सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४१४ सात्वतसंहिता करे । इस प्रकार सभी ब्राह्मणादि वर्ण उन अनामय नारायण के शरणागत हो जाते हैं उनके समस्त पापों की शान्ति हो जाती है ॥ ३९५-३९९ ॥ उत्तमोत्तम नदियों के संगम में नाभि पर्यन्त जल में उतर कर स्नान करे । अञ्जलि में विमल जल भर कर देवता और पितरों का तर्पण करे । फिर भगवद् याग निवर्त्तन कर श्रेष्ठ ब्राह्मण को दान देवे । यह सारा कार्य सभी लोक में रहने वाले देवताओं की प्राप्ति के लिये सतत् श्राद्ध की आकांक्षा करने वाले अपने कुल में उत्पन्न पितरों की मुक्ति के लिये, स्वयं श्वेत द्वीप की प्राप्ति के लिये तथा अपने सन्तति की वृद्धि के लिये साधक करे ॥ ४००-४०२ ॥ हे अमलेक्षण ! सङ्कर्षण चाहे शुक्ल पक्ष की द्वादशी हो, अथवा कृष्णपक्ष की द्वादशी हो, यदि वह श्रवण नक्षत्र से युक्त हो, अथवा अभिजित् नक्षत्र से युक्त हो, ऐसी तिथि उपर्युक्त सभी फलों की प्राप्ति के लिय विशिष्ट रूप से साधक बन जाती है ॥ ४०३-४०४ ॥ इस कारण ऐसा काल प्राप्त होने पर उस दिन उपवास करे और अपने विभव के अनुसार अथवा अपनी शक्ति के अनुसार मन्त्र के सम्मुख (= साक्षात्) की सिद्धि के लिये उस तिथि में मन्त्रराज का अर्चन करे ॥ ४०५ ॥ गौ, भूमि एवं सुवर्णादि जो-जो दान अनुरूप सदाचारी जनों को दिये जाते हैं, वे-वे सभी दान देने वालों को फल तो देते ही हैं संसार में उनकी अभिवृद्धि भी करते हैं । किन्तु वही दान यदि भावितात्मा भगवत् पाद लिप्सु भगवद् भक्तों को दिये जायें तो वे भवशान्ति के कारण बन जाते हैं । यह वाद है कि अच्युत हरि सर्वत्र विद्यमान हैं । विष्णु, नारायण, हंस, सर्वशक्तिमय प्रभु ही द्रव्य के रूप में विभक्त हैं यह बात ज्ञानकर्म में समझना चाहिये ॥ ४०६-४०९ ॥ जिस प्रकार जल में बुद्बुद् आदि तीन रूपों में विभक्त हो जाते हैं, उसी प्रकार दान, स्वकीय आत्मा और नारायणात्मक पात्र इन तीन रूपों में वह द्रव्य भी प्रविभक्त हो जाता है ॥ ४१० ॥ इस प्रकार सामान्य बुद्धि से ज्ञान कर उन तीनों को दान काल उपस्थित होने पर सविशेष समझना चाहिये ॥ ४११ ॥ साधक सर्वप्रथम अपने मन से 'यह मुक्ति का किञ्चिद् द्रव्य अनन्तशक्ति के सामर्थ्य से अनश्वर है । दानाभिमानी प्रत्यगात्मा मैं हूँ तथा प्रभु मुझ पर कृपा करने की इच्छा से पात्रभावापन्न हैं, देव साक्षात् पञ्चतनु हैं, यह सब पञ्चभूतात्मक जगत् है, ऐसा समझ कर द्वादशार्ण मन्त्र से अपने शरीर पर न्यास करने वाला साधक मन्त्र को प्रत्यय का सहारा लेकर द्रव्य द्वारा होमादि क्रिया करे और अपने स्वरूप को न त्यागते हुए महान् रश्मि समूहात्मक मन्त्र का ध्यान करे । तदनन्तर बिना मन्त्र के अर्घ्य, पुष्प तथा अनुलेपन द्रव्य से बिना मन्त्र के यजन करे अथवा नृसिंह के