भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

पृष्ठ 56, कुल 837 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 56

पारिभाषिक कोष ऐश्वर्य स्वातन्त्र्यपरिबृंहित जगत्कर्तृत्व । ज्ञान स्वप्रकाश और नित्य एवं सर्वावगाही गुण को ‘ज्ञान’ कहते हैं । द्रव्ययाग बहिर्याग । द्रव्यैरर्घ्यादिभिः क्रियमाणो यागः (६.१) । पञ्चतालकम् पाँच ताल (बित्ता) (२४.२३७) । पलम् पलप्रमाणं तु पारमेश्वरे (१८.१३१-१३२)— चत्वारो व्रीहयः कुञ्जस्तेऽष्टौ माञ्जिष्ठमुच्यते । तच्छतं षष्टिरधिकं निष्कं निष्काष्टकं पलम् ॥ प्रणालभाग अभिषेक जल निकलने हेतु नलिका (६.४६) । प्राणायामम् नाभिदेशस्थितं प्रभुं स्मरन् उदरगं मलं निस्सृत्येत्यनेन प्राणायामः सूच्यते (१७.१८-२०) । बल जगत् के निर्माण में श्रमाभाव नारायण का बल है । ब्रह्मबीज चतुष्टय श ष स ह (सात्वत सं० पृ० ५४) । ब्रह्मसूक्त ‘सहस्रशीर्षा’ से लेकर ‘दक्षिणे तु भुजे विप्र’ तक १६ मन्त्र ब्रह्मसूक्त कहे जाते हैं । (द्र० अलशिङ्ग भाष्य पृ० ८४) । मन्त्रराट् क्षौं (नृसिंह मन्त्रबीज) । मात्रावित्तम् धनं मीयते परिच्छिद्यते पूर्यत इति मात्रा, मात्रार्थं वित्तं द्रविणम् (६.६१) । यव एक अङ्गुल का आठवाँ भाग ‘यव’ कहलाता है । वीर्य विकारराहित्य, निर्विकार ब्रह्म में जगदुपादान कारण होने पर भी किसी भी प्रकार के विकार का उदय न होना । व्यूह षाड्गुण्य में से दो-दो गुणों की प्रधानता होने पर तीन व्यूहों की सृष्टि । शक्ति जगत् का उपादान कारण । *