सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअर्चन में मानसिक रूप से मुद्रा बन्धन होता है । इससे साधक के बाह्य एवं आभ्यन्तर पाप नष्ट हो जाते हैं तथा मन में प्रसन्नता होती है । अन्त में मण्डल स्थित देवताओं का उपसंहार क्रम वर्णित है । ११. मण्डलकुण्ड लक्षण नामक ग्यारहवें परिच्छेद में मण्डल निर्माण की विधि एवं ध्यान का लक्षण बताकर पाँच प्रकार के कुण्डों का लक्षण वर्णित है । १२. विभवदेवताध्यान नामक बारहवें परिच्छेद में अलग-अलग विभव देवताओं का ध्यान वर्णित है । १. शक्तीश, २. मधुसूदन, ३. विद्याधिदेव, ४. कपिल, ५. विश्वरूप, ६. हंस, ७. वाराह, ८. वडवानल, ९. धर्म, १०. हयग्रीव, ११. एकार्णवशायी, १२. कूर्म, १३. वराह (यज्ञ), १४. नृसिंह, १५. अमृतातहरण, १६. श्रीपति, १७. कान्तात्मा, १८. राहुजित्, १९. कालनेमिघ्न, २०. पारिजातहर, २१. लोकनाथ, २२. दत्तात्रेय, २३. न्यग्रोधशायी, २४. मत्स्यावतार, २५. वामन, २६. त्रिविक्रम, २७. नर, २८. नारायण, २९. हरि, ३०. कृष्ण, ३१. परशुराम, ३२. श्रीराम, ३३. वेदव्यास, ३४. कल्कि, एवं ३५. पातालशयन—इन विभव देवताओं का अलग-अलग विस्तृत ध्यान बताया गया है । फिर सत्य, सुपर्ण, गरुड़ तार्क्ष्य और विहगेश्वर इन भगवन्मय वाहन का ध्यान वर्णित है । ये सभी पञ्चप्राण के विकार हैं । अतः चरण से लेकर इनका समस्त देह पुरुषाकृति है । नारायण पक्षी के पक्ष रूपी कमल के विष्टर पर आसीन हैं । इस प्रकार गरुड़वाहन विष्णु का ध्यान सिद्धि के लिए किया जाता है । इनके छः भुजाओं में एवं आठ भुजाओं आदि से लेकर अष्टादश भुजाओं में स्थित आयुध का वर्णन है । १३. भूषणाद्यस्त्रदेवता ध्यान नामक तेरहवें अध्याय में किरीट आदि भगवान् के भूषणभूत चिह्नों का स्वतन्त्र रूप से अर्चन कहा गया है । इसी सन्दर्भ में किरीट का स्वरूप, श्रीवत्स का लक्षण एवं वनमाला का ध्यान कहकर चक्रादि सप्तदश आयुधों का ध्यान बताया गया है । ये सत्रह आयुध चक्र, कमल, गदा, शङ्ख, हल, मुशल, इषु, धनुष, नन्दक, खेटक, दण्ड, परशु, पाश, अङ्कुश, मुद्गर, वज्र और सौदामिनी हैं । इन सभी का सामान्य लक्षण कहकर किरीटादि के अधिष्ठातृ देवताओं का निरूपण है । फिर परमात्मा विभु के साधार और निराधार जो चिन्ता आदि सुन्दरियाँ कही गई हैं उनका ध्यान वर्णित है । इनके अतिरिक्त भगवान् के शयनागार में चार शक्तियाँ और हैं। इसके अलावा भगवान् की तीन शक्तियाँ और हैं जो तीन दिशाओं में भगवान् का पद संवहन करती हैं । इनमें एक लक्ष्मी हैं जो कभी वाम भाग में रहती हैं और कभी दक्षिण भाग में रहती हैं । श्री एवं पुष्टि दाएँ-बाएँ निवास करती हैं । इन्हीं दो शक्तियों का परिणाम चिन्ता, कीर्ति, दया, जया तथा माया आदि रूपों से अनेक प्रकार का कहा गया है । फिर इनके लक्षण कहकर शुद्ध्यादि देवियों के लक्षण, शक्त्याष्टक लक्षण एवं लक्ष्मी आदि बारह देवियों के सामान्य लक्षण कहकर इनके अर्चन के फल का कथन है । १४. पवित्रारोपणविधि नामक चौदहवें अध्याय में नित्य-नैमित्तिक कर्म में बाधा निवारणार्थ पवित्रारोपण कर्म कहा गया है । नित्य-नैमित्तिक कर्म का लोप न हो,