भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 439

३८० सात्वतसंहिता स्ताम्रवर्णैस्तिलैर्बदरीफलैरापूर्य दिक्कुम्भानामुपरि संस्थाप्य (तां तान्) रक्तसूत्रेण सप्तधा संवेष्टयेत् । अन्यच्चोपयुक्तं यद्यत् तत्सर्वमपि कल्पयेत् । ततः स्नात्वा कृत- न्यासादिकोऽलक्तकाम्बुमिश्रया रोचनया दृढदूर्वाङ्कुरेण लेखिन्या भूर्जपत्रे पद्मगर्भमध्ये साध्यनाम विलिख्याष्टपत्रेष्वधोमुखं ब्लूमिति बीजं विलिख्य परितः पूर्ववत् टङ्कारं विलिख्य पूर्ववद् वकारान्वितं नृसिंहबीजं कर्णिकान्तर्विलिख्य तत्कमलं सकारगर्भे विन्यस्य तदष्टदिक्षु ॐ पुष्टिं कुरु कुर्विति विलिख्य तद्यन्त्रं रक्तसूत्रेण संवेष्ट्य मधु- तोयकुम्भे विन्यस्य तं पूर्वोक्तस्थाने निधाय हृदादिभिश्चतुर्मन्त्रैः प्रागादिदिक्चतुष्टय- मस्त्रमन्त्रेण विदिक्चतुष्टयमस्त्रमन्त्रेणाध ऊर्ध्वं च बद्ध्वा ततो देवमावाह्य विद्रुमाभं ध्यात्वा पूर्वं मण्डलोक्तेन परिवारमन्त्रगणेन सह रक्तवर्णैः कुसुमादिभी राजमुद्गाख्यै- र्बीजैर्गुलोदनैर्गुलरञ्जितभक्ष्यैश्च यथाविधि देवं यजेत् । एवं च सर्वमुपचारगणं रक्तवर्णं कुर्यात् । तदसम्भवे कुङ्कुमादिना गैरिकादिधातुना वा रक्तीकुर्यात् । एवं जपयज्ञान्तम- भ्यर्च्य घृतैः शर्कराबदरफलान्वितैस्ताम्रवर्णैस्तिलैश्च यथाविधि पूर्णाहुत्यन्तं हुत्वा पूर्व- वत् कुम्भस्थस्य देवस्य शर्कराम्भसा सेचनं कृत्वा पूर्वोक्तरीत्या बलिकर्म च कुर्यात्। एवं सप्तरात्रं त्रिरात्रं वा कृते मन्त्रमहिम्ना महती पुष्टिरुत्पद्यते ॥ १८१-१९८ ॥ इति पौष्टिकविधिः ॥ यहाँ तक शान्तिविधान कहा गया अब पौष्टिकशान्ति का प्रकार कहते हैं । कुङ्कुम के चूर्ण से मिश्रित कुसुम्भ के रज से पूर्ववत् मण्डल निर्माण करे । फिर उसे रक्त चन्दन के चूर्ण से भूषित करे ॥ १८२ ॥ फिर उस पर आठ दिशाओं में आठ कुम्भ स्थापित करे । उन आठों कुम्भों पर आठ उपकुम्भ (पुरवा), नीवार, तण्डुल, शुभ ताम्रवर्ण के तिल और बदरी (बैर) फलों से परिपूर्ण कर स्थापित करे । तदनन्तर लाल वर्ण के सूत्र से उन्हें सात बार परिवेष्टित करे और जो-जो उपयुक्त हो, उसे भी वहाँ स्थापित करे । तदनन्तर स्वयं स्नान कर न्यास करे । फिर अलक्तक जल से मिश्रित हल्दी के चूर्ण से पुष्ट दूर्वाङ्कुर की लेखनी से भोजपत्र पर लिखे गये अष्टदल के कमल मध्य में साध्य नाम लिख कर आठों पत्तों पर अधोमुख 'ब्लूं' (= नेमेरेकोनविंशाख्यवर्ण बकार, नाभि तृतीय लकार, पञ्चमारग उकार), इस बीज मन्त्र को लिखे उसके चारों ओर पूर्ववत् 'टं'कार (= दशादिना) लिखकर वकार युक्त (= नाभितुर्य) नृसिंह बीज कर्णिका के मध्य में लिखे उस कमल को दो सकार (= नाभिसप्तम) के मध्य में लिख कर उसके आठों दिशाओं में 'ॐ पुष्टिं कुरु कुरु' ऐसा लिखकर उस यन्त्र को लाल सूत्र से वेष्टित मधु मिश्रित जल कलश में स्थापित करे । पुनः पूर्वोक्त स्थान में रखे । फिर हृदादि चार मन्त्रों से पूर्वादि चारों दिशाओं में तथा अस्त्र मन्त्र से चारों विदिक् (कोणों) दिशाओं में, फिर नीचे ऊपर उस यन्त्र को बाँध कर श्रीनृसिंह देव का आवाहन करे । विद्रुम के आकार में उनका ध्यान करे ॥ १८३-१९२ ॥ पूर्व में मण्डल स्थान पर कहे गये परिवार मन्त्र गण के साथ रक्तवर्ण के पुष्पादिकों से, राजमुद्ग नामक बीज से, गुगुल आदि भक्ष्य पदार्थों से विधि के