सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
भूमिका ४१ शिष्य परीक्षित हो जाने पर गुरु से परव्यूह एवं विभवादि (षाड्गुण्य) तीनों दीक्षा की प्रार्थना करे । १७. वैभवीयनृसिंहकल्प नामक सप्तदश परिच्छेद में नृसिंह मन्त्र का कथन है । 'ॐ नमो भगवते नारसिंहाय' इस द्वादशाक्षरमन्त्र से विग्रहवत् उनकी पूजा करने का विधान है । इस मन्त्र से दीक्षित साधक अधिकार प्राप्त होने पर भगवद् आराधन करे । प्राणायाम का प्रकार, भूतशुद्धि का प्रकार, करन्यास, अङ्गन्यास तथा भूष्णायुध शक्तिन्यास कहते हैं । फिर शिष्य अपने में देवता भाव की भावना करे । पूजा के लिए मण्डलरचनाविधान, पीठपरिकल्पना तथा महाकुम्भ स्थापन की विधि वर्णित है । प्रथम गणेश की पूजा, फिर कलश में मन्त्रनाथ का आवाहन पूजन करे । भोग याग का विधान कर मूल मन्त्रादि का ध्यान कहा गया है । फिर हन्मुद्रा, शिरोमन्त्रादि मुद्रा-पञ्चक एवं श्रियादि शक्तिमुद्रा-चतुष्टय का विधान है । फिर अर्घ्यादि देकर मन्त्र देवता को पूर्णाहुति प्रदान करे । फिर गुरु उन शिष्यों को वैष्णव धर्म के नियमों को सुनाए । भगवान् से क्षमा प्रार्थना के बाद विश्वक्सेनार्चन की विधि बताई गई है । यहाँ आत्मसिद्धि के लिए आगमशास्त्र के अनुसार नृसिंहानुष्ठान के ज्ञाताओं से समझ बूझ कर विधि कही गई है । फिर शान्तिकादि कर्म का विधान किया गया है । पौष्टिक कर्म का प्रतिपादन कर आप्यायन विधि का निरूपण किया गया है । फिर संवर्धन विधि कहकर रोगार्तों के लिए रक्षाविधान कहा गया है । क्रियापरायण आस्तिक भक्तों एवं अपने हितेच्छु जनों की भी रक्षा करनी चाहिए । इसकी प्रयोग विधि श्रीनृसिंहबीज गर्भ में प्रणव सम्पुटित साध्यनाम लिखकर बताई गई है । यन्त्र का निर्माण प्रकार भी उल्लिखित है । फिर धर्मार्थकाममोक्षाख्य पुरुषार्थ चतुष्टय की सिद्धि के लिए मन्त्रराज की उपासना विधि का निरूपण है । १८. अधिवासदीक्षाविधि नामक अठ्ठारहवें परिच्छेद में द्विजातियों के तीनों दीक्षाक्रमों को बताया गया है । दीक्षामण्डपनिर्माण की विधि में पञ्च महाभूतों को बलि देकर, गायों को संतृप्त कर, ब्राह्मणों को दक्षिणा देकर सर्वाभरणभूषित मण्डप निर्माण करने को कहा गया है । एकान्त में गवाक्ष युक्त हवन मण्डप बनावे । सभी स्थानों पर सर्वदा बलिदान की विधि कही गई है । फिर पूजा के लिए विभिन्न द्रव्यों का सम्भारार्जन करे । दीक्षा में प्रविष्ट होने वाले भक्तों की संख्या के अनुसार पूजा द्रव्य घटा बढ़ा लेना चाहिए । जब समस्त वैभव मन्त्र की एक साथ दीक्षा देनी हो तब समस्त विभव देवों के कारणभूत विशाखयूप मन्त्र से दहन एवं आप्यायनानुष्ठान कर्म करे । फिर यागगृह की शोभा के लिए अलङ्करण करे । फिर अर्घ्यादि की परिकल्पना का क्रम कहा है । प्रथमतः चार घटों में विभिन्न द्रव्यों को रखने का विधान है । फिर द्वितीय अर्घ्यपात्र का विनियोग आदि विवक्षित है । फिर कुम्भ मण्डलाग्नियों में भगवदर्चन का क्रम कहा गया है । फिर क्षेत्रनाथ की बलि, हवि पाक विधान, द्रव्यसम्पात होम तथा पूर्णाहुति करे ।
४२ सात्त्वतसंहिता १९. दीक्षाविधि नामक उन्नीसवें परिच्छेद में दीक्षा का विधान है । तीन प्रकार की दीक्षा होती है । १. जो कैवल्य मुक्ति रूप फल प्रदान करे, २. जो दीक्षा भोग एवं कैवल्य दोनों प्रदान करे और ३. जो केवल भोग प्रदान करे । शिष्य के स्वप्न की परीक्षा करके गुरु दीक्षा देवे । इसी सन्दर्भ में शुभाशुभस्वप्नों का विवेचन प्रस्तुत है । अशुभ स्वप्न की शान्ति के अनन्तर कुम्भादि अर्चन क्रम आरम्भ करे । फिर शिष्य का वैष्णव नामकरण करे । शिष्य, मण्डल, कलश तथा गुरु को नमस्कार कर निर्दोषता के लिए भूतशुद्धि करे । शिष्य बिम्ब के अग्रभाग में पुष्पाञ्जलि समर्पण करे । सहस्र संख्या में मूलमन्त्र से प्रायश्चित्त होम कर शिष्य शिर से पैर तक सूत्र से अपने को नापकर सूत्र प्रसारण कर्म करे । फिर शिष्य में, भगवान् में, सूत्र में तथा अपने में अकस्मात् अध्वा का दर्शन करे । अध्वस्मरण करके आहुतियाँ प्रदान करे । फिर पृथ्व्यादि तत्त्वों का सन्तर्पण करे । फिर शिष्य के चैतन्य का अपने हृदय में सङ्कर्षण करे । फिर शिष्य के लिए भुवनाध्वादि का उपदेश करे । क्ष्मा तत्त्व का विज्ञापन, अप्तत्त्व का संस्कार करके जल देवता से प्रार्थना करे कि मुझमें रस तन्मात्रा विद्यमान रहे । इसी प्रकार तेजस्तत्त्व से लेकर मनस्तत्त्वान्त का तथा मन्त्राध्वा से लेकर वर्णाध्वा पर्यन्त चारों का संस्कार करे । फिर ऐश्वरबीज के द्वारा जप एवं ध्यान लक्षण समाधि में लीन होकर द्वैत मात्र का अनुभव करे । फिर समाधि की सिद्धि हेतु आचार्य सौ आहुति प्रदान करे । 