भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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सप्तदशः परिच्छेदः ३८५ स्थस्य मन्त्रनाथस्य सेचनं कृत्वां घृतेन पायसान्नेन पायसेन फलैश्च पूर्ववद् बलिदानं कुर्यात् । अनेन आप्यायनं भवति ॥ १९९-२३५ ॥ इत्याप्यायनविधिः ॥ अब संवर्धन विधि कहते हैं—पूर्व में कही गई विधि के अनुसार चतुर्वर्ण भूषित मण्डल निर्माण करे । फिर उस यागस्थान को चंदोवा, पुष्पमाला, दर्पण, क्षुद्र घण्टिका, चामर तथा व्यजनादि से अलङ्कृत कर घृत-मधु-दधि मिश्रित दूध से दो-दो कलशों को भरकर स्थापित करे । फिर महुआ, कपूर, द्राक्षा और आँवलों से भरे हुए उपकुम्भ (पुरवा) को स्थापित करे । फिर शिरो मन्त्र के जल से संसिक्त शरावो (पुरवों को) जो चूने से लिप्त हों, श्वेत पुष्पों से अलङ्कृत हों, श्वेत अर्घ्य से अर्चित हों और अङ्कुर युक्त हों, ऐसे पुरवों को दिशाओं के कुम्भ के मध्य स्थान में स्थापित करे । उसके लिये उपयुक्त श्वेत रक्त तथा पीले पुष्पों का आहरण करे ॥ १९९-२०५ ॥ फिर आह्निक कर्म सम्पादन कर, शुक्ल वस्त्र धारण कर, साधक स्वयं मन्त्र न्यासादिक क्रियाओं का सम्पादन करे । ‘मैं स्वयं नृसिंह हूँ’ इस प्रकार का अपने में अभिमान कर, कुङ्कुम समन्वित दूध से, जिसमें इक्षुरस तथा मधु मिला हो, उससे भूर्जपत्र पर दो सकार के मध्य में साध्य नाम लिखे । फिर उसके बाहर चतुर्दल कमल, उसके बाहर कर्णिका केशरान्वित अष्टदल कमल, उसके बाहर द्वादशदलान्वित कमल, उसके भी बाहर षोडश दलान्वित कमल, पुनः उसके भी बाहर चौबीस दलान्वित कमल दल बनावे । फिर उसके बाहर एक वृत्त (गोला) बनावे ॥ २०५-२०८ ॥ फिर चतुर्दल कमल पर ‘स्यूट्’ यह बीज, अष्टदल पर ‘प्स्यूट्’, द्वादशदल कमल पर ‘स्क्यूट्’, फिर षोडश दल कमल पर ‘स्युट्’ तथा चौबीस दल वाले कमल पर ‘स्म्यूट्’ यह बीज अधोमुख लिखे । कर्णिका के मध्य में ‘वौषट् क्षौं वौषट्’ इस बीज को लिखकर फिर चार पत्तों वाले कमल के बीच-बीच में ‘क्षौं’ केवल नृसिंह बीज लिखे । आठ पत्तों वाले कमल के बीच-बीच में ‘क्षः’ यह बीज लिखे । फिर बारह पत्तों वाले कमल के बीच-बीच में ‘क्ष्यः’ लिखे । फिर षोडश पत्तों वाले कमल के बीच-बीच में ‘क्षौं वषट् क्षौं वषट्’ तथा २४ दल वाले कमल के बीच-बीच में ‘स्वौं क्षौं स्वौं’ यह बीज मन्त्र लिखे । तदनन्तर वृत्त के बाहर ‘फ्टं’ यह बीज दक्षिण क्रमानुसार निरन्तर लिखे । इसमें संख्या का क्रम नहीं है । इस प्रकार बने हुए यन्त्र को श्वेत रक्त तथा पीत वर्ण के सूत्र से वेष्टित कर मधु तथा इक्षुरस से पूर्ण कुम्भ में स्थापित करे ॥ २०९-२२४ ॥ उस कुम्भ को चन्दन से लेपन कर, पुष्प माला से अलङ्कृत कर, पहले स्थान पर पुनः उसे स्थापित करे । फिर अपने हृदय कमल में समस्त परिवार समन्वित स्वच्छ स्फटिक के समान बर्फ से भी अधिक शीतल श्रीनृसिंह का ध्यान कर अपने ब्रह्मरन्ध्र में स्थित अधोमुख कमल का ध्यान करे । उसकी कर्णिका में