सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तदशः परिच्छेदः ३९७ प्रत्येक आहुति में दिये जाने वाले द्रव्य रोगी के शिर के चारों ओर घुमावे । आतुर को सिद्धार्थक समन्वित, भैंसा गुग्गुल द्वारा मूल मन्त्र से धूपित कर, वस्त्र से आच्छादित कर, अग्निपात्र के समीप जल सहित पात्र रखकर, कुङ्कुमादि से उसे लाल बना कर, उदक सहित उस अन्न को निकाल कर, आतुर के धातुओं में स्थित समस्त दोषों के लिय ‘अयं पशु प्रतिनिधि बलिः' ऐसा संकल्प कर 'यदीयमस्र्य वै बाधम् ... ... ... ... ... सिंहसत्येन मुञ्चतु' पर्यन्त मन्त्र पढ़ कर भूत बलि देवे ॥ २६६-२७० ॥ बलि देते समय मध्य में अपने बायें एवं दाहिने हाथ से असंख्यात होम करता रहे । बलिदान के लिये पहले प्रदक्षिणा करे । फिर अस्त्र मन्त्र से अभिमन्त्रित जल से हाथ धोकर, कुण्डस्थ भूति अथवा दग्ध गोमय (= गोहरी) की विभूति ले कर, उसे कई बार अस्त्रमन्त्र से अभिमन्त्रित कर, आतुर के ललाट से लेकर पाद पर्यन्त ऊर्ध्वपुण्ड्र लगाकर ‘ॐ क्षौं नमः, ॐ नमो भगवते नरसिंहाय स्वस्त्यस्तु ते' इस मन्त्र को पढ़ते हुए कुम्भोदक समन्वित अर्घ्योदक बिन्दु से प्रोक्षण करे ॥ २७१-२७३ ॥ रोगी के ब्रह्मरन्ध्र में पूर्णचन्द्र मण्डल मध्यस्थ लाखों पूर्ण चन्द्रमा के समान महान् अमृत का क्षरण करते हुए मन्त्रनाथ का स्मरण करे तथा उस चूते हुए अमृत से रोगी के शरीर रूप वृक्ष के संसिक्त होने का ध्यान करे । फिर कलश स्थित तथा मण्डल स्थित देव की पुनः अर्चना करे । सोपकलश सोदक उस महाकुम्भ को आतुर के शयनागार में शिरःप्रदेश में किसी वस्त्र-पीठ पर स्थापित करे । वस्त्र से उसे आच्छादित करे । फिर वहाँ भी दिशाओं में एवं विदिशाओं में आठ पूर्ण कुम्भ स्थापित करे और निरन्तर अविच्छिन्न प्रसर धूप पात्र रखे । दीप पात्र भी पूर्व की भाँति स्थापित करे । फल, पुष्प, औषधि, दीप, लाजा, सिद्धार्थक तथा दही का पात्र उसके आगे रखे, तदनन्तर सायङ्काल होने पर बलिदान करना चाहिए ॥ २७४-२७९ ॥ बलिदान का प्रकार इस प्रकार है—प्रथम षटकोण मण्डल पर स्थापित कलशों में मध्य कुम्भस्थ भगवान् के अर्चन के लिये जो कुछ भी पुष्प, धूप, दीपादिक एकत्रित किया गया हो, उन सबको किसी एक पात्र में संग्रहीत कर, उसके चारों ओर छह कलशों पर स्थित नृसिंह के भूतों के लिये दिये गये पुष्प, धूप, दीपादिक भी एक पात्र में पृथक्-पृथक् छह पात्रों में रख कर, तत्-तत् पात्रों को स्व-स्व दीपों से अलङ्कृत करे और उन कुम्भों पर स्थापित करे । ‘ॐ क्षः वीर्यायास्त्राय फट् अमुकं रक्ष रक्ष' इस मन्त्र का स्मरण करते हुए उन-उन कलशों को साध्य के शिरःस्थान में क्रमानुसार पृथक्-पृथक् घुमावे सात्विक भगवद् भक्तों को जो बलि ले जाने वाले हैं उन्हें बुलावे । उनके हाथ में अस्त्राभिमन्त्रित सिद्धार्थक देकर अस्त्र मन्त्र से भस्म के द्वारा ललाट में तिलक करे । उनसे बलि