'व्यूह दीक्षा' एवं 'ब्रह्म दीक्षा' इन दोनों का केवल मोक्ष के अतिरिक्त और कोई फल नहीं है । २०. अभिषेक विधि नामक बीसवें अध्याय में दीक्षा के अनन्तर शीघ्र ही शिष्य का अभिषेक वर्णित है । सभी मन्त्रों की सिद्धि के लिए तथा सभी मन्त्रों पर अधिकार प्राप्ति के लिए अभिषेक होता है । अन्त में गुरुयाग का विधान है । २१. समयविधि नामक इक्कीसवें अध्याय में शिष्य के लिए विभिन्न आचारों का निर्देश है । वैष्णवधर्म परायणों का विष्णुवत् पूजन करे । पुष्प आदि का आहरण स्वयं अस्त्रमन्त्र से अपनी वाटिका से करे । फिर पूजा द्रव्यों का ग्राह्याग्राह्यत्व कहा गया है । कांस्य पात्र में भोजन न करे । कांसे में अर्घ भी न दे । अवैष्णव से कभी भी सम्बन्ध न रखे । चातुर्मास्य व्रत के अनुष्ठान का स्थान पुण्यक्षेत्र होना चाहिए । समय पञ्चक के यथावत् परिपालन से अभीष्ट सिद्धि प्राप्त होती है और सुप्रसन्न मन से यथावत् कालुष्य रहित होकर साधक आनन्द समुद्र में स्नान करता है तथा उसकी आत्मा सदैव प्रसन्न रहती है । २२. अधिकारिमुद्राभेदविधि नामक बाइसवें परिच्छेद में सामयिक, साधक, पुत्रक और आचार्य चारों प्रकार के शिष्यों के लक्षण कहे गए हैं । २३. अधिवासदीक्षाविधि नामक तेइसवें परिच्छेद में पद्मनाभ एवं ध्रुवादि विभव देवताओं के पिण्डमन्त्रगणों को कहा गया है । फिर किरीटादि १७ लाञ्छन मन्त्रों का उद्धार किया गया है ।
भूमिका ४३ २४. प्रतिमापीठप्रासादलक्षण नामक चौबीसवें परिच्छेद में प्रतिमा निर्माण के लिए शिला का चयन एवं बिम्ब के पाँच भेद बताए गए हैं। चित्र, मिट्टी, काष्ठ, शिला एवं लोहे के भेद से पाँच प्रकार के बिम्ब कहे गए हैं। बिम्ब निर्माण के लिए द्रव्य सामग्री का विवेचन कर भित्ति पर चित्र निर्माण अनर्थकारी बताया गया है। बिम्ब बनाने के लिए विभिन्न मान (नाप) बताई गई है। आँख, कान, नाक आदि की नाप यव से बताई गई है। एक अङ्गुल का आठवाँ भाग 'यव' कहलाता है। हयग्रीव बिम्ब के मुख का लक्षण, श्रीनृसिंह वक्त्र का लक्षण, वराहवक्त्र का लक्षण, सत्य सुपर्णादि गरुड़व्यूह का लक्षण, वामनलक्षण तथा पीठलक्षण का कथन किया गया है। एक पीठ के ही चार भेद होते हैं जो केवल लक्ष्म (चिह्न) से वर्जित होते हैं। फिर जब चिह्न आ जाता है तो वे ही अनेक हो जाते हैं। इस प्रकार सर्वसामान्य पीठों की संख्या सोलह कही गई है। बिम्ब के लिए ग्रहण किए जाने वाले भूखण्ड को जल प्रतिग्रह करे। मन्दिर पर कलश उत्कृष्ट धातु के होने चाहिए। घटों को नेत्र एवं वस्त्र से वेष्टित करे फिर ऋग्वेदियों से एवं सामवेदियों से विभिन्न मन्त्रों का पाठ कराकर उसकी प्रतिष्ठा करे। इसके बाद प्रासादलक्षण का निरूपण है। वह प्रासाद देवगृह के गर्भ में एक ताल से अधिक अथवा न्यून मान में द्वादश हाथ का होना चाहिए। ऐसा प्रासाद कल्याणकारी होता है। मन्दिर की ऊँचाई क्षेत्र का तिगुना निर्माण करे अथवा डेढ़ गुना रखे या दुगुना रखे। द्वारों की ऊँचाई गर्भ से दूनी बनावे। इस प्रकार के प्रासाद का नाम अनन्त भुवन है। सलक्षण बिम्ब मान हयग्रीवमुख लक्षण, नृसिंहमुख लक्षण, वराहमुख लक्षण, हयग्रीवादि के तीन चार और पञ्चमुख लक्षणों को विष्णुधर्मोत्तर पुराण तथा हेमाद्रि कृत चतुर्वर्ग चिन्तामणि में व्रतभाग प्रथम खण्ड में देखना चाहिए। २५. प्रतिष्ठाविधि नामक पच्चीसवें परिच्छेद में मूर्ति प्रतिष्ठा वर्णित है। चतुर्द्वार मण्डप के निर्माण का विधान करके वेदी निर्माण की विधि बताई गई है। वेदी में 'मण्डलादि-स्थल' का विभाग क्रम कहा गया है। फिर आठ कुण्डों के निर्माण का प्रकार उल्लिखित है। मण्डप की ऊँचाई और स्नान गृह का विस्तार वर्णन करके बालुकापीठ के मान का निरूपण किया गया है। स्नानार्थ शाला निर्माण के नियम का निरूपण कर नेत्रोन्मीलन गृह का लक्षण कहते हैं। द्वार एवं तोरण लक्षण में चारों दिशाओं में द्वार बनाने का विधान किया गया है। तोरण पाँच हाथ का होना चाहिए। तोरण ध्वज एवं ध्वजाष्टक स्थापित करे। वैभवहीन लोगों के लिए संक्षिप्त विधान भी किया गया है। इसके अनुसार अलग-अलग शालाओं के कर्म एक ही शाला में पूर्ण किए जाते हैं। ३५ हाथ लम्बा और उसका चौथाई चौड़ा याग मण्डप होता है। वेदियौं के निर्माण भी बारह अंगुल के अन्तराल पर होते हैं। चारों ओर वीथी का मान चार हाथ होता है। यदि सात वेदी
