सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
DevanagariHindipublished837 पृष्ठ
पृष्ठ 57, कुल 837 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 57
ॐ प्रासादं देवदेवीयमाचार्यं पाञ्चरात्रिकम्। अश्वत्थं च वटं धेनुं सत्समूहं गुरोर्गृहम् ॥ दूरात् प्रदक्षिणीकुर्यान्निकटात् प्रतिमां विभोः। दण्डवत्प्रणिपातैस्तु नमस्कुर्याच्चतुर्दिशम् ॥ —सात्वतसंहिता २१.११-१३ देवता, देवों का प्रासाद, आचार्य, पाञ्चरात्रिक, अश्वत्थ, वट, धेनु, सत्समूह एवं गुरु का घर दूर से ही देखकर इन्हें नमस्कार करे तथा इनकी प्रदक्षिणा करनी चाहिए । सन्निकट से प्रदक्षिणा करने में छायोल्लङ्घन का भय होता है । अतः दण्डवत् प्रणाम करे और चारों दिशाओं में नमस्कार करे । *