भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 457

३९८ सात्वतसंहिता का वहन करा कर अगाध जल में, चत्वर में, वृक्ष मूल में, ग्राम के बाहर, अथवा नगर के बाहर देवभूत बलि को प्रक्षिप्त करा देवे ॥ २८०-२८५ ॥ सिद्धार्थ से धूपित पूर्वोक्त वह्निपात्र और जलपात्र भी उसी बलिपात्र के साथ त्याग देवे । इसी प्रकार किसी कूप के समीप, वापी के समीप, वृक्ष के समीप, बलि को भी प्रक्षिप्त करा देवे । फिर साधक अपना हाथ पैर धोकर आचमन करे । सुलिप्त भूमि में शयन करने वाले रोगी के शिर के चारों ओर जलते हुए दीप पात्र में अस्त्र मन्त्र से सिद्धार्थक (श्वेत सर्षप) प्रक्षिप्त करे और मूल मन्त्र से सम्पुटित अस्त्र मन्त्र से बहुत बार अभिमन्त्रित सिद्धार्थ सात रात तक प्रतिदिन रोगी के वस्त्र में बाँधे । ऐसा करने से व्याधि से पीड़ित रोगी की रक्षा सिद्ध हो जाती है । फिर रक्षा के योग्य रोगी के प्रलिप्त भूभाग में कुश अजिन के आसन पर स्वयं बैठ कर स्वयं मन्त्र न्यास करे । उसकी सहायता के लिये मात्र दूध भक्षण करते हुए अथवा निराहार रह कर जप ध्यान में परायण रहकर रात्रि के आदि मध्य और अन्त में पूर्वोक्त प्रकार से क्रमशः पूजन, हवन तथा बलिदान करे ॥ २८०-२९३ ॥ बलिदान में विशेष रात्रि के पूर्वभाग में जल सहित सक्तु, मधु और घृत से बलि देवे । मध्य रात्रि में यव, गोधूम एवं शालिधान्य का चूर्ण जिसमें गुड़ और जल मिला हुआ हो उससे तथा वृत्ताकार, दीपशिखाकर, आम्रफलाकार तीन प्रकार का मोदक हाथ से बनाकर उसमें दूध मिलाकर बिना पकाये उससे बलि देवे । रात्रि के अन्त में बिना पकाये सम्मर्दित कृष्ण तिल, बीज, तण्डुल, हरिद्राचूर्ण, दधि, दूर्वाङ्कुर और फलों से रक्षागृह के बाहर किसी मार्ग के कोने में अथवा संशुद्ध चत्वर में बलि प्रदान करे ॥ २९३-२९८ ॥ इसके बाद सप्तधान्य हाथ में लेकर मूल मन्त्र से अभिमन्त्रित कर उसे किसी पुरवा में रखे । उस शरावा को किसी ब्राह्मण की कन्या को देकर उससे एक पात्र में तीन पसर बीज, दूसरे पात्र में सात पसर बीज, पुनः तीसरे पात्र में ११ पसर बीज लेवे । फिर उक्त तीनों पात्रों को क्रमशः जल से पूर्ण करे । फिर एक सौ आठ की संख्या में अस्त्र मन्त्र से सम्पुटित नृसिंह-बीज से प्रथम कुम्भ, उससे दूने सम्पुट से दूसरा पात्र तथा उससे तिगुने सम्पुट से तीसरा पात्र अभिमन्त्रित करे । प्रातःकाल में प्रथम पात्र उठाकर स्थल में छोड़े और मध्याह्न में दूसरा पात्र उठाकर जल में प्रक्षिप्त करे । समाप्ति दिन पर्यन्त प्रतिदिन सामान्य रूप से इसी प्रकार साधक भूत के तर्पण का कार्य करे ॥ २९८-३०२ ॥ फिर दूसरे दिन भी विधानपूर्वक श्रीनृसिंह देव का अर्चन कर अग्नि में पूर्णाहुति पर्यन्त उनको तृप्त कर किसी गोमयोपलिप्त स्थल में सफेद चूर्ण से मण्डल निर्माण करे । उसके मध्य में शङ्ख और उसके मध्य में षट्दल कमल लिखकर पहले शयनागार के शिरःप्रदेश में स्थापित कुम्भाष्टक के मण्डल पर आठ कोणों में आठ दीपकों के साथ मध्यकुम्भ को मण्डल के मध्य में स्थापित करे