४४ सात्त्वतसंहिता निर्माण के लिए स्थान न हो तो पाँच ही वेदी बनावे । स्नान एवं नयनोन्मीलन मण्डप से रहित पाँच वेदी का निर्माण होता है । इसके बाद प्रासाद के मध्य में कुम्भ स्थापन किया जाता है । याग गृह में जहाँ जिसका उपयोग सम्भव होता है वहाँ के उपकरण पहले से रख दिए जाते हैं । ध्वजाओं पर चक्रराज का अर्चन द्वारपालीय साम से किया जाता है । यागगृह में प्रवेश शाकुन सूक्त एवं श्रीसूक्त द्वारा होता है । विभिन्न घटों में अलग-अलग द्रव्य डाले जाते हैं और देवताओं के वामभाग एवं अग्निकोण में दस पंक्ति में कलश रखे जाते हैं और द्वादशाक्षर मन्त्र से पूजा होती है । इसके बाद नयनोन्मीलन विधान के अनन्तर कलश से व्यूह मन्त्र द्वारा स्नान कराकर अर्चन होता है । फिर बिम्ब में प्राण प्रतिष्ठा की जाती है । फिर विभिन्न मन्त्रों से अर्चन किया जाता है । इसके बाद गरुड़ मन्त्र से तथा परिवार मन्त्र से तर्पण करते हैं । द्वादशाक्षर मन्त्र जप के लिए वैष्णवों को नियुक्त किया जाता है । चौकोर पीठ पर बिम्ब को स्थापित करना हितकारी कहा गया है । पीठ पर आठ लौहमय चक्र स्थापित होते हैं । इसके बाद प्रासाद संशोधन की प्रक्रिया कही गई है । फिर कुम्भस्थापन विधान वर्णित है । पीठ पर अन्य मूर्तियों का स्थापन निर्णय किया गया है । पहले से प्रतिष्ठित किन्तु मान से अधिक की प्रदक्षिणा करने से ऊर्जा की हानि होती है । मानहीन बिम्ब के स्थापन से संस्थापक के सुत एवं सुख की हानि होती है । जहाँ भक्तों की सिद्धि के लिए देवालयों में अर्चना प्रतोली, आँगन, जगती तथा देवमन्दिर हैं तथा पीठ सहित भगवद् बिम्ब है और प्रदक्षिणा के लिए पर्याप्त स्थान है वह देवतायतन श्वेत द्वीप के समान है । परिच्छेद के अन्त में पुराने मन्दिर के जीर्णोद्धार की विधि भी बतलायी गई है । श्रीगंगासप्तमी, २३.४.२००७ विद्वद्वशंवदः वैशाख शुक्ल, वि.सं. २०६४ सुधाकर मालवीयः
विषयानुक्रमणिका प्रथमः परिच्छेदः १ - ११ | परब्रह्मस्वरूपकथनम् ३१ प्रश्नप्रतिवचनम् | प्रीतिसंकल्पभोगदानमन्त्राः ३४ मलयाचले नारदस्यागमनम् २ | तृतीयः परिच्छेदः ३६ - ४४ नारदस्य परशुरामदर्शनम् २ | सुषुप्तिव्यूहसमाराधनम् नारदं प्रति ऋषीणां प्रार्थना ५ | पदानां वर्णसंख्यापूरणप्रकार- नारदस्य प्रतिवचनम् ६ | कथनम् ४३ सङ्कर्षणप्रश्नः ७ | चतुर्थः परिच्छेदः ४५ - ५२ वासुदेवप्रतिवचनम् ७ | स्वप्नव्यूहसमाराधनम् त्रिविधं परमं ब्रह्म ७ | वासुदेवादीनां लक्षणकथनम् ४७ परत्वादिलक्षणकथनम् ८ | स्वप्नव्यूहमन्त्रचतुष्टयोद्धारः ५० व्यूहलक्षणम् ९ | पञ्चमः परिच्छेदः ५३ - ७० विभवलक्षणम् ९ | जाग्रत्यूहसमाराधनम् द्वितीयः परिच्छेदः १२ - ३५ | वासुदेवादीनां विशेष लक्षणानि ५५ तुरीयव्यूहसमाराधनम् | सामान्यलक्षणानि ५७ उपासनाविधिविषयकः सङ्कर्षणप्रश्नः १२ | जाग्रत्यूहमन्त्रचतुष्टयोद्धारः ५८ चतुर्विधाधिकारिनिरूपणम् १४ | पुरुष, सत्य, अच्युत, वासुदेव- परार्चनविधानम् १५ | मन्त्रोद्धारः ६२ वर्णचक्ररचनाप्रकारः १५ | चतुरङ्गाद्वर्णचक्रात् सर्वमन्त्राणामुद्धारः ६३ मन्त्रोद्धारविवेचनम् १७ | तुर्य-सुषुप्ति-स्वप्न-जाग्रद्व्यूह- द्वाविंशाक्षरः षड्भिः पदैरन्वितः | लक्षणानि ६३ परमन्त्रः १८ | वर्णकालस्थानभेदेन वासुदेवादीनां मन्त्रान्तर्गतषट्पदानां | ध्यानकथनम् ६६ षाड्गुण्याभिधायकत्वम् १९ | चातुरात्म्यसमाराधनोपसंहारः ६७ षडङ्गमन्त्राः २१ | भगवदवतारक्रमः ६७ निरङ्गो ब्रह्मलक्षणो मन्त्र २२ | बहिर्यागोपक्रमः ६९ पञ्चाङ्गो नेत्रान्तो मन्त्रः २३ | षष्ठः परिच्छेदः ७१ - १३५ यागोपकरणानामासादनस्थाननियमम् २६ | चातुरात्म्यबाह्याराधनम् मन्त्रन्यासविधिकथनम् २७ | भद्रपीठशोधनविधानम् ७१ शब्दब्रह्मावस्थानम् २९
