सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४० सात्त्वतसंहिता औपचारिकता के अभाव में दोष न पड़े आदि से निवृत्ति का यह उपाय बताया गया है। आराधना में सांस्पर्शिक दोष (स्रक्, चन्दन आदि का अभाव) पूजा करने में मात्रावित्त (अर्थात् हिरण्य सहित शालि, तण्डुल तिलादि का दान) से पूर्ण होता है। आभ्यवहारिक भोगों के लोप का दोष आज्य परिप्लुत अन्न के होम से परिपूर्ण होता है। छत्र, चामरादि के अभाव से उत्पन्न औपचारिक दोष का शमन मुद्गादि विविध बीज के दान से होता है। कृच्छ्रचान्द्रायण व्रतों में होने वाले दोषों का शमन चातुर्मास्य के संयम से होता है। इसी सन्दर्भ में पवित्रारोपण का काल बताया गया है। आषाढ़ की पूर्णिमा से कार्तिक पूर्णिमा तक का दिन चातुर्मास्य कहा जाता है। यही वेदाध्ययन (पवित्रारोपण) का काल है। पवित्रानुष्ठान दशमी एवं एकादशी को भी किया जाता है। इसमें देवेश का आवाहन कर अर्घ आदि देकर प्रार्थना करे। आप भगवन् आनन्दभोग से तृप्त हैं, आपकी भक्ति से तृप्त हुआ मैं अपनी सिद्धि की कामना से आपका यजन करता हूँ। १५. पवित्रस्नानविधि नामक पन्द्रहवें परिच्छेद में सर्वाच्छिद्रपूरक पवित्रारोपण कर्म के बाद सम्पूर्ण याग की छिद्र पूर्ति हेतु समुद्रगामिनी नदी में स्नान करना वर्णित है। फिर कुश कूर्च के निर्माण का प्रकार कहा गया है। पचीस काण्ड कुश में भगवद् भावना से मन, बुद्धि आदि विभिन्न तत्त्वों की आराधना कर शेष बचे हुए कुशों को एक में मिलाकर गोले के समान बाँध देवे। दर्भ से पवित्री निर्माण करे। उसमें मन्त्रनाथ का ध्यान कर मन्त्रनाथ की प्रतिष्ठा करे। फिर अर्घ्य एवं पुष्पादि से पूजा कर प्रार्थना करे। फिर विधिपूर्वक स्नान करे। उस पवित्रक में अविनाशी सच्चिन्मय ऐश्वर स्वरूप वाले जीव रूप हंस की भावना करे। इस प्रकार ध्यान कर उस हंस रूप पवित्रक को जल में स्नान कराए और फिर अन्यों को भी अनेक लोगों के साथ स्नान कराए। इस प्रकार भगवान् के स्नानान्तर के पश्चात् उन्हें विष्टर प्रदान कर, रथ निर्माण कर एवं अर्चन कर यात्रोत्सव आरम्भ करे। १६. अघशान्तिकल्प नामक षोडश परिच्छेद में ब्राह्मणादि वर्णों के सर्वसिद्धिप्रद तीन प्रकार के दीक्षा के उपायों को बताया गया है। पहले शिष्य को गुरुकुल में रखते हैं। फिर प्रायश्चित्त एवं शान्त्यादि कर्म उस शिष्य के पापादि नाश हेतु कराते हैं। फिर ब्रह्मकूर्च सहित प्रायश्चित्त कराते हैं। दोषों के प्रायश्चित्त से वह शिष्य नवीन एवं निर्मल हो जाता है। इससे कृतघ्न एवं नास्तिक शिष्य भी दोषमुक्त हो जाता है। जो पाप के अनुताप से आर्त होकर भगवान् के शरणागत हो जाता है उसके बारे में कहना ही क्या? सङ्कर्षण ने पूछा—किन चिन्हो से पता लगता है कि पाप नष्ट हो गए? भगवान् ने कहा—आराधक के ऊपर आराधन मन्त्र का जब प्रभाव होता है तो साधक का चित्त अभूतपूर्व प्रसन्नता से भर जाता है, उसके तेज की अभिवृद्धि हो जाती है। उसमें धैर्य, उत्साह, सन्तोष तथा अदैन्य एवं अकार्पण्य गुण उत्पन्न हो जाते हैं।