कदापि न करे ॥ १३३ ॥ स्वप्न में, अथवा प्रत्यक्ष जिसे मन्त्र द्वारा सिद्धि के लक्षण दिखाई पड़ जावे, अथवा मन्त्र से अनुभूत हो जावे यह सिद्धि का चिह्न कदापि किसी से न कहे। किन्तु गुरु से कहा जा सकता है ॥ १३४ ॥ जहाँ किसी नृसिंह का बीज स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ जावे। उसे वाक्पुष्प से अर्चन करे, प्रदक्षिणा करे और नमस्कार करे ॥ १३५ ॥ किसी के विप्रयोग का निमित्त होने पर यदि अश्रुपात हो जावे, अथवा शोक हो जावे, तब बिना स्नान किये देवाग्नि पितृ तर्पण न करे ॥ १३६ ॥ जब तक नाभिनाल का छेदन न हो तब तक सूतक का दोष नहीं लगता। अन्यत्र साङ्कर्य हो जाने पर दोष लगता है। अतः पहले जितनी क्रियायें कही गई हैं उन्हें सूतक में तथा अन्य प्रत्यवायों में न करे ॥ १३७ ॥ जिस आगम से अपना अनुष्ठान सिद्ध हो, अथवा प्राप्त हो, उस आगम- शास्त्र का सर्वदा पूजन करे और सर्वदा गुप्त रखे ॥ १३८ ॥ अपनी शक्ति के अनुसार ब्राह्मणादि दीन तथा अनाथों का पालन करे। इस प्रकार संसारी शिष्य भक्तों के कल्याण के लिये गुरु उपदेश करे। जिनके कृपा प्रसाद से शिष्य मन्त्र जन्य फल प्राप्त करता है, उन गुरु का शिष्य को पूजन करना चाहिए ॥ १३९-१४० ॥ इष्ट्वैवं हि ततः कुर्यात् सेचनं कलशेन तु ॥ १४० ॥ आत्मनश्चानु भक्तानां नैवेद्यं प्रार्थयेत् ततः । ब्राह्मणाय च तद्दद्याद् न्यस्तमाहत्य मन्त्रराट् ॥ १४१ ॥ शिष्यस्य महाकुम्भोदकेनाभिकेनाभिषेकमाह—इष्ट्वेत्यर्धेन। एतत्क्रमो विस्तरेण वक्ष्यमाणो ग्राह्यः। स्वानुयागार्थं कारिप्रदानार्थं च देवं हविः प्रार्थयेदित्याह—आत्मन इत्यर्धेन। कारिप्रदानमाह—ब्राह्मणायेत्यर्धेन। अत्रैकमूर्तेर्नृसिंहस्याराधनप्रकरणाद् ब्राह्म- णायेत्येकवचनमुक्तम्, पूर्वं चातुरात्म्यार्चनप्रकरणात्— सम्पूज्य गन्धधूपैश्च ततस्तु भगवन्मयान् ॥