४६ सात्वतसंहिता [ वामभागः / Left Column ] चक्रराजार्चनविधानम् ७२ बिम्बशोधनकथनम् ७४ क्षीरपञ्चविंशतिकलशस्नपनप्रकार- कथनम् ८२ नीराजनविधिकथनम् ८६ अलङ्कारासने समर्पणीयानुपचार- कथनम् ८९ अग्न्यानयनकथनम् १०० होमोपकरणसन्निधापनविधानम् १०२ प्रणीतासंस्कारविधानम् १०४ आज्यसंस्कारकथनम् १०५ अनुयागविधिकथनम् १२२ सप्तमः परिच्छेदः १३६ - १६० अमन्त्रकव्रतविधिः व्यूहान्तरस्वरूपप्रतिपादनम् १३६ व्यूहान्तराभिव्यक्तिप्रयोजनम् १३७ व्रतारम्भकर्तव्यतानिरूपणम् १३८ वासुदेवस्य लाञ्छन ध्यानप्रकार- कथनम् १३९ वासुदेवादीनां जितन्तामन्त्र- चतुष्टयम् १४१ चातुरात्म्याराधने वर्णानां क्रमः १४२ संकर्षणादीनां लाञ्छनध्यानप्रकार- कथनम् १४३ केवलमुमुक्षुभिरनुष्ठेयं व्रते विशेषविधिः १४४ निष्कामैः सकामैश्र्च देयानि द्रव्याणि १४५ द्वादशवार्षिकव्रतविधानम् १४७ व्रतान्तरकथनम् १४८ द्वादशाख्यव्रतविधानम् १४९ षोडशाख्यव्रतनिरूपणम् १५१ व्रतनिष्ठानां भोज्यद्रव्याणि १५२ दिव्यायतनलक्षणकथनम् १५५ सिद्धायतनलक्षणकथनम् १५६ मानुषायतनलक्षणकथनम् १५७ वैष्णवक्षेत्रप्रमाणम् १५७ [ दक्षिणभागः / Right Column ] सालोक्यादिमोक्षविचारः १५८ अष्टमः परिच्छेदः १६१ - १९४ समन्त्रकव्रतविधिः चातुरात्म्यार्चनम्, अङ्गमन्त्रार्चनञ्च १६१ वासुदेवादिमूर्तिध्यानकथनम् १६४ वासुदेवादीनां हृदयाद्यङ्गमन्त्र- बीजकथनम् १६५ केशवादीनां द्वादशबीजकथनम् १६६ सर्वमन्त्रसाधारणाञ्जलिमुद्राकथनम् १६९ स्नपनद्रव्यकथनम् १७८ गुर्वर्चननिरूपणम् १८४ द्वादशीनिर्णयकथनम् १८९ चातुर्मास्यविधानम् १९१ नवमः परिच्छेदः १९५ - २२८ विभवदेवतान्तर्यागविधिः स्थूलसूक्ष्मपरत्वभेदेन विभवावतारस्य त्रैविध्यकथनम् १९५ भगवतः प्रादुर्भावरीतिकथनम् २०६ तदुपकरणानां विवरणम् २०७ बीजोद्धारक्रमविधानम् २१० देवतावर्गकथनम् २१८ दशमः परिच्छेदः २२९ - २४० विभवदेवताबहिर्यागविधिः मण्डलस्थदेवानामुपसंहारक्रम- कथनम् २३८ एकादशः परिच्छेदः २४१ - २५६ मण्डलकुण्डलक्षणम् चक्रकुण्डलक्षणकथनम् २५२ पद्मकुण्डलक्षणकथनम् २५३ द्वादशः परिच्छेदः २५७ - ३०४ विभवदेवताध्यानम् १. शक्तीशध्यानकथनम् २५९ २. मधुसूदनध्यानकथनम् २६० ३. विद्याधिदेवध्यानकथनम् २६१
विषयानुक्रमणिका ४७ ४. कपिलध्यानकथनम् २६२ चक्रादिशक्त्यन्तानां सप्तदशा- ५. विश्वरूपध्यानकथनम् २६३ युधानां ध्यानानि ३०७ ६. हंसध्यानकथनम् २६५ सर्वेषां सामान्यं लक्षणम् ३१० ७. वराहध्यानकथनम् २६५ किरीटादीनाम् अधिष्ठातृ देवता ८. वडवानलध्यानकथनम् २६६ कथनम् ३११ ९. धर्मध्यानकथनम् २६७ चिन्तादिदेवानां वर्णध्यानक्रम- १०. हयग्रीवध्यानकथनम् २६८ कथनम् ३१२ ११. एकार्णवशायीध्यानकथनम् २६९ श्रीपुष्टिद्विकस्य लक्षणकथनम् ३१४ १२. कूर्मध्यानकथनम् २७० शक्त्यष्टकलक्षणकथनम् ३१६ १३. वराहध्यानकथनम् २७० लक्ष्म्यादिद्विष्टकलक्षणम् ३१६ १४. नृसिंहध्यानकथनम् २७१ चतुर्दशः परिच्छेदः ३१९-३२७ १५. अमृताहरणध्यानकथनम् २७२ पवित्रारोपणविधिः १६. श्रीपतिध्यानकथनम् २७३ पवित्रारोपणानुष्ठानकालकथनम् ३२१ १७. कान्तात्माध्यानकथनम् २७३ पवित्रदिवसाख्य कर्मकथनम् ३२२ १८. राहुजित्ध्यानकथनम् २७४ पञ्चदशः परिच्छेदः ३२८-३३४ १९. कालनेमिघ्नध्यानकथनम् २७५ पवित्रस्नपनविधिः २०. पारिजातहरध्यानकथनम् २७५ कुशकूर्चनिर्माणप्रकारकथनम् ३२९ २१. लोकनाथध्यानकथनम् २७७ षोडशः परिच्छेदः ३३५-३४२ २२. दत्तात्रेयध्यानकथनम् २७७ त्रिविधदीक्षाविधानम् २३. न्यग्रोधशायीध्यानकथनम् २७८ अघशान्तिकल्पः ३३५ २४. मत्स्यावतारध्यानकथनम् २७९ त्रिविधदीक्षोपायनिरूपणम् ३३५ २५. वामनध्यानकथनम् २८० प्रायश्चित्तशान्त्यादिनिर्देशः ३३६ २६. त्रिविक्रमध्यानकथनम् २८० ब्रह्मकूर्चसहितं प्रायश्चित्तकथनम् ३३७ २७.-३०. नर-नारायण-हरि- सप्तदशः परिच्छेदः ३४३-४१७ कृष्णानां ध्यानकथनम् २८२ वैभवीयनृसिंहकल्पः ३१. परशुरामध्यानकथनम् २८४ नृसिंहबीजोद्धारकथनम् ३४४ ३२. श्रीरामध्यानकथनम् २८४ भगवदर्चाविधानम् ३४५ ३३. वेदव्यासध्यानकथनम् २८५ प्राणायामप्रकारकथनम् ३४६ ३४. कल्किध्यानकथनम् २८६ भूतशुद्धिप्रकारकथनम् ३४७ ३५. पातालशयनध्यानकथनम् २८७ करन्यासविधानम् ३४८ त्रयोदशः परिच्छेदः ३०५-३१८ अङ्गन्यासविधानम् ३४८ भूषणाद्यास्त्रदेवताध्यानम् भूषणायुधशक्तिन्यासकथनम् ३४९ किरीटध्यानकथनम् ३०६ स्वस्मिन् देवत्वभावनाकथनम् ३५० कौस्तुभध्यानकथनम् ३०६ मण्डलरचनाविधानम् ३५३ श्रीवत्सध्यानकथनम् ३०६ वनमालाध्यानकथनम् ३०७
