सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४१२ सात्वतसंहिता जो साधक विभव होने पर पत्र, पुष्प, फल, अन्न, सस्य, दधि, ओदनादि के द्वारा तथा रस, अन्न, सद् गन्ध, उत्कृष्ट वस्त्र, उत्कृष्ट धातु जैसे प्रवाल एवं मुक्ता मणि आदिकों के द्वारा भक्तिपूर्वक बिम्बस्थ, अथवा मण्डस्थ प्रभु का यजन करता है, अथवा जो मुख्य मुख्य ८६ पूर्णिमाओं में उपवास कर भगवान् का यजन करता है वह अवश्य उसे प्राप्त करता है ॥ ३६३-३६५ ॥ जो सद्धर्म चाहता है, अथवा महान् तीर्थ में गमन करना चाहता है, वह सर्वप्रथम मण्डल पर मन्त्रराज का यजन करे ॥ ३६६ ॥ स्नान के पूर्व समस्त पूजा सामग्री एकत्रित करे । तदनन्तर स्नान कर किसी सिद्ध प्रतिष्ठित बिम्ब में, अथवा स्वयं सिद्ध बिम्ब में, अथवा अपने द्वारा स्वयं स्थापित बिम्ब में, पञ्चगव्य, दधि, क्षीर, घृत, मधु, इक्षु, जल, सर्वौषधी, गन्ध, रत्न और फल पुष्पान्वित घटों से साङ्ग मन्त्र द्वारा आवाहन कर १०८ फलों से पूर्ण घटों द्वारा तथा शुद्ध जल से पूर्ण अर्घ्य समन्वित कलशों द्वारा श्रद्धापूत मन से भगवान् का ठीक-ठीक पूजन करता है, वह मन्त्रनाथ के पूर्व में कहे गये सभी प्रकार के प्रसाद को शीघ्र प्राप्त कर लेता है ॥ ३६६-३७० ॥ जो साधक सङ्क्रान्ति के दिन उपवास कर मण्डल में मन्त्रनायक का आवाहन कर ऋतु में उत्पन्न होने वाले फल पुष्पों से श्रद्धापूर्वक यजन करता है। सात दिन तक फल मूल खाकर रहता है । तीनों कालों में स्नान करता है । अष्टाङ्ग प्रणिपात कर अनेक प्रकार से प्रदक्षिणा करता है, वह निश्चय ही उस व्रत से होने वाले समस्त फलों को प्राप्त करता है, अथवा जो अभिमत दान द्वारा धर्म की इच्छा करता है, वह विषुवस्थ दिन प्राप्त कर उपवास करे और संयम से रहकर अपने मन में दिये जाने वाले दान से अभीष्ट धर्म की प्राप्ति का ध्यान करे । फिर मण्डल निर्माण करे, उसमें अग्नि का आगार निर्माण करे । गाय के दूध, घी, दही के भक्ष्य पदार्थों द्वारा तथा फल समन्वित मूलकों को नैवेद्य, उत्तमोत्तम माला, धूप, दीप, तिल, होमपात्र एवं जलपात्र के द्वारा भगवान् को समिधा, घृत, तिल, सघृत तण्डुल पदार्थों द्वारा होम कर सन्तर्पण करता है, उसको मूर्त आदान की अपेक्षा सौगुना धर्म से भी अधिक धर्म का अभिवर्धन होता है ॥ ३७१-३७७ ॥ अथवा दक्षिणायन में शुभ मण्डल का निर्माण करे और उस पर मन्त्रनाथ का आवाहन कर विधिपूर्वक माला, विलेपन, धूप, महादीप, घृतादि, गुड, खाँड़ एवं अन्य भक्ष्य पदार्थ, दूध, कृसर, नारिकेल के जल, सत्तू और घृत द्वारा भगवान् का पूजन करता है या घृतादिक से अग्नि के मध्य में होम कर उन्हें सन्तुप्त करता है, इस प्रकार के धर्माचरण करने से उस साधक को इष्टापूर्त्त का फल प्राप्त होता है ॥ ३७८-३८० ॥ चन्द्र एवं सूर्योपराग (= ग्रहण) में साधक दिन-रात पवित्र रहकर उपवास