सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४०४ सात्वतसंहिता अवशिष्ट विसर्गान्त एकादश स्वर (अ आ इ ई उ ऊ ए ऐ ओ औ अः) स्वरों से संयुक्त कर द्वादश अरों पर उन्हें लिखे ॥ ३३७-३४३ ॥ अरों के बीच-बीच में 'ॐ क्षः वीर्याय अस्त्राय फट् अमुकस्य दोषान् जहि जहि' यह लिखे। फिर चक्र के नाभि देश तथा नेमिभाग पर नृसिंह के द्वादशाक्षर मन्त्र से सम्पुटित 'अमुकं पाहि पाहि' यह लिखे। तदनन्तर इस प्रकार लिखे गये उस मन्त्र चक्र के बाहर बिन्दुभूषित वृत्तमण्डल, उसके बाहर स्वस्तिकभूषित त्रिकोणमण्डल, उसके बाहर कहारभूषित अर्धचन्द्राकार मण्डल, उसके बाहर वज्र लाञ्छित चौकोर मण्डल लिखकर नाभिपूर्व वायु बीज यकार लिखे। पूर्वोक्त वृत्त मण्डल पर, उससे दूसरा रेफ अग्निबीज त्रिकोण मण्डल पर, चौथा अमृत बीज वकार अर्धचन्द्राकार मण्डल में, तृतीय पार्थिव बीज लकार इस प्रकार चारों मण्डल पर लिखकर वृत्त मण्डल पर षडङ्गबीज से सम्पुटित 'अमुकनामधेयं रक्ष' इस दो पद को लिखे, फिर उसी प्रकार अर्धचन्द्राकार मण्डल पर भी द्वादशाक्षर सम्पुटित 'अमुकं रक्ष' यह दो पद लिखे। फिर त्रिकोण मण्डल, वृत्त मण्डल, चतुरस्र मण्डल, अर्धचन्द्राकार मण्डल लिखकर उसके बाहर पूर्वादि आठों दिशाओं में केवल रक्ष रक्ष इतना ही नामवर्जित पद लिखे। फिर इस प्रकार निष्पन्न मन्त्र का यथाविधि पूजन कर, उसे सूत्र से संवेष्टित कर और सुवर्णादिक धातु में उसे स्थापित कर शिर, कण्ठ या दाहिने हाथ में कहीं भी सतत् धारण करे। इसको जीवन पर्यन्त धारण करने वाला पुरुष आध्यात्मिक, आधिदैविक तथा आधिभौतिक इन तीनों प्रकार के तापों के भय से सदा विमुक्त हो जाता है। इस प्रकार अपने लिये तथा दूसरों के लिए मन्त्रोद्धार कर याग, होम एवं समाधि द्वारा भगवान् नृसिंह का विशेष रूप से समाराधन करने वाला साधक उनसे प्रार्थनापूर्वक क्षमा याचना करे ॥ ३४४-३५६ ॥ धर्मार्थकाममोक्षाख्य पुरुषार्थचतुष्टयसाधनविधिः अथ मन्त्रवराद् धर्मसाधनं योऽभिवाञ्छति ॥ ३५७ ॥ तत्प्राप्तये विधानं च संक्षेपादवधारय । पितॄणां लुप्तपिण्डानां पिण्डनिर्वापणाय च ॥ ३५८ ॥ प्रीतयेऽपि जगद्धातुः परित्राणार्थमात्मनः । कृतोपवासोऽमावास्यां मण्डलान्तर्गतं विभुम् ॥ ३५९ ॥ आवाह्य पूर्वविधिना योजयेद् भक्तिपूर्वकम् । पाद्यार्घ्यपुष्पधूपैस्तु दानैर्हेमगवादिकैः ॥ ३६० ॥ तिलयुक्तैस्तु नैवेद्यैः सकुशैस्तु तिलान्वितैः । विमलैरम्बुपात्रैश्च स्वयमञ्जलिपूरकैः ॥ ३६१ ॥ सोऽचिरान्मन्त्रमूर्तेर्वै प्रसादाच्छाश्वतं पदम् ।