४८ सात्वतसंहिता
[वाम-स्तम्भः / Left Column]
पीठपरिकल्पनप्रकारकथनम् ३५३ महाकुम्भस्थापनकथनम् ३५४ भोगयागक्रमकथनम् ३५६ मूलमन्त्रादीनां ध्यानकथनम् ३५८ हन्मुद्राकथनम् ३६२ शिरोमन्त्रादिमुद्रापञ्चककथनम् ३६३ श्रियादिशक्तिमुद्राचतुष्टयकथनम् ३६३ शिष्याणां समयोपदेशप्रकार- विधानम् ३६७ शान्तिविधानम् ३७४ पौष्टिकविधानम् ३७८ आप्यायनविधिकथनम् ३८१ रोगार्तानां रक्षाविधानम् ३८६ बलिदानप्रकारकथनम् ३८९ अनातुराणामपि रक्षाविधानम् ४०० धर्मार्थकाममोक्षाख्य पुरुषार्थचतुष्टयसाधनविधिः ४०४ अष्टादशः परिच्छेदः ४१८-४५२ अधिवासदीक्षाविधिः दीक्षामण्डपनिर्माणप्रकारकथनम् ४१८ सम्भारार्जनकथनम् ४२१ शिष्याणां बहुत्वे यागद्रव्याणां वृद्धिः ४ यागगेहशोधनालङ्करणकथनम् ४२६ प्रधानार्घ्य द्वितीयार्घ्यपात्र- विनियोगकथनम् ४२८ कुम्भमण्डलाग्निषु भगवदर्चनक्रम- कथनम् ४३१ भगवद्भूतबलिदानकथनम् ४३३ हविःपाकविधानम् ४३४ शिष्यस्य विष्टरोपरि प्रोक्षणादि- संस्काराः सम्पातहोमः अरुणसूत्रेण शिष्यस्य सूत्रात्मक- वपुःकरणम्
[दक्षिण-स्तम्भः / Right Column]
एकोनविंशः परिच्छेदः ४५३-४९० दीक्षाविधिः शिष्यस्वप्नपरीक्षा ४५४ शुभाशुभस्वप्नानि ४५५ अशुभ स्वप्न शान्तिः ४५८ कुम्भादिष्वर्चनक्रमः ४५८ उपवेशन-निरीक्षणादिसंस्कार- कथनम् ४५९ शिष्यस्य वैष्णवनामकरणकथनम् ४५९ भूतशोधनकथनम् ४६४ पुष्पाञ्जलिसमर्पणम् ४६६ सूत्रप्रसारणम् ४६७ अधिभूताधिदैवाध्यात्मपदार्थ- विवरणम् ४६८ शिष्यचैतन्यस्य स्वहृदि सङ्कर्षणम् ४७० शिष्याय भुवनाध्वादीनामुपदेशः ४७१ मन्त्रसमूहविज्ञापने तत्प्रकार- कथनम् ४७२ अप्तत्त्वसंस्कारकथनम् ४७३ होमविधिः ४७५ व्यूहदीक्षायां विशेषकथनम् ४८८ ब्रह्मदीक्षायां विशेषकथनम् ४८८ विंशः परिच्छेदः ४९१-५०० अभिषेकविधिः अभिषेककालकथनम् ४९१ समयिपुत्रकादीनां सर्वेषा- माचार्यस्यैव वाऽभिषेकः अथाभिषेकविधानम् ४९३ बलिदानादिकम् विष्वक्सेनार्चनविधानम् ४९७ सुधापानप्रदानप्रकारकथनम् ४९७ गुरुयागकथनम् ४९८ एकविंशः परिच्छेदः ५०१-५१४ समयविधिः भोजननियमविधानम् ५०२
विषयानुक्रमणिका ४९ विष्णुपरायणानां विष्णुवत् सत्यसुपर्णादिगरुडव्यूहादिलक्षण पूज्यत्वविधानम् ५०५ कथनम् ५७४ पुष्पादीनामाहरणप्रकारकथनम् ५०५ वामनलक्षणकथनम् ५७७ पूजाद्रव्याणां ग्राह्याग्राह्यत्वकथनम् ५०६ पीठलक्षणकथनम् ५७७ चातुर्मास्यव्रतानुष्ठानस्थानकथनम् ५१९ पीठसंख्याकथनम् ५७९ द्वाविंशः परिच्छेदः ५१५-५२५ भूप्रतिग्रहकथनम् ५८३ समयिपुत्रकादिलक्षणम् प्रासादनिर्माणविधानम् ५८४ अधिकारिमुद्राभेदविधिः ५१५ कलशलक्षणकथनम् ५८८ १. सामयिकानां लक्षणकथनम् ५१५ प्रासादलक्षणकथनम् ५९५ २. पुत्रकशिष्यस्य विशेषलक्षण- पञ्चविंशः परिच्छेदः ६०६-६७२ कथनम् ५१९ प्रतिष्ठादिविधिः साधकलक्षणकथनम् ५२० यागशालालक्षणम् ६०६ आचार्यलक्षणकथनम् ५२१ वेदिकालक्षणम् ६०७ त्रयोविंशः परिच्छेदः ५२६-५४१ वेदिकायां मण्डलादिस्थल- विभवदेवतापिण्डमन्त्रोद्धारः विभागक्रमकथनम् ६०८ अधिवासदीक्षाविधिः ५२६ कुण्डाष्टकनिर्माणकथनम् ६०८ किरीटादिलाञ्छनमन्त्रोद्धारः ५३८ त्रयोदशहस्तपरिमितमण्डपादिषु चतुर्विंशः परिच्छेदः ५४२-६०५ कुण्डप्रकारकथनम् ६०९ प्रतिमापीठप्रासादलक्षणम् मण्डपोच्छ्रायकथनम् ६१० मृत्संग्रहणादिप्रकारकथनम् ५४६ स्नानपीठलक्षणकथनम् ६१२ शिलालक्षणकथनम् ५५४ द्वारतोरणलक्षणकथनम् ६१२ दारुग्रहणकथनम् ५५४ विभवाद्यभावे पक्षान्तरकथनम् ६१३ बिम्बस्य मानोन्मानादिलक्षणकथनम् ५५५ पञ्चवेदिकापक्षकथनम् ६१४ मानपरिभाषाविधानम् ५५६ मूर्तिपकर्तव्यहोमस्य गतिकथनम् ६१५ हयग्रीवबिम्बस्य मुखलक्षणकथनम् ५६७ नयनोन्मीलनविधानम् ६२७ श्रीनृसिंहवक्त्रलक्षणकथनम् ५६८ भाष्यगतग्रन्थग्रन्थकारा- वराहवक्त्रलक्षणकथनम् ५६९ नुक्रमणिका ६७३-६७५ श्लोकार्धानुक्रमणिका ६७७-७७५ * सा० सं० - 4
