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सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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भूमिका ४१ शिष्य परीक्षित हो जाने पर गुरु से परव्यूह एवं विभवादि (षाड्गुण्य) तीनों दीक्षा की प्रार्थना करे । १७. वैभवीयनृसिंहकल्प नामक सप्तदश परिच्छेद में नृसिंह मन्त्र का कथन है । 'ॐ नमो भगवते नारसिंहाय' इस द्वादशाक्षरमन्त्र से विग्रहवत् उनकी पूजा करने का विधान है । इस मन्त्र से दीक्षित साधक अधिकार प्राप्त होने पर भगवद् आराधन करे । प्राणायाम का प्रकार, भूतशुद्धि का प्रकार, करन्यास, अङ्गन्यास तथा भूष्णायुध शक्तिन्यास कहते हैं । फिर शिष्य अपने में देवता भाव की भावना करे । पूजा के लिए मण्डलरचनाविधान, पीठपरिकल्पना तथा महाकुम्भ स्थापन की विधि वर्णित है । प्रथम गणेश की पूजा, फिर कलश में मन्त्रनाथ का आवाहन पूजन करे । भोग याग का विधान कर मूल मन्त्रादि का ध्यान कहा गया है । फिर हन्मुद्रा, शिरोमन्त्रादि मुद्रा-पञ्चक एवं श्रियादि शक्तिमुद्रा-चतुष्टय का विधान है । फिर अर्घ्यादि देकर मन्त्र देवता को पूर्णाहुति प्रदान करे । फिर गुरु उन शिष्यों को वैष्णव धर्म के नियमों को सुनाए । भगवान् से क्षमा प्रार्थना के बाद विश्वक्सेनार्चन की विधि बताई गई है । यहाँ आत्मसिद्धि के लिए आगमशास्त्र के अनुसार नृसिंहानुष्ठान के ज्ञाताओं से समझ बूझ कर विधि कही गई है । फिर शान्तिकादि कर्म का विधान किया गया है । पौष्टिक कर्म का प्रतिपादन कर आप्यायन विधि का निरूपण किया गया है । फिर संवर्धन विधि कहकर रोगार्तों के लिए रक्षाविधान कहा गया है । क्रियापरायण आस्तिक भक्तों एवं अपने हितेच्छु जनों की भी रक्षा करनी चाहिए । इसकी प्रयोग विधि श्रीनृसिंहबीज गर्भ में प्रणव सम्पुटित साध्यनाम लिखकर बताई गई है । यन्त्र का निर्माण प्रकार भी उल्लिखित है । फिर धर्मार्थकाममोक्षाख्य पुरुषार्थ चतुष्टय की सिद्धि के लिए मन्त्रराज की उपासना विधि का निरूपण है । १८. अधिवासदीक्षाविधि नामक अठ्ठारहवें परिच्छेद में द्विजातियों के तीनों दीक्षाक्रमों को बताया गया है । दीक्षामण्डपनिर्माण की विधि में पञ्च महाभूतों को बलि देकर, गायों को संतृप्त कर, ब्राह्मणों को दक्षिणा देकर सर्वाभरणभूषित मण्डप निर्माण करने को कहा गया है । एकान्त में गवाक्ष युक्त हवन मण्डप बनावे । सभी स्थानों पर सर्वदा बलिदान की विधि कही गई है । फिर पूजा के लिए विभिन्न द्रव्यों का सम्भारार्जन करे । दीक्षा में प्रविष्ट होने वाले भक्तों की संख्या के अनुसार पूजा द्रव्य घटा बढ़ा लेना चाहिए । जब समस्त वैभव मन्त्र की एक साथ दीक्षा देनी हो तब समस्त विभव देवों के कारणभूत विशाखयूप मन्त्र से दहन एवं आप्यायनानुष्ठान कर्म करे । फिर यागगृह की शोभा के लिए अलङ्करण करे । फिर अर्घ्यादि की परिकल्पना का क्रम कहा है । प्रथमतः चार घटों में विभिन्न द्रव्यों को रखने का विधान है । फिर द्वितीय अर्घ्यपात्र का विनियोग आदि विवक्षित है । फिर कुम्भ मण्डलाग्नियों में भगवदर्चन का क्रम कहा गया है । फिर क्षेत्रनाथ की बलि, हवि पाक विधान, द्रव्यसम्पात होम तथा पूर्णाहुति करे ।