सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३९६ सात्वतसंहिता इस रोग निवारण में सभी के लिये मन्त्र का अनुष्ठान अत्यन्त उपयोगी है, जिसके जप, स्मरण, ध्यान तथा मन्त्र से रोगी के शरीर में ग्रहों का प्रवेश संभव नहीं होता ॥ २४२ ॥ श्रीनृसिंह की आराधना के लिये पूर्ववत् मण्डल और कलशों का स्थापन करे । उपकुम्भों को श्वेत सर्षप के चीजों को ढकने से पूर्ण करे । उसको ढकने वाले पुरवा को सफल सर्षप तथा तिलों से पूर्ण कर उसके बाहर आठों दिशाओं में समान आकार वाले आठ लोह निर्मित बाणों को रखे । उसे किसी दृढ़ तन्तु द्वारा कलश कण्ठ में बाँधकर उसमें मोर के पङ्खे, सांप के केचुले से भूषित महौषधि, भूतजटा तथा शमी की शाख बाँध देवे । फिर उस बाणाष्टक को पञ्चवर्ण के सूत्र से उत्तर दिशा से आरम्भ कर दाहिनी ओर तीन बार लपेट देवे । फिर पूर्ण कलशों के अन्तराल (बीच-बीच) में ताम्रपात्र में सरसों का तेल भर कर महाराजत से रञ्जित बत्ती से संयुक्त कर आठ दीपक स्थापित करे ॥ २४३-२४९ ॥ तदनन्तर स्वयं स्नान करे, शिखा बाँधे, मौन धारण कर साधक पहले की भाँति दिग्बन्धन कर 'सर्वदोष पलायन' का संकल्प लेवे ॥ २५० ॥ मन्त्रनाथ श्रीनृसिंह की काम्य एवं नाना प्रकार के बहुत से कल्याणकारी पुष्पों, धूपों, फलों, मूलों तथा नैवेद्य एवं भक्ष्यों से विधिपूर्वक अर्चन करे ॥ २५१ ॥ अग्नि के मध्य में उन देवाधिदेव की सिद्धार्थ से संयुक्त सब बीजों से रजिका, घृत युक्त तिलों से सन्तुष्ट कर आतुर (रोगी) को पैर से लेकर मस्तक पर्यन्त अस्त्र पुष्पों से सन्ताडित कर नेत्र मन्त्र से उसकी ओर देख कर जालु तथा शिर नीचा करा कर भगवान् को निवेदित कर परिधायुक्त अस्त्र मन्त्र से अभिमन्त्रित अर्ध्यादि से अर्चित आसन पर बिठावे । फिर षडङ्ग श्रीनृसिंह मन्त्र से रोगी के हाथ तथा देह में यथाविधि न्यास मानस रूप से कर उसके आगे चक्र सहित षट्कोण मण्डल लिखकर वहाँ पूर्वोक्त सुन्दर परिष्कृत सात कलशों में जल भर कर मध्य में षट्कोणों में स्थापित कर कोणों के बीच-बीच में पूर्वोक्त रीति से आठ दीपक भी रख कर मध्य कुम्भ में साङ्ग मन्त्रनाथ का पूजन करे । कोण में स्थापित कलशों से 'ॐ नृसिंह भूतेभ्यो नमः' इस मन्त्र से सर्वदोषनाशक श्रीनृसिंह के भूत गणों का अर्चन करे ॥ २५२-२६१ ॥ अस्त्राभिमन्त्रित सिद्धार्थक से दिग्बन्ध कर पुनः उस आतुर को पुष्पों से सन्ताडित कर अपने हाथ के पङ्खे से उसके सभी शरीरस्थ दोषों को मन से खींच लेवे । फिर उस दोष की आकाश में अथवा धरातल में प्रक्षिप्त कर फिर धूम रहित अतिदीप्त अग्निपात्र में स्थित इन्धन रहित उस अग्नि में सिद्धार्थक तिल के साथ एक सौ आठ की संख्या में 'अमुकं रक्ष रक्ष स्वाहा' इस मूल मन्त्र से अथवा अस्त्र मन्त्र से होम करे ॥ २६२-२६५ ॥