वर्णसंकेतानुक्रमणिका अक्षस्थ — प्रणव | (१७.१८९) अराच्चतुर्दश — औकार | नाभेस्त्रयोदश — ओकार अरावसान — विसर्ग | नाभ्यपर — आकार अरोपान्त्य — अनुस्वार | नाभ्येकादश — एकार अष्टमाद् द्वितीयं वर्णम् — तकार | नेमि — मकार अष्टमारगं प्राग्वर्णम् — णकार | नेमितृतीय — रेफ आद्यमेकादशाद् — पकार | नेमि द्वितीय — यकार एकादशादाद्यं — पकार | नेमिषष्ठम् — शकार दशमाद् द्वितीयम् — नकार | नेमेरष्टकम् — सकार दशमारस्थ — धकार | नेमेरेकोनविंशाख्यवर्ण — बकार द्वितीयस्वर — आ | (१७.१८७) नवमादपरम् — दकार | नेमेर्द्वितीयं वर्णम् — यकार नवमाद् द्वितीयं वर्णम् — दकार | नेमेर्नवमवर्ण — टकार नाभि — अकार | नेमेस्तृतीयं वर्णम् — रेफ नाभितुर्य — इकार | नेमेः पञ्चमं वर्णम् — वकार नाभितुर्यासनस्थित — वकार | पञ्चमारगम् — उकार नाभितृतीय — इकार | लान्त — व नाभिद्वितीय — आकार | षष्ठस्वर — ऊ नाभिपूर्व — यकार | सान्त — ह नाभिसप्तमवर्ण — सकार | हंसार्ण (१८.१००) — हकार *
सात्वतसंहितास्थबीजानुक्रमणिका
| वासुदेवादिव्यूह-चतुष्टय | केशवादीनां द्वादशबीजानि | केशवादिदेवीनां बीजद्वादशकम् |
|---|---|---|
| वासुदेवबीज — ह्ँ | केशवबीज — ह्यूं | श्रीबीज — श्रीं |
| नारायणबीज — हलूं | वागीश्वरीबीजं — स्वीं | |
| माधवबीज — ह्वूं | कान्तिबीज — हलीं | |
| सङ्कर्षणबीज — ह्सां | गोविन्दबीज — स्यूं | क्रियाबीज — क्ष्वीं |
| विष्णुबीज — स्लूं | शक्तिबीज — स्त्रीं | |
| मधुसूदनबीज — स्वूं | विभूतिबीज — ह्लीं | |
| प्रद्युम्नबीज — ह्ूँ | त्रिविक्रमबीज — क्यून | इच्छाबीज — क्ष्रीं |
| वामनबीज — क्लूं | प्रीतिबीज — स्वीं | |
| श्रीधरबीज — क्वूं | रतिबीज — ह्र्रीं | |
| अनिरुद्धबीज — ह्स्वं | हृषीकेशबीज — क्ष्यूं | मायाबीज — क्ष्सीं |
| पद्मनाभबीज — क्ष्लूं | धीबीज — स्लीं | |
| दामोदरबीज — क्ष्बूं | महिमाबीज — ह्र्लीं | |
| जीवबीज — स । | ||
| विशाखयूपबीज — नम् । |
सात्वतसंहितास्थ वैदिकमन्त्रसूची अयं ते वरुण (अथर्व) — २५.११० आश्रावितम् (अथर्ववेद) — २५.९६ ओषधीनाम् — २५.१०९ इदं विष्णुवचक्रमे — २५.५३,११५ इह गावः — २५.९८ उत देवा — २५.४४ चतुरस्ततः — २५.९९ चत्वारि शृङ्गाः (ऋ० ४.५८.३) — २४.४०९ चर्षणी धृतं (सर्पसाम) — २५.९२ पवित्रं ते हि यत् (साम) — २५.११३ पूर्णात् पूर्णमुदच्यते — २५.९५ या ओषध्यः — २५.१०९ लोकद्वारमपावृणु (साम) — २४.४५ वरुणमन्त्र, चान्द्र मन्त्र — २५.१०३ वसो पवित्रं — २५.११३ सङ्कर्षणो भगवान् — २५.९३ *
पारिभाषिक कोष ऐश्वर्य स्वातन्त्र्यपरिबृंहित जगत्कर्तृत्व । ज्ञान स्वप्रकाश और नित्य एवं सर्वावगाही गुण को ‘ज्ञान’ कहते हैं । द्रव्ययाग बहिर्याग । द्रव्यैरर्घ्यादिभिः क्रियमाणो यागः (६.१) । पञ्चतालकम् पाँच ताल (बित्ता) (२४.२३७) । पलम् पलप्रमाणं तु पारमेश्वरे (१८.१३१-१३२)— चत्वारो व्रीहयः कुञ्जस्तेऽष्टौ माञ्जिष्ठमुच्यते । तच्छतं षष्टिरधिकं निष्कं निष्काष्टकं पलम् ॥ प्रणालभाग अभिषेक जल निकलने हेतु नलिका (६.४६) । प्राणायामम् नाभिदेशस्थितं प्रभुं स्मरन् उदरगं मलं निस्सृत्येत्यनेन प्राणायामः सूच्यते (१७.१८-२०) । बल जगत् के निर्माण में श्रमाभाव नारायण का बल है । ब्रह्मबीज चतुष्टय श ष स ह (सात्वत सं० पृ० ५४) । ब्रह्मसूक्त ‘सहस्रशीर्षा’ से लेकर ‘दक्षिणे तु भुजे विप्र’ तक १६ मन्त्र ब्रह्मसूक्त कहे जाते हैं । (द्र० अलशिङ्ग भाष्य पृ० ८४) । मन्त्रराट् क्षौं (नृसिंह मन्त्रबीज) । मात्रावित्तम् धनं मीयते परिच्छिद्यते पूर्यत इति मात्रा, मात्रार्थं वित्तं द्रविणम् (६.६१) । यव एक अङ्गुल का आठवाँ भाग ‘यव’ कहलाता है । वीर्य विकारराहित्य, निर्विकार ब्रह्म में जगदुपादान कारण होने पर भी किसी भी प्रकार के विकार का उदय न होना । व्यूह षाड्गुण्य में से दो-दो गुणों की प्रधानता होने पर तीन व्यूहों की सृष्टि । शक्ति जगत् का उपादान कारण । *
ॐ प्रासादं देवदेवीयमाचार्यं पाञ्चरात्रिकम्। अश्वत्थं च वटं धेनुं सत्समूहं गुरोर्गृहम् ॥ दूरात् प्रदक्षिणीकुर्यान्निकटात् प्रतिमां विभोः। दण्डवत्प्रणिपातैस्तु नमस्कुर्याच्चतुर्दिशम् ॥ —सात्वतसंहिता २१.११-१३ देवता, देवों का प्रासाद, आचार्य, पाञ्चरात्रिक, अश्वत्थ, वट, धेनु, सत्समूह एवं गुरु का घर दूर से ही देखकर इन्हें नमस्कार करे तथा इनकी प्रदक्षिणा करनी चाहिए । सन्निकट से प्रदक्षिणा करने में छायोल्लङ्घन का भय होता है । अतः दण्डवत् प्रणाम करे और चारों दिशाओं में नमस्कार करे । *
सात्वतसंहिता
