सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तदशः परिच्छेदः ४१३
करे। फिर सर्वप्रथम सभी उपकरणों से युक्त मण्डल का निर्माण करे और उस पर मन्त्रनाथ की प्रतिष्ठा करे। फिर साधक को अपनी शक्ति के अनुसार उनका यजन करना चाहिए ॥ ३८१-३८२ ॥ तदनन्तर अग्नि के मध्य में समिधा एवं घृतादिकों से होम कर मन्त्र के स्वरूप का ध्यान करते हुए मन से मन्त्रराज का जप करे ॥ ३८३ ॥ इस प्रकार जप करने वाला साधक जब तक जगत् में चन्द्रमा और सूर्य का दर्शन हो रहा है, तब तक अपने पूजा, जप और होम का अनन्त फल प्राप्त करता है ॥ ३८४ ॥ जो भक्त अर्थहीन हैं और सभी प्रकार के साधना से रहित हैं, किन्तु मन्त्र में एकमात्र नियमतः श्रद्धा रखने वाले हैं और फल की कामना करते हैं उनके लिये यह साधन कहा गया ॥ ३८५ ॥ स्नान, ध्यान, योग, जप, होम, उत्तम व्रत, उत्तम अन्न का भोजन, धन, सर्वस्व का त्याग, समय-धर्म का पालन ये सभी धर्म साधन कहे गये हैं विशेष कर धनिकों के लिये। जो मन्त्र के द्वारा शीघ्रातिशीघ्र अर्थ साधन चाहते हैं। चाहे ब्रह्मचारी, चाहे गृहस्थ, चाहे वानप्रस्थ, चाहे सन्यासी हों वे सात दिन पर्यन्त ठीक रीति से इस यज्ञ का सम्पादन करें, तीनों काल स्नान करें, नक्त में भोजन करें, तीनों काल घी तथा तत्काल में उत्पन्न हवि से उदर की अग्नि को तृप्त करें। अथवा बिल्व, आमलक एवं पद्म से उसके अभाव में कुशाङ्कुर से होम करें। इस प्रकार जो अनुष्ठान करता है तो उसका उस मन्त्रोद्धार के द्वारा तत्काल फल प्राप्त होता है ॥ ३८६-३९० ॥ वैशाख मास में, शुक्ल पक्ष में, जब सोमवार युक्त श्रवण नक्षत्र हो, उस दिन उपवास करे और मन्त्रेश का महान् अर्चन करे। पुण्य स्थल में, अथवा मण्डल में, अथवा बिम्ब में, अथवा जल पूर्ण कलश में, मन्त्रनाथ के दक्षिण और उत्तर दोनों पादों (गङ्गा, यमुना) का पूजन करे ॥ ३९१-३९२ ॥ भगवान् का दक्षिण पाद गङ्गा हैं तथा उत्तर पाद यमुना हैं, इनका पूजन 'प्रणव पूर्वक नमः' इस मन्त्र द्वारा करे। उनके पैर से निकली हुई गङ्गा के जल से घड़ा भरे। उसे पुष्प, वस्त्र एवं अनुलेपन से अलङ्कृत करे। उसमें तिल, होम तथा फल डालकर उनके मुख में स्थापित करे ॥ ३९२-३९४ ॥ इसी प्रकार मधु, घृत, शर्करादि, दधि, ओदनादि भी जलपूर्ण घट अथवा पत्ते से रहित पात्र आदि वस्तुयें मन्त्र मूर्ति को निवेदन करे। इसी प्रकार उपानह संयुक्त स्रक् (माला), चन्दन, अर्घ, धूप से, वस्त्र से अलङ्कृत करे। आतपत्र (छाता) भी मन्त्र द्वारा निवेदन करे। अर्घ्योदिक हाथ में देवे। इसके बाद घट प्रदान करे। इस प्रकार भगवान् की प्रीति के लिये उपर्युक्त सभी वस्तुयें प्रतिपादन