भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 474

सप्तदशः परिच्छेदः ४१५ द्वादश मन्त्रों से यजन करे। तदनन्तर अङ्गन्यास के बिना पात्रभूत परात्मा से सकली- करण करे। फिर वस्त्र, माला एवं अनुलेपन से विधिवत् भगवान् की अर्चना करे । तदनन्तर हाथ में संकल्प का जल लेकर भगवत् प्रीतिपूर्वक दान देवे । इस प्रकार साधक भगवद्-भावित आत्मा से दान द्वारा भगवान् को प्रसन्न करे ॥४१३-४१८॥ ज्ञानात्मा के लिये दान वह है जिससे वह अच्युतवेत्ताओं के पास पहुँच जावे । नारायण ही परंब्रह्म से प्रतिशब्दित कहे जाते हैं ॥ ४१९ ॥ यतः संसार रूप अग्नि से सन्तृप्त भक्तों के मोह शान्ति में भगवान् ही कारण हैं। अतः उनके मन्त्र से उन्हीं की मूर्ति का दान करे ॥ ४२० ॥ प्रथम द्वादशाक्षर मन्त्र से अथवा अन्य जिस किसी मन्त्र से अनन्त एवं अमल उन नारायण को स्वयं गोद में स्थापित करे ॥ ४२१ ॥ उन मन्त्र की आकृति वाले भगवान् की सर्वदा अर्चना करे । इस प्रकार दान प्रदान करे ॥ ४२२ ॥ मन्त्रात्मना परब्रह्म की पूजा करे । फिर सद्व्रत की सिद्धि के लिये महामन्त्र द्वारा उनकी पूजा करे । इस प्रकार व्रती द्वारा किया गया भगवद् व्रत साधक को ब्रह्मत्त्व की प्राप्ति करा देता है ॥ ४२३ ॥ विभिन्न पदार्थों से युक्त दिया गया यह दान अनेक भेदों से भिन्न-भिन्न है । अतः तप एवं यज्ञ का अनुष्ठान सविधि ब्रह्म भावना से करे जिससे यज्ञ विष्णु- याजियों के लिये शीघ्र मोक्ष फल प्रदान करने वाला हो जाये । वह यज्ञ अनेक द्रव्यों वाला है उसके अनेक लक्षण हैं ॥ ४२४-४२५ ॥ सर्वप्रथम यज्ञ मन्त्र से मूर्ति निर्माण कर उसकी अर्चना करे । फिर समाप्ति पर्यन्त हवन करे । पूर्णाहुति के अन्त में सुवर्ण प्रदान करे ॥ ४२६ ॥ दान, व्रत, तप और यज्ञ कर्मों में जो द्रव्य निवेदनीय हो अथवा जो पहले दिया जा चुका हो, उससे पहले केवल अनुयाग के लिये कर्त्तव्य करे । भगवान् को निवेदित कर प्राणान्वित अन्न का भोजन करे क्योंकि वह पावन है । ऐसा अन्न शुभकारक भक्तों के लिये तीन रात में ही फल प्रदान करता है ॥ ४२७-४२९ ॥ जो समर्थ हैं, शास्त्र में कहे हुए धर्म के अनुसार चलते हैं, दानधर्म में निरत हैं, व्रत करने वाले हैं, यज्ञ द्वारा यजन करते हैं, परलोक का तथा इस लोक का भय करने वाले हैं, थोड़ा अर्थ होने पर भी कल्याण चाहते हैं ऐसे लोगों के विषय में क्या कहा जा सकता है ॥ ४३० ॥ साधक सर्वप्रथम जल के मध्य में शमी पलाश तथा श्री वृक्षों से समिधाओं से आँवला के वृक्षों से तथा जल से मन्त्र तर्पण करे ॥ ४३१ ॥ जब एक सप्ताह व्यतीत हो जावे, तब मन्त्र देवता को मण्डल से उठाकर