इस पृष्ठ पर कोई पठनीय पाठ (Text) उपलब्ध नहीं है। यह एक रिक्त (Blank) पृष्ठ है।
॥ श्रीः ॥ सात्वतसंहिता अलशिङ्गभट्टविरचितभाष्योपेता प्रथमः परिच्छेदः प्रश्नप्रतिवचनम् विष्णोराराधनपरा मुनयो मलयाचले । संस्थिताः सिद्धगन्धर्वविद्याधरनिषेविते ॥ १ ॥ ✻ अलशिङ्गभाष्य ✻ श्रीमद्यादवशैलाग्रशेखरं सद्गुणाकरम् । योगानन्दनृसिंहाख्यदैवतं पर्युपास्महे ॥ १ ॥ श्रीमन्नारायणोऽव्याद् यदुगिरिनिलयो यः परं दिव्यरूपं सौषुप्तस्वप्नजाग्रत्यदभिदुरमिदं चातुरात्म्यं च रूपम् । रूपं वैशाखयूपं विविधमपि विभवं चापि बिभ्रद् देवीभूषायुधाढ्यो विहगपतिरथः पाति लोकान् समस्तान् ॥ २ ॥ विश्वस्य भजतां नित्यं नश्वरेतरभोगदः । शश्वत् सर्वार्थदो भूयाद् विश्वत्राता नृकेसरी ॥ ३ ॥ प्रणम्य शिरसाऽऽचार्यान् प्रतिष्ठापितसात्वतान् । तदादिष्टेन मार्गेण सात्वतार्थः प्रकाश्यते ॥ ४ ॥ अत्र तावद् भगवान् भगवच्छास्त्रविशारदो नारदो महामुनिः साक्षाद् वासुदेवेन सङ्कर्षणायोपदिष्टं स्वेन सङ्कर्षणाल्लब्धरहस्याम्नायसंज्ञितैकायनश्रुतेः सूत्ररूपं भगव- त्प्राप्त्येकोपायभूताभिगमनोपादानेज्यास्वाध्याययोगरूपकर्मविचारैः परव्यूहविभवरूप- ब्रह्मविचारैश्च दर्भितं पञ्चविंशतिलक्षणं सात्वतं तन्त्रमुपदेक्ष्यन् आदौ तदवतारक्रमं दर्श- यति—विष्णोरिति ।
२ सात्वतसंहिता अत्रादौ विष्णुशब्दप्रयोगेण चिकीर्षितग्रन्थनिर्विघ्नपरिसमाप्तिसाधकं निरवधि- कमङ्गलं कृतं भवति । सिद्धगन्धर्वविद्याधरनिषेविते । देवतानामपि सेव्यत्वादतिपरि- शुद्धमित्यर्थः । मलयाचले = मलयपर्वते । मुनयः = भगवद्ध्यानशीला ऋषयः । विष्णोः जगद्व्यापनशीलस्य भगवतः । आराधनपराः सन्तः सर्वव्यापिनो भगवतः कुत्राराधनं कार्यम्? कथं तद्विधानम्? को वा उपदेक्ष्यतीति तदेकचित्ताः सन्त इत्यर्थः । संस्थिताः = समित्युपसर्गेण चिरकालीना स्थितिः सूच्यते ॥ १ ॥ मलयाचले नारदस्यागमनम् कालेन केनचित् स्वर्गाद्रामदर्शनलालसः । तत्रावतीर्णो देवर्षिर्नारदो भगवन्मयः ॥ २ ॥ कालेनेति । तत्रैवास्थितेषु मुनिषु । केनचित्कालेन = कतिपयकालानन्तर- मित्यर्थः । भगवन्मयः = भागवताग्रेसरः । नारदो नाम देवर्षिः । रामदर्शन- लालसः सन् = परशुरामसेवासक्तः सन् । तत्र = मलयाचले । स्वर्गादवतीर्णः = आविर्बभूव ॥ २ ॥
- सुधा * साम्बं सदाशिवं नत्वा भानुं विष्णुं गणेश्वरम् । सर्वश्रेयस्करीं नित्यां मन्तरूपां सरस्वतीम् ॥ १ ॥ मालवीयकुलोत्पन्नः कुबेर विदुषः सुधीः । पुत्रः सुधाकरो नाम्ना पदार्थानां प्रकाशिकाम् ॥ २ ॥ सात्वतानां हितार्थाय तन्त्रस्य प्रतिपत्तये । सात्वतसंहिताकस्य 'सुधां' टीकां करोम्यहम् ॥ ३ ॥ जब सिद्ध, गन्धर्व एवं विद्याधरों से निषेवित मलयाचल पर विष्णु के आराधन में तत्पर मुनि लोग एकत्रित थे, उसके कुछ काल बीतने के पश्चात् भगवद् भक्तों में श्रेष्ठ देवर्षि नारद भगवान् परशुराम के दर्शन की इच्छा से वहीं मलयाचल पर्वत पर स्वर्ग से उपस्थित हुये ॥ १-२ ॥ ज्ञात्वा तस्याचलां भक्तिं देवः परशुलाञ्छनः । प्रत्यक्षमगमच्छश्वत् सानुकम्पेन चेतसा ॥ ३ ॥ अत्र मुनीन् सात्वतशास्त्रे प्रवर्तयेति नारदं प्रति रामोक्तिः—ज्ञात्वेति । परशुला- ञ्छनो देवः परशुरामः । तस्य देवर्षेः । अचलां भक्तिं स्वविषयकदृढाध्यवसायम् । ज्ञात्वा सानुकम्पेन = निर्हेतुककृपान्वितेन चेतसा प्रत्यक्षमगमत् = दृष्टिविषयतां प्रापेत्यर्थः ॥ ३ ॥ भगवान् परशुराम भी अपने विषय में उनकी अटल श्रद्धा देखकर उनके ऊपर कृपा करते हुये वहीं प्रगट हो गये ॥ ३ ॥
प्रथमः परिच्छेदः ३ नारदस्य परशुरामदर्शनम् ततः प्रहृष्टवदनः प्रोत्फुल्लपुलको मुनिः । पूजयामास तं देवमष्टाङ्गपतनादिना ॥ ४ ॥ तत इति । ततः = तस्माद्धेतोः । मुनिः = नारदः । प्रहृष्टवदनः सन् = सन्तोषो- त्फुल्लमुखः सन् । प्रोत्फुल्लपुलकः सन् = सञ्जातरोमाञ्चः सन् । तं देवं = रामम् । अष्टाङ्गपतनादिना = साष्टाङ्गप्रणामप्रदक्षिणस्तुतिप्रश्नाद्युपचारैः पूजयामास ॥ ४ ॥ नारद जी उनके दर्शन से अत्यन्त प्रसन्न हुए और उनका सारा शरीर रोमाञ्चित हो गया । फिर तो उन्होंने साष्टाङ्ग प्रणाम करते हुये महर्षि परशुराम की कुशल प्रश्नादि उपचारों से पूजा की ॥ ४ ॥ अथाह भगवान् रामो मधुराक्षरया गिरा। तवास्ति भक्तिरचला जन्मबीजक्षयङ्करी ॥ ५ ॥ एषा तु सात्वती शुद्धा नित्यमव्यभिचारिणी । तिष्ठन्ति मुनयो ह्यत्र प्रार्थयाना हरेः पदम् ॥ ६ ॥ तान् सात्वते क्रियामार्गे मद्वाक्याद् याहि योजय । अथेति । अथ मुनेरुत्साहकोलाहलानन्तरम् । भगवान् रामो मधुराक्षरया मनो- हरवर्णसंदर्भया गिरा वाचा आह । नारदं प्रत्युवाचेत्यर्थः । वचनप्रकारमाह—तवेति । तव तु एषा भक्तिः एतादृशी भक्तिरेवास्ति । अस्मत्सकाशाल्लब्धव्यमुपायान्तरं नास्तीति भावः । तां भक्तिं विशिनष्टि—अचलेत्यादिपदपञ्चकेन । अचला = चाञ्चल्यरहिता । जन्मबीजक्षयंकरी = संसारदुःखविनाशिनी । सात्वती = सात्वतशास्त्रोदिता । भगव- त्प्राप्त्येकोपायभूताऽभिगमनादिकर्माङ्गिकेति यावत् । तत एव शुद्धा = अमिश्रेत्यर्थः । नित्यं = निरन्तरम् । अव्यभिचारिणी = अनन्यदेवताविषयेत्यर्थः । एतादृश्या भक्तेस्तव विद्यमानत्वादस्मद्दर्शनादृते तव प्रयोजनान्तरं नास्ति । किन्त्वेतेषां मुनीनामपि मोक्षोपायमुपदिशेत्यर्थः । तिष्ठन्तीति । हि यस्मात् कारणात् । अत्र = अस्मिन् पर्वते । मुनयो हरेः पदं प्रार्थयाना = मुमुक्षवः सन्तस्तिष्ठन्ति । तस्मात् तान् मुनीन् । सात्वते सात्वतशास्त्रोदिते । क्रियामार्गे = अभिगमनोपादानेज्यास्वाध्यायरूपशुद्धमार्गे इत्यर्थः । मद्वाक्याद् योजय याहि परमरहस्येऽपि मार्गेऽस्मदाज्ञागौरवेण मुनीन् प्रवर्तय, तदर्थं शीघ्रं गच्छेति भावः ॥ ५-७ ॥ तदनन्तर भगवान् परशुराम ने मधुरवाणी में नारदजी से कहा—हे नारद! आप में जन्मरूपबीज को नाश करने वाली ऐसी अचला भक्ति है, जो सात्वत शास्त्र में प्रतिपादित है । यह भक्ति अनन्य विषयिका होने से शुद्धा है और निरन्तर रहने से नित्या भी है । यहाँ पर मोक्ष के लिये भगवत्प्रार्थना में तत्पर मुनि लोग एकत्रित हैं । इसलिए आप मेरी आज्ञा से सात्त्वतशास्त्र में उपदिष्ट क्रियामार्ग (= अभिगमन, उपादान, इज्या और स्वाध्याय रूप शुद्धमार्ग) में इन मुनियों को प्रवृत्त कीजिए ॥ ४-७ ॥
४ सात्वतसंहिता एवमुक्तवा तु तं विप्रमृषीणां हितकाम्यया ॥ ७ ॥ जगामादर्शनं देवस्तस्माद् देशात् तटिद् यथा । एवमिति । देवः परशुरामः । एवं = पूर्वोक्तरीत्या, ऋषीणां हितकाम्यया तं विप्रं = नारदं प्रत्युक्तवा तस्माद्देशात् पर्वताग्रात् तटिद्यथा विद्युदिव क्षणमात्रेण अदर्शनं जगाम, अन्तर्हितो बभूवेत्यर्थः ॥ ७-८ ॥ स तु हृष्टमना वाक्यं शिरसा चाभिवाद्य तत् ॥ ८ ॥ निर्जगामार्चयित्वाऽथ पुष्पैः स्थानवरं तु तत् । स इति । अथ भगवदन्तर्धानान्तरम् । स नारदः । हृष्टमनाः सन् । तद्वाक्यं शिरसा अभिवाद्य, तदाज्ञां शिरसा धृत्वेत्यर्थः । तत् स्थानवरं भगवदाविर्भावस्थानं केवलं पुष्पैर्च्चयित्वा निर्जगाम, तस्मात् स्थानान्निर्गतः ॥ ८-९ ॥ अपश्यदाश्रमं चान्यं नानाद्विजन्मनिषेवितम् ॥ ९ ॥ तरुपुष्पफलैराढ्यं वापीकूपह्रदान्वितम् । अपश्यदिति । आश्रमम् = ऋषीणामावासस्थानमपश्यच्च । नानेत्यादिविशेषण- त्रयेऽऽश्रमस्यातिरामणीयकत्वमुक्तं भवति ॥ ९-१० ॥ मुनियों की हित की कामना से महर्षि परशुराम इतना कह कर, जिस प्रकार बिजली क्षण भर में अन्तर्हित हो जाती है उसी प्रकार वहाँ से अन्तर्हित हो गये । देवर्षि नारद उनकी आज्ञा सुन कर अत्यन्त प्रहृष्ट हुए और शिर से उनका अभि- वादन किया । फिर परशुराम जिस स्थान से अन्तर्हित हुये थे, उसी स्थान की पुष्पादि द्वारा पूजा की तथा वहाँ से सद्यः निकल पड़े । वहाँ से कुछ दूर जाकर उन्होंने नाना द्विजों से निषेवित एक अन्य आश्रम देखा । वह आश्रम वृक्षों, फूलों और फलों से अत्यन्त रमणीय था और वापी, कूप एवं तंडागों से परिपूर्ण था ॥ ७-१० ॥ सम्प्रहृष्टस्ततस्तत्स्थैर्द्विजेन्द्रैरभिवादितः ॥ १० ॥ पूजितश्चार्घ्यपाद्येन विनिवेशितविष्टरः । सम्प्रहृष्ट इति । ततः तदाश्रमदर्शनाद्धेतोः सम्प्रहृष्टः = स नारदः, तत्स्थैः = तदाश्रमस्थितैः, द्विजेन्द्रैरभिवादितः = नमस्कृतः, अर्घ्यपाद्येन पूजितश्च सन् विनिवेशि- तविष्टरः विष्टरे विनिवेशितश्चेत्यर्थः ॥ १०-११ ॥ अथाञ्जलिधराः सर्वे प्रोत्फुल्लनयनाम्बुजाः ॥ ११ ॥ वदन्ति जन्मसाफल्यमद्य नस्तव दर्शनात् । अथेति । अथ उपचरणानन्तरम्, सर्वे मुनयः प्रोत्फुल्लनयनाम्बुजाः सन्तः सन्तोषविकसितनेत्रकमलाः सन्तः, तव दर्शनाद्धेतोः, नः अस्माकम्, जन्मसाफल्यं जातमिति शेषः, इति वदन्ति, अवदन्निति भूतार्थकत्वमङ्गीकार्यम् ॥ ११-१२ ॥