सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तदशः परिच्छेदः ४०३ पार्थिवबीजं चतुरश्रमण्डले च विलिख्य वृत्तमण्डले सषडङ्गेन बीजेन सम्पुटीकृतममुक- नामधेयं रक्षेति पदद्वयं विलिखेत् । तथैवार्धचन्द्राकारमण्डलेऽपि द्वादशाक्षरसम्पुटित- ममुकं रक्षेति पदद्वयं विलिखेत् । पुरस्त्यश्रमण्डले वृत्तमण्डलवच्चतुरश्रमण्डलेऽर्ध- चन्द्राकारमण्डलवच्च विलिख्य बहिः प्राच्याद्यष्टदिक्षु रक्ष रक्षेति केवलं नामवर्जितं विलिखेत् । अथेदं यन्त्रं यथाविधि सम्पूज्य सूत्रेण संवेष्ट्य सुवर्णादिधातुना विधाय मूर्ध्नि कण्ठे दक्षिणभुजे वा सततं धारयेत् । अनेन यावज्जीवमाध्यात्मिकादिदैवि- काधिभौतिकतापत्रयभयविमुक्तो भवति । एवं स्वार्थतः परार्थतो वा यन्त्रोद्धारादिकं कृत्वा यागहोमसमाधिभिर्देवं सविशेषं समाराध्य क्षमापयेत् ॥ ३४४-३५७ ॥ इति संधारिणी रक्षाविधिः ॥ अब अनातुरों की रक्षाविधि कहते हैं—क्रियापरायण मन्त्रज्ञ को चाहिये कि वह भोग सेवन करने वाले, रोग रहित, यज्ञ यागादि क्रियापरायण आस्तिक भक्तों की एवं अपने हितेच्छु जनों की रक्षा अवश्य करे ॥ ३३४ ॥ जहाँ उक्त प्रकार से मन्त्रज्ञ शरीर की रक्षा करता है, वहाँ भूतगण भी सार्वलौकिक कल्याण करते हैं ॥ ३३५ ॥ अब शरीर की भूषणभूत सन्धारणी रक्षा कहता हूँ। जिसके क्रिया मात्र के सम्पन्न होने से अथवा उसके धारण करने मात्र से साधक मनुष्य अपनी रक्षा कर लेता है ॥ ३३६ ॥ अब इसकी प्रयोग विधि कहते हैं—शुभ अनुकूल नक्षत्र में, शुभ ग्रह स्थिति में एवं शुभ लग्न में साधक स्नान करे और न्यास करे । फिर रोचना कुङ्कुम एवं कपूर को एक में मिला कर उसे कपिला गौ के दूध एवं गोमय से रस (हरदी का) जल तथा नदी के जल से अच्छी तरह मन्थन कर एकीकरण करे । उस पङ्क को मोर पक्ष की कलम से भोजपत्र आदि पर इस प्रकार लिखे— श्री नृसिंह बीज के गर्भ में प्रणव सम्पुटित साध्य नाम लिखे फिर उस बीज को भी प्रणव गर्भ में जिस प्रकार वह आ सके वैसा लिखे । फिर उस प्रणव को भी उस बीज के गर्भ में स्थापित कर फिर उस बीज को भी प्रणव मध्यगत लिखे । इस प्रकार तीन बार आवृत्ति कर उन सभी को बीज के गर्भ में लिखे । फिर उस बीज को नेमि के दशम बीज लकार से परिवेष्टित करे । फिर औकार रहित नृसिंह बीज को (नाभि सप्तम स्थित) सकार के ऊपर संक्षिप्त कर सभी अरा पर संस्थित एकारादि विसर्गान्त स्वरों से संयुक्त कर, उसके बाहर व्योम- भूषित षड्दल कमल लिख कर, उसके दलों पर हृदादि नेत्रान्त ६ मन्त्रों को लिख कर, उसके चारों दिशाओं में प्रणव सम्पुटित रक्ष्य का नाम 'रक्ष रक्ष' इस पद से युक्त कर, पत्र सन्धि के ६ भागों पर उसे लिखकर उसके बाहर नाभि समन्वित द्वादशाक्षर चक्र लिखकर नाभि का अष्टम बीज हकार लिखे । फिर सप्तम, अष्टम, नवम, दशम (ऋ ॠ लृ लॄ) इन चार स्वरों को छोड़कर