भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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सप्तदशः परिच्छेदः ४११ सर्वगं शब्दरूपं च भावरूपं तु चिन्मयम् ॥ ४५५ ॥ तस्मादप्यभिमानं तु ह्यस्मिताख्यं शनैः शनैः । विनिवार्य यथा शश्वद् ब्रह्म सम्पद्यते स्वयम् ॥ ४५६ ॥ इत्येवं वैभवीयस्य नृसिंहस्य महात्मनः । आराधनं च संक्षेपादुक्तं सिद्धिसमन्वितम् ॥ ४५७ ॥ नित्यक्रियापराणां च संसारोद्विग्नचेतसाम् । मद्भक्तानामिदं वाच्यं शुद्धानां संयतात्मनाम् ॥ ४५८ ॥ ॥ इति श्रीपाञ्चरात्रे श्रीसात्वतसंहितायां वैभवीयनृसिंहकल्पो नाम सप्तदशः परिच्छेदः ॥ १७ ॥ — ❧❦❧ — अथानेन नृसिंहमन्त्रेण धर्मार्थकाममोक्षाख्यचतुर्विधपुरुषार्थसाधनविधिमाह—अथ 'मन्त्रवराद्धर्मेंति' प्रक्रम्य यावत् परिच्छेदपरिसमाप्ति । सुगमस्तदर्थः ॥३५७-४५८॥ ॥ इति श्रीमौज्यायनाकुलतिलकस्य यदुगिरीश्वरचरणकमलार्चकस्य योगानन्दभट्टाचार्यस्य तनयेन अलशिङ्गभट्टेन विरचिते सात्वततन्त्रभाष्ये सप्तदशः परिच्छेदः ॥ १७ ॥ — ❧❦❧ — हे सङ्कर्षण! याग, होम एवं जपादि द्वारा अन्य सिद्धियों के लिये तथा धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष चतुर्विध पुरुषार्थ सिद्धि के लिये जो इस मन्त्रराज की उपासना करना चाहता है, अब उसकी प्राप्ति के उपायों को सुनिए । यह सद्धर्म लुप्त पिण्ड वाले पितरों को पिण्ड का निर्वापण कराने वाला है । जगद्धाता के प्रीति का कारण है और आत्मरक्षा करने वाला है । साधक अमावास्या को उपवास करे । फिर मण्डलान्तर्गत मन्त्र मूर्ति विभु का आवाहन कर पूर्व की भाँति भक्तिपूर्वक उनका पाद्य, अर्घ्य, पुष्प, सुवर्ण, गवादि, दान, तिल युक्त नैवेद्य जो सकुशल तथा तिलयुक्त हो, स्वच्छ जलपात्रों से युक्त हो और अञ्जलि पूर्ण करने वाला हो, इस प्रकार के पदार्थों से पूजन करता है, वह भगवत्प्रसाद से थोड़े ही काल में शाश्वत-पद प्राप्त कर लेता है और अपने नरक में रहने वाले पितरों को स्वर्ग लोक प्राप्त करा देता है ॥ ३५७-३